कैसे मायावती के हाथों से रेत की तरह फिसल गए दलित वोट ? 33 साल में बसपा का हुआ सबसे बुरा हाल
लखनऊ, 11 मार्च: यूपी की राजनीति में मायावती को इस बार सबसे करारी हार मिली है। बसपा सुप्रीमो चुनावों में भी बहुत कम सक्रिय रहीं और उनका जो कोर वोट बैंक कभी चट्टान की तरह मजबूत माना जाता था, वह भी पिछली बार से घटकर लगभग आधा रह गया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यहां से बीएसपी चीफ का राजनीतिक पतन होने वाला है। क्योंकि, उनकी ताकत उनका वोट बैंक ही था। लेकिन, अब वह भी उनके साथ पूरी तरह से नहीं रह गया है। बसपा के जाटव और गैर-जाटव वोटों से इस चुनाव में किसे कितना फायदा मिला है, इसपर गौर करने का समय भी आ गया है।

33 साल में बसपा का हुआ सबसे बुरा हाल
1989 के विधानसभा चुनाव से बीएसपी ने उत्तर प्रदेश में गंभीरता दिखानी शुरू की थी। तब उसे 13 सीटें मिली थीं। 10 मार्च, 2022 को यूपी विधानसभा चुनाव का जो परिणाम आया है, उसमें मायावती की पार्टी को सिर्फ 1 सीट मिली है, जो उसका अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन है। इसकी वजह ये है कि बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो का अपना कोर वोट बैंक ने भी उनका साथ छोड़ दिया है। यह एकबार में नहीं हुआ है। इसका पूरा पैटर्न है कि कैसे-कैसे दलित वोट बैंक 'बहनजी' के हाथों से रेत की तरह फिसलता चला गया है। उनके समर्थक इसी नाम से उन्हें सम्मानपूर्वक बुलाते हैं।

बीएसपी के कोर वोटर ने बनाई पार्टी से दूरी
यूपी में मायावती का कोर वोट बैंक दलित वोटर रहे हैं। इनका भी दो हिस्सा है। जाटव, जिससे कि खुद मायावती आती हैं और बाकी गैर-जाटव अनुसूचित जातियां। सूबे में दलित मतदाताओं की संख्या करीब 21% है। इनमें सबसे बड़ी आबादी यानि इसका 55% जाटव वोटर हैं और यही मायावती के पूर्ण रूप से समर्पित वोटर रहे हैं। बाकी 45% गैर-जाटव जातियां भी एक वक्त में बीएसपी की भरोसेमंद वोटर थी, लेकिन धीरे-धीरे पहले इन्होंने ही बीएसपी से छिटकना शुरू कर दिया था।

बीएसपी से दलितों के मोहभंग होने का पैटर्न
यूपी में दलित वोटरों के वोटिंग पैटर्न में पांच साल पहले तक डेढ़ दशकों में कैसे बदलाव हुआ था, इसका 2002 से 2017 के बीच का एक दिलचस्प सर्वे सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपमेंट सोसाइटीज) ने किया था। 2002 के चुनाव में बीएसपी को जाटवों के 79% वोट मिले थे। 2007 में जब मायावती की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी और बीएसपी को 206 सीटें मिलीं, तब 86% जाटव मतदाताओं ने 'बहनजी' के लिए वोट किया था। पांच साल तक सत्ता में रहने के बावजूद 2012 में जाटव वोट भी उनकी पकड़ से निकलने शुरू हो गए। इस चुनाव में बीएसपी को सिर्फ 62% जाटव वोट मिले थे। 2017 में एकबार फिर उन्होंने दलित एजेंडा पर वापस लौटने का वादा किया तो जाटव वोट का शेयर फिर बढ़कर 86% पर पहुंच गया। जहां तक गैर-जाटव वोटों का सवाल है तो 2002 में बीएसपी को 53%, 2007 में 55%, 2012 में 45% और 2017 में 43% मत मिले।

भाजपा में किस तरह से शिफ्ट हुए बसपा के वोटर
इस दौरान बसपा के वोट किस तरह से बीजेपी और समाजवादी पार्टी की ओर शिफ्ट होने लगे, वह भी देखिए। बीजेपी को जाटव और गैर-जाटव वोटरों का समर्थन इस तरह से बढ़ता-घटता गया- 2002 में जाटव- 2%, गैर-जाटव- 12%, 2007 में जाटव- 3%, गैर-जाटव- 9%, 2012 में जाटव-5%, गैर-जाटव-11% और 2017 में जाटव- 9% और गैर-जाटव- 31%.

सपा को भी लगातार मिला बीएसपी के वोटरों का समर्थन
बसपा से निकलकर विकल्प की तलाश में जुटे दलित वोटरों के लिए समाजवादी पार्टी भी बड़ा ठिकाना रही है। उसे 2002 में 2%, 2007 में 4%, 2012 में 15% और 2017 में 3% जाटव वोट मिले। इसी तरह पार्टी को 2002 में 15%, 2007 में 16%, 2012 में 18% और 2017 में 10% गैर-जाटव वोट मिले। यानि बीएसपी के कोर वोटर सपा और भाजपा दोनों की ओर पहले से ही शिफ्ट होते रहे हैं।

2022 में बीएसपी के जाटव वोट का बंटवारा
तथ्य ये है कि 2022 के चुनाव में मायावती के वोट बेस में ऐतिहासिक गिरावट आई है। द क्विंट ने लखनऊ के एक दलित ऐक्टिविस्ट के हवाले से बताया है कि बीएसपी को जो इस बार 12.88% वोट मिला है, वह मुख्य रूप से जाटवों से ही मिला है। इनमें अधिकतर वे लोग हैं, जो 40 से ज्यादा उम्र के हैं और मायावती के कार्यकाल में सत्ता का स्वाद चख चुके हैं। लेकिन, उनके वोट शेयर में जो 9.35% की बड़ी गिरावट आई है, वह भी जाटवों के दूर होने से ही हुआ है। इनमें से युवा और कट्टर वर्ग का वोट भाजपा को हराने के लिए सपा को गया है और इनका जो एक बड़ा गरीब तबका है, जो गांवों में रहता है, जिसे फ्री राशन और योगी सरकार की योजनाओं का लाभ मिला है, उन्होंने बीजेपी को चुना है।

गैर-जाटव दलित जातियों ने पूरी तरह से छोड़ा मायावती का साथ ?
जहां, तक इस चुनाव में गैर-जाटव दलित जातियों का सवाल है तो दलित ऐक्टिविस्ट के मुताबिक लगता है कि इसबार उन्होंने पूरी तरह से मायावती का साथ छोड़ दिया है। सपा और भाजपा की ओर उनके जाने का पैटर्न लगभग वही है, जो जाटवों का है। ज्यादा कट्टर और युवा अखिलेश यादव से प्रभावित होकर उनकी ओर बढ़े हैं और गांवों में रहने वाली गरीब आबादी, जिसे वाकई बीजेपी सरकार की योजनाओं का फायदा पहुंचा है, वह उसके साथ डटकर खड़े हुए हैं।












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