उत्तराखंड की दोबारा सत्ता संभालते ही सीएम पुष्कर सिंह धामी के सामने 10 बड़ी चुनौती, जानिए क्या ?
सीएम बनने के बाद पुष्कर सिंह धामी के सामने हैं बड़ी चुनौतिया
देहरादून, 22 मार्च। उत्तराखंड में भाजपा विधानमंडल दल ने पुष्कर सिंह धामी को ही अपना नेता चुन लिया है। जिसके बाद अब धामी 23 मार्च को प्रदेश के 12वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे। धामी के शपथ लेने के बाद उन्हें कई चुनौतियां का सामना करना पड़ेगा। जिनमें से 10 बड़ी चुनौतियां हैं-

उपचुनाव कहां से लड़ेंगे ?
धामी सीएम बन जाएंगे, लेकिन विधायक न होने के कारण धामी को 6 माह के अंदर विधानसभा का उपचुनाव लड़ना होगा। ऐसे में धामी को शुरूआत में ही ये तय करना होगा कि वे कहां से चुनाव लड़े। खटीमा से चुनाव हारने के बाद अब धामी के कुमाऊं की किसी सीट से चुनाव लड़ने की संभावनाएं हैं। हालांकि ये सब धामी को खुद ही तय करना है।

दायित्व का बंटवारा, मंत्रिमंडल के विभागों में सामंजस्य
धामी के सामने पहली चुनौती अपने सहयोगियों का साथ में लेकर चलने की है। इसके लिए जरुरी है कि मंत्रीयों को दिए जाने वाले विभाग और दूसरे विधायकों और कार्यकर्ताओं को दायित्व का सही समय पर बंटवारा करना भी उनके लिए बड़ी चुनौती साबित होगी। जिससे कोई भी उनसे नाराज न हो।

सरकार और संगठन में समन्वय
किसी भी मुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती सरकार और संगठन में समन्वय की रहती है। धामी के सामने अपनी सरकार और भाजपा संगठन के बीच समन्वय बैठाने की चुनौती भी रहेगी। जिसमें सरकार के निर्णय से संगठन को किसी प्रकार की समस्या न हो और दोनों एक राय से ही सरकार को चला पाएं।
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खेमेबाजी खत्म करना
पुष्कर सिंह धामी का इस बार दूसरा कार्यकाल होगा। इससे पहले वे 6 माह तक ही मुख्यमंत्री रहे। लेकिन अब लंबी पारी खेलने के लिए धामी को भाजपा के दूसरे खेमों को खत्म करने की चुनौती रहेगी। धामी के चुनाव हारने के बाद जिस तरह दूसरा खेमा सक्रिय हुआ। उससे साफ है कि चुनाव हारने के बाद भी धामी को फिर से कमान मिलने से कुछ सीनियर नेता इसको लेकर नाराजगी जता सकते हैं। धामी को ऐसे सभी नेताओं को साथ लेकर चलने की भी सबसे बड़ी चुनौती है।

पुरानी पेंशन बहाली पर रुख साफ करना
राजस्थान और छत्तीसगढ़ कांग्रेस शासित राज्यों में कर्मचारियों को पुरानी पेंशन बहाली का निर्णय ले लिया गया है। उत्तराखंड में भाजपा सरकार को अपना रुख साफ करना होगा। ऐसे में राज्य सरकार अस्तित्व में आते ही पुरानी पेंशन बहाली के मु्द्दे पर कर्मचारियों को नाराज नहीं कर सकती है। जो कि धामी के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।

पुलिस ग्रेड पे का लटका मामला
मुख्यमंत्री रहते धामी ने पहले पुलिस के 4600 ग्रेड पे पर सहमति जताई थी। लेकिन बाद में एकमुश्त 2 लाख रुपए देने की घोषणा की। जिससे पुलिसकर्मियों के परिजन सरकार से नाराज हो गए थे। अब धामी के दूसरे कार्यकाल शुरू होते ही धरने प्रदर्शन शुरू होने वाले हैं। जिसमें पुलिसकर्मियों के परिजन भी अपना विरोध शुरू कर सकते हैं। ऐसे में पुलिसकर्मियों के परिजनों को समझाना आसान नहीं होगा।

नौकरशाही पर लगाम
नए मुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती नौकरशाही पर लगाम लगाने की होती है। धामी ने अपने 6 माह के कार्यकाल में काफी हद तक इस पर काम किया भी और आते ही सबसे पहले मुख्य सचिव को बदला। अब एक बार फिर धामी को अच्छे अफसरों को अपनी टीम में शामिल करना और जिलों में नई टीम तैयार करने की चुनौती है।

मेनिफेस्टो के वादों को धरातल पर उतारना
भाजपा ने चुनाव में जनता से कुछ वादे किए हैं। उन वादों को पूरा करने की चुनौती सबसे पहले मुख्यमंत्री धामी पर है। मेनिफेस्टो में किए गए वादों को भाजपा की सरकार कब तक पूरा करती है। इस पर भी सबकी निगाहें टिकी रहेंगी। इसमें साल भर में 3 सिलेंडर मु्फ्त और हर जिले में मेडिकल कॉलेज समेत दर्जनों घोषणाएं प्रमुख हैं।

रोजगार पर फोकस
पहले कार्यकाल में धामी ने 26 हजार नौकरियां देने का वादा किया था। जिसमें से अभी भी हजारों पदों पर भर्तियां रुकी हुई है। इसके साथ ही चुनाव में बेरोजगारी प्रमुख मुद्दा रहा है। जिसको लेकर विपक्ष हमेशा भाजपा सरकार पर हमलावर रहा है। अब धामी सरकार को सरकारी नौकरियों के अलावा अन्य रोजगार के मुद्दों पर फोकस करना होगा।

मोदी के विश्वास पर खरा उतरना
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही च्वाइस बताई जा रही है। मोदी जब भी उत्तराखंड आए धामी की पीठ थपथपा कर गए हैं। अब 2024 में लोकसभा चुनाव और 2025 में उत्तराखंड का रजत वर्ष मनाया जाना है। जो कि मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट है। ऐसे में धामी को पहले दिन से ही इन दोनों टारगेट पर फोकस करना है। जिससे मोदी के धामी पर दोबारा विश्वास जताने के निर्णय को सही साबित कर सकें।












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