अखिलेश- जयंत की 40 मिनट की मुलाकात के क्या है सियासी मायने, जानिए क्या निकला नतीजा

लखनऊ, 23 नवंबर: उत्तर प्रदेश में अगले साल फरवरी-मार्च में होने वाले चुनाव से पहले रालोद के मुखिया जयंत चौधरी- अखिलेश यादव की आज की मुलाकात काफी अहम मानी जा रही है। ऐसे समय में अखिलेश और जयंत की मुलाकात हुई जब पिछले कुछ दिनों से ऐसी अटकलें लगाई जा रहीं थीं कि पीएम मोदी के कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद जयंत चौधरी बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं। इन अटकलों के बीच मंगलवार को जयंत ने अखिलेश से मिलकर बातचीत की। सपा के सूत्रों की माने तो जयंत को 25 सीटें देने पर अखिलेश यादव सहमत हुए हैं। हालांकि इसकी अभी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। आने वाले दिनों में जल्द ही दोनों नेताओं की तरफ से इसका ऐलान किया जा सकता है।

जयंत चौधरी

दरअसल 2022 के उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा चुनावों के लिए दोनों दलों के गठबंधन को अंतिम रूप देने की बातचीत के बीच राष्ट्रीय लोक दल के प्रमुख जयंत चौधरी ने मंगलवार को लखनऊ में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव से मुलाकात की। जानकारी के अनुसार, दोनों के बीच 40 मिनट से अधिक समय तक मुलाकात हुई और इस महीने के अंत में गठबंधन की घोषणा की जा सकती है।

अखिलेश ने जयंत को एयरपोर्ट से रिसीव करवाया

समाजवादी पार्टी के सूत्रों ने खुलासा किया कि बैठक को लो प्रोफाइल रखा गया था और आरएलडी प्रमुख के अखिलेश यादव के आवास पर पहुंचने तक बहुत से लोगों को बैठक के बारे में पता नहीं था। सूत्र यह भी बताते हैं कि जयंत चौधरी को एयरपोर्ट से लाने वाला वाहन अखिलेश की ओर से भेजा गया था। रालोद प्रमुख ने अखिलेश के साथ अपनी एक तस्वीर ट्वीट की और दोनों दलों के बीच गठबंधन को मजबूत करने की ओर इशारा करते हुए 'बढ़ते कदम' लिखा।

अखिलेश ने ट्वीट भी किया, 'जयंत चौधरी के साथ बदलव की ओर'। सूत्रों के अनुसार, रालोद को लगभग 25 सीटें मिल सकती हैं, साथ ही कुछ सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार रालोद के टिकट पर भी चुनाव लड़ सकते हैं। पहले बागपत की दो और मथुरा की एक सहित तीन सीटों पर दोनों पार्टियों के बीच कुछ विवाद हुआ करते थे, लेकिन अब लगता है कि दोनों पार्टियों के बीच मसला सुलझ गया है। अब, सपा पश्चिमी यूपी में अपनी जड़ें मजबूत करने पर विचार कर रही है।

जयंत

जयंत की सफाई- हम बीजेपी के सामने क्यों झुकेंगे

इससे पहले, रालोद प्रमुख ने कहा था कि रालोद और सपा जल्द से जल्द एक गठजोड़ को अंतिम रूप देने की दिशा में काम कर रहे हैं। कहा कि, हम एक समान दिशा में काम कर रहे हैं। मैं भी स्वतंत्र रूप से कार्यक्रम कर रहा हूं, वह (अखिलेश) भी स्वतंत्र रूप से कार्यक्रम कर रहे हैं और हम लोगों को एक मजबूत विकल्प देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। मेरे भाजपा के साथ जाने की अफवाहें निराधार हैं। हम पिछले सात साल से संघर्ष कर रहे हैं। जब हम चुनाव हारे तो हम झुके नहीं। अब जब लोग हमारे साथ आ रहे हैं तो हम बीजेपी के सामने क्यों झुकेंगे?

सपा के साथ गठबंधन को लेकर पहले भी दी थी सफाई

जयंत ने सपा और रालोद के बीच गठबंधन के बारे में खुलासा करते हुए कहा था कि,

"सपा और रालोद के बीच गठबंधन में समय लग रहा है क्योंकि ऐसी औपचारिकताएं हैं जिनका आपको पालन करना होगा और आपको उन चीजों का पालन करना होगा। मुझे अपने उम्मीदवारों, अपनी सीटों सहित कई चीजों पर गौर करना है। इसे समझने की जरूरत है और यह सीट बंटवारे का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है। लेकिन हम दोनों उस दिशा में काम कर रहे हैं।"

हालांकि, अब दोनों नेताओं के बीच एक बैठक के बाद उम्मीद है कि 2022 के यूपी चुनावों के लिए औपचारिक रूप से गठबंधन की घोषणा करने के लिए जल्द ही एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई जा सकती है। सूत्र बताते हैं कि प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन जल्द ही लखनऊ में किया जाएगा।

प्रियंका गांधी

लखनऊ एयरपोर्ट पर प्रियंका से की थी मुलाकात, राज्यसभा भेजने का दिया था ऑफर

इससे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी ने पश्चिम में अपनी स्थिति मजबूत करने की जिम्मेदारी जाट नेता दीपेंद्र हुड्डा को सौंपी थी। दीपेंद्र ही जयंत चौधरी को मानने में जुटे हुए थे। जयंत को कांग्रेस यह विश्वास दिलाने में जुटी थी कि उनके हितों का पूरा ख्याल रखा जायेगा और उनको जितनी सीटें चाहिए वो भी दी जाएंगी। कांग्रेस ने जयंत को राज्यसभा भेजने का भी ऑफर दिया था क्योंकि कांग्रेस को पता है कि पश्चिम में आरएलडी की स्थिति ठीक है। खासतौर से जिस तरह आरएलडी किसान आंदोलन के बहाने जाट मुस्लिम समीकरण को बनाने में जुटी है उससे पश्चिमी यूपी में बीजेपी के खिलाफ माहौल बना हुआ है। इसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है। हालांकि अभी तक तो यही लग रहा है कि कांग्रेस का यह दांव कारगर नहीं हो पाया।

136 सीटों पर जाट-मुस्लिम समीकरण बनाना चाहते हैं अखिलेश

दरअसल पश्चिमी यूपी की 136 विधानसभा सीटों में से 55 में जहां जाट वोट मायने रखता है, वहां मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है। अगर जाट-मुस्लिम वोट मिलाते हैं, तो यह कुल वोट का 40 प्रतिशत होगा। इसके लिए, 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के तुरंत बाद, 2014 के संसदीय चुनाव पर नजर डालें तो एक भी मुस्लिम सांसद नहीं चुना गया था। हालांकि, जाट-मुस्लिम एकता 2019 के लोकसभा चुनाव में देखी गई जब यूपी ने छह मुस्लिम सांसदों को संसद भेजा जिनमें पांच तो पश्चिमी यूपी से थे।

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