UP Election 2022: अमित शाह की रैली में अचानक क्यों खाली होने लगी कुर्सियां, संजय निषाद को सीएम बनाने की मांग ?
लखनऊ, 18 दिसंबर: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सभी पार्टियां अपनी अपनी तैयारियों में जुटी हुई हैं। आने वाले समय में प्रचार अभियान में और तेजी आने की उम्मीद है। शुक्रवार को लखनऊ में हुई निषादों की रैली ने उस समय बीजेपी को असहज कर दिया जब भीड़ के बीच संजय निषाद को सीएम बनाने का गाना चलने लगा। दूसरी ओर लखनऊ में इस बात की चर्चा भी जोरों पर है कि आखिरकार 6 साल बाद साथ आए चाचा-भतीजे के बीच सुलह क्यों नहीं हुई।

अमित शाह की रैली में क्यों खाली होने लगीं कुर्सियां
इस महारैली की होर्डिंग में एक ओर बीजेपी के तमाम नेता दिख रहे थे, तो वहीं दूसरे सिरे पर डॉ संजय निषाद की तस्वीर थी। अमित शाह ने इस रैली में आश्वासन दिया है कि अगर बीजेपी की सरकार दोबारा बनती तो निषाद समुदाय के एजेंडे को पूरा किया जाएगा। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इस रैली में निषाद समुदाय अपेक्षा कर रहा था कि अमित शाह निषाद समुदाय की अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग को स्वीकार करेंगे। ऐसा नहीं हुआ और इसकी नाराज़गी दूर-दूर से उम्मीद लगाकर आए लोगों के बयानों में दिखाई दी।

बीजेपी के लिए कितने अहम हैं निषाद?
उत्तर प्रदेश की लगभग कई विधानसभा सीटों को प्रभावित करने वाला निषाद समुदाय दशकों से उत्तर प्रदेश की राजनीति में किंग मेकर की भूमिका निभाता रहा है। निषाद समुदाय और संजय निषाद गोरखपुर उपचुनाव में बीजेपी को अपना दमखम दिखा चुके हैं. संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद ने सपा के साथ मिलकर बीजेपी को उसके ही गढ़ गोरखपुर में मात दी थी। इसके बाद बीजेपी उन्हें अपने साथ जोड़ने में सफल रही। मगर संख्याबल को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस से लेकर सपा और बसपा समेत तमाम दल निषादों को अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या सच में मिल गए अखिलेश-शिवपाल के दिल
समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव के गुरुवार को प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के संस्थापक शिवपाल सिंह यादव के घर में घुसने पर परिवार का मिलन हो गया। शिवपाल यादव अखिलेश के चाचा और मुलायम के भाई हैं, और चाचा-भतीजा पांच साल में पहली बार सौहार्दपूर्वक मिल रहे हैं। लेकिन 40 मिनट की इस मुलाकात का मतलब सिर्फ एक समझौता करने से ज्यादा था। इसका मतलब आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एक मजबूत गठबंधन बनाना था। ऐसा लगता है कि विपक्षी दलों के लिए भाजपा के रथ को तोड़ने का यही एकमात्र तरीका है। हालांकि बीजेपी ने इसपर तंज कसते हुए कहा था कि ये नयी सपा नहीं ये वही सपा है।

लड़कियों की उम्र 18 से 21 होने पर क्यों मचा हंगामा
समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बुर्के ने भी लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने के फैसले पर विवादित बयान दिया है( समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बुर्के ने कहा, 'लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने से हालात और खराब होंगे। पहले 18 साल की उम्र भी काफी थी। यह उम्र बहुत दिनों से थी, नहीं तो इससे भी ज्यादा मौज-मस्ती के मौके मिलेंगे। शफीकुर रहमान बर्क ने महिलाओं के लिए शादी की कानूनी उम्र (शादी की कानूनी उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल करने) पर अपने अजीबोगरीब बयान 'लड़कियों को आने का मौका मिलेगा' के बाद कहा और कहा कि वह संसद में बिल का समर्थन नहीं करेंगे। हालांकि इससे पहले भी खुद मुलायम सिंह यादव रेप के एक मामले में विवादित बयान दिया था कि लड़कों से गलती हो जाती है। इस बयान ने भी काफी विवाद पैदा किया था।












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