यूपी विधानसभा चुनाव: अमित शाह को याद आया कैराना, तो अखिलेश को क्यों याद आए जिन्ना

लखनऊ, 1 नवंबर: उत्तर प्रदेश में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ध्रुवीकरण की राजनीति का खेल खुरू हो गया है। तीन दिन पहले लखनऊ आए देश के गृहमंत्री अमित शाह ने यूपी की सियासत का रुख मोड़ने का प्रयास किया। शाह ने सपा शासन में हुए कथित पलायन को मुद्दा बनाया और अखिलेश पर वार किया। शाह ने कहा कि पहले जिनकी वजह से पलायन हो रहा था अब वही लोग पलायन करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। इसका जवाब हरदोई में अखिलेश यादव ने रविवार को अपनी रैली में दिया और कहा कि महात्मा गांधी, सरदार वल्लभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू की तरह ही मुहम्मद अली जिन्ना की विचारधारा भी वही थी जिन्होंने भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी।

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     अखिलेश ने खेला जिन्ना कॉर्ड

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    अखिलेश ने अमित शाह के कैराना याद दिलाने के बाद अब हरदोई में जिन्ना का याद कर बीजेपी को उसी की भाषा में जवाब देने का प्रयास किया। अखिलेश ने कहा कि सरदार पटेलजी, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और जिन्ना एक ही संस्थान में पढ़कर बैरिस्टर बने। वे एक ही स्थान पर पढ़ते थे। वे बैरिस्टर बने, हमें आजादी दिलाई। वे किसी भी तरह के संघर्ष से पीछे नहीं हटे। एक विचारधारा थी जिसका सरदार पटेल जी ने विरोध किया था। आज वही लोग जो देश को एक करने का दावा करते हैं, आपको और मुझे जाति और धर्म के आधार पर बांट रहे हैं। अगर हम बंट गए तो हमारा देश क्या होगा? एक विशेषता जो हमारे देश के लिए अद्वितीय है वह है विविधता में एकता।

    जिन्ना की प्रशंसा पर बीजेपी ने उठाए सवाल

    जिन्ना की प्रशंसा पर बीजेपी ने उठाए सवाल

    राज्य भाजपा प्रमुख स्वतंत्र देव सिंह ने अखिलेश पर निशाना साधते हुए पूछा कि उन्होंने "पाकिस्तान" के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की प्रशंसा क्यों की। एक ट्वीट में जहां उन्होंने अखिलेश के भाषण की एक वीडियो क्लिप को टैग किया, देव ने लिखा, "सरदार पटेल की जयंती पर, अखिलेश यादव जिन्ना की प्रशंसा क्यों कर रहे हैं?"

    अमित शाह ने दो लखनऊ दौरे में याद दिलया था कैराना

    अमित शाह ने दो लखनऊ दौरे में याद दिलया था कैराना

    लखनऊ दौरे पर आए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने फिर कैराना पलायन की याद दिलाई थी। अमित शाह का ये कदम यूं ही नहीं है। इसी पीछे भाजपा की एक सोची समझी रणनीति है। गृहमंत्री ने कहा था कि 'वेस्ट यूपी में कैराना से पलायन शुरू हुआ, लेकिन लखनऊ में हुकमरानों की नींद नहीं टूटी। आज यूपी में पलायन नहीं हो रहा। पलायन करवाने वालों को पलायन हो गया।'

    जाट-मुस्लिम समीकरण बना तो बिगड़ जाएगा बीजेपी का खेल

    जाट-मुस्लिम समीकरण बना तो बिगड़ जाएगा बीजेपी का खेल

    यूपी राजनीतिकों की मानें तो कहीं न कहीं पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन की वजह से भाजपा की जमीन खिसकी है। जिसकी वजह से अमित शाह एक बार फिर कैराना पलायन की याद दिला रहे हैं। अमित शाह को पता है कि पश्चिमी यूपी में ध्रुवीकरण नहीं हुआ और यदि जाट-मुस्लिम समीकरण बना गया तो पार्टी को काफी नुकसान हो सकता है। बीजेपी अपनी रणनीति पर चलते हुए आगे बढ़ रही है क्योंकि उसी नजर पश्चिमी की 100 से अधिक उन सीटों पर है जहां यह समीकरण बीजेपी का खेल बिगाड़ सकता है।

     पश्चिमी यूपी में जाटों को साधने की कवायद

    पश्चिमी यूपी में जाटों को साधने की कवायद

    दरअसल, पश्चिमी यूपी जाट-मुस्लिम का मजबूत गठजोड़ 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों में बिखर गया था। जिसकी वजह से पश्चिमी यूपी की 17 लोकसभा सीट और 120 विधानसभा सीटों पर असर रखने वाले जाटों ने 2014 लोकसभा चुनावों में फिर 2017 विधानसभा चुनावों में भाजपा को सपोर्ट किया और भाजपा केंद्र के साथ साथ यूपी की सत्ता में आ गई। अब किसान आंदोलन की वजह से एक बार फिर से यह गठजोड़ बन रहा है। यही वजह है कि विपक्ष एक ओर इस आंदोलन को सपोर्ट कर रहा है तो भाजपा जल्द से जल्द आंदोलन खत्म करना चाहती है ताकि पश्चिमी यूपी में वह एक बार फिर सुपर पॉवर बनकर उभरे।

    सपा काल में हुआ था मुजफ्फरनगर दंगा और कैराना से पलायन

    सपा काल में हुआ था मुजफ्फरनगर दंगा और कैराना से पलायन

    दरअसल पश्चिमी यूपी में 27 अगस्त 2013 को कवाल में छेड़खानी हुई। दोनों तरफ से हिंसा में दो मुस्लिम लड़कों की मौत के बाद दंगा भड़क गया। घटना ने धीरे धीरे बड़ा रूप ले लिया। उसके बाद मुजफ्फरनगर में लगी दंगो की आग बुझाये नहीं बुझी। हिंसा में 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। मई 2016 में कैराना से तत्कालीन सांसद हुकुम सिंह ने कैराना से कुछ हिंदुओं के पलायन का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि मुस्लिम दबंगों के चलते हिन्दू परिवार कैराना से पलायन कर रहे हैं। इसको लेकर भी खूब राजनीति हुई थी। उत्तर प्रदेश में 6 से 7% आबादी जाटों की है लेकिन वेस्ट यूपी में जाट आबादी 17% से अधिक है। पश्चिमी यूपी में कभी जातीय दरार नहीं आई थी लेकिन दंगों ने यहां दरार पैदा कर दी थी।

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