UP News: गायों को बचाने की दिशा में BHU ने उठाया बड़ा कदम, भ्रूण संग्रह के क्षेत्र में हासिल की बड़ी सफलता
UP News: देशज नस्ल की गायों के संरक्षण एवं सवर्धन की दिशा में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की रिसर्च टीम ने एक अहम कदम उठाया है। संस्थान के कृषि विज्ञान विभाग ने गायों में उच्च गुणवत्ता वाले भ्रूण को सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया है। यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से दिए बयान के मुताबिक, संकाय की शोध टीम ने दो डोनर गायों (एक साहिवाल और एक गंगातीरी) से भ्रूण एकत्र किए थे। ये दोनों ही देसी नस्ल की गायें होती हैं।
बीएचयू की ओर से दी जानकारी के मुताबिक, गंगातीरी गाय से 7 और साहिवाल गाय से 11 भ्रूण जमा किया गया था। इन भ्रूण को बाद में सरोगेट गायों में प्रत्यारोपित किया गया। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) की ओर से समर्थित एक प्रोजेक्ट के तहत यह शोध चल रहा है। यह उपलब्धि एफवीएएस, बीएचयू की पशुपालन प्रजनन क्षेत्र में बढ़ती वैज्ञानिक क्षमता को दर्शाती है।

UP News: देसी गायों को बचाने की दिशा में अहम कदम
मल्टीपल ओव्यूलेशन एम्ब्रियो ट्रांसफर (MOET) जैसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके उच्च गुणवत्ता वाली देशी नस्लों की वृद्धि को तेजी से संभव बनाया जा रहा है। शोध टीम ने भविष्य में इन-विट्रो एम्ब्रियो प्रोडक्शन (IVEP) और एंब्रियो ट्रांसफर (ET) तकनीकों का भी उपयोग करने की योजना बना रहा है। यह तकनीक खास तौर पर गंगातीरी नस्ल के संरक्षण के लिए किया जा रहा है। इस भ्रूण प्रत्यारोपण के जरिए अब तक 4 मादा बछियों का जन्म हो चुका है और 3 गायें एमओईटी तकनीक से गाभिन हैं।
यह भी पढ़ें: UP Bijali Bill: उपभोक्ताओं के लिए अच्छी खबर! अक्टूबर माह में कम आयेगा बिजली बिल, सामने आई यह बड़ी वजह
इस उपलब्धि पर एफवीएएस के विशेषज्ञ डॉ. मनीष कुमार (प्रधान अन्वेषक), डॉ. कौस्तुभ किशोर साराफ और डॉ. अजीत सिंह (सह-अन्वेषक) ने कहा कि ऐसे प्रयास साहिवाल और गंगातीरी जैसी नस्लों की उत्पादकता, संख्या और संरक्षण को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ये नस्लें न केवल सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि रोग प्रतिरोधक क्षमता, अनुकूलनशीलता और दूध की गुणवत्ता जैसी आनुवंशिक विशेषताओं के कारण भी बेहद मूल्यवान हैं। गंगातीरी एक विशिष्ट नस्ल है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश की गंगा नदी के तटीय क्षेत्रों और बिहार के कुछ हिस्सों में पाई जाती है।
BHU की शोध टीम लगातार इस पर कर रही रिसर्च
यह एक महत्त्वपूर्ण दोहरे उपयोग की नस्ल है, जो अपनी उच्च रोग प्रतिरोधक क्षमता, कठोर जलवायु में जीवित रहने की क्षमता, हल खींचने की ताकत और दुग्ध उत्पादन के लिए जानी जाती है। यह नस्ल कम लागत वाली प्रबंधन प्रणाली में अच्छी तरह फिट बैठती है। साथ ही, छोटे किसानों के ग्रामीण दुग्ध उत्पादन केंद्रों की मजबूत रीढ़ बनकर उनके आजीविका का आधार है। आरकेवीवाई योजना के अंतर्गत इस कार्यक्रम की सफलता अनुसंधान, प्रशिक्षण व किसान-उन्मुख कार्य प्रेरित होंगे। इससे देश में पशुपालन उत्पादन में आत्मनिर्भरता और ग्रामीण भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास को मजबूती मिलेगी।
यह भी पढ़ें: UP News: बलरामपुर को सीएम योगी ने दी करोड़ों की सौगात, मां पटेश्वरी का किया दर्शन पूजन












Click it and Unblock the Notifications