One District-One Cuisine List: 2027 चुनाव से पहले UP सरकार के प्लेटर से नॉन-वेज गायब! किन 208 व्यंजनों को जगह?
Uttar Pradesh One District One Cuisine List: उत्तर प्रदेश सरकार ने 'एक जिला एक व्यंजन' (ODOC) योजना के तहत पूरे राज्य के 75 जिलों के लिए 208 व्यंजनों की आधिकारिक सूची जारी कर दी है। योजना का मकसद ODOP की तर्ज पर स्थानीय व्यंजनों को ब्रांडिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग और निर्यात के जरिए वैश्विक पटल पर ले जाना है। ₹150 करोड़ का बजट भी मंजूर। लेकिन इस प्लेटर पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक भी नॉन-वेज व्यंजन शामिल नहीं किया गया।
लखनऊ को रेवड़ी, आम के उत्पाद, चाट और मलाई मक्खन मिले हैं। आगरा को पेठा और दालमोठ। मथुरा को पेड़ा-माखन मिश्री। वाराणसी को ठंडाई, तिरंगा बर्फी, लस्सी और बनारसी पान। सुल्तानपुर को पेड़ा-समोसा-जलेबी, बाराबंकी को चंद्रकला, अमेठी को समोसा-गुलगुला, अयोध्या को चंद्रकला-बालूशाही-दही। पूरी सूची में मीठे, चाट, समोसे, कचौड़ी, इमरती, पेड़ा, हलवा, गुड़-खीर जैसे शाकाहारी आइटम्स ही छाए हुए हैं। आइए विस्तार से जानते हैं क्या-क्या गायब?

जिन व्यंजनों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया, वे यूपी की पाक-परंपरा की पहचान रहे हैं:
- लखनऊ: गलौती कबाब, टुंडे कबाब, अवधी बिरयानी, निहारी कुलचा, काकोरी कबाब
- मुरादाबाद: मुरादाबादी बिरयानी
- रामपुर: मटन कोरमा, सीख कबाब
- बरेली: मटन के लोकप्रिय व्यंजन
ये व्यंजन न सिर्फ अवधी-मुगलई संस्कृति के प्रतीक हैं, बल्कि दुनिया भर में यूपी की पाक-विरासत का पर्याय रहे हैं। UNESCO (यूनेस्को) ने 31 अक्टूबर 2025 को लखनऊ को आधिकारिक तौर पर 'क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी' (Creative City of Gastronomy) का दर्जा दिया है।
विशेषज्ञों की तीखी प्रतिक्रिया
प्रसिद्ध खाद्य इतिहासकार और Cuisine Society of India के अध्यक्ष पुष्पेश पंत ने इसे 'अधूरा कदम' बताया। उन्होंने PTI को दिए बयान में कहा, 'यह आधा-अधूरा कदम कट्टरता की बू देता है। संक्षेप में, अज्ञानतापूर्ण बकवास है।' पंत ने साफ कहा कि वे शाकाहारी व्यंजनों की भी सराहना करते हैं, लेकिन 'चुनिंदा भेदभाव क्यों?'

सरकार का जवाब: 'जानबूझकर नहीं किया, सूची लचीली है'
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कैबिनेट मंत्री राकेश सचान ने बताया कि यह कोई सोचा-समझा फैसला नहीं है। 'भविष्य में सिफारिश मिलने पर इन्हें शामिल किया जा सकता है। हमारा उद्देश्य किसी एक लोकप्रिय व्यंजन को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि पैकेजिंग, बिक्री और प्रचार के लिहाज से ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाभ पहुंचाना है।' सूत्रों के मुताबिक सूची लचीली है - स्थानीय सुझाव और जनमांग के आधार पर मुख्यमंत्री की मंजूरी से कभी भी बदलाव हो सकता है, कैबिनेट की जरूरत नहीं।
Uttar Pradesh One District-One Cuisine 208 Dishes List: 208 व्यंजनों की लिस्ट
- सुल्तानपुर- पेड़ा, समोसा, कढ़ाई पूरी, लाल पेड़ा, जलेबी
- बाराबंकी- चन्द्रकला, लाल पेड़ा
- अमेठी - समोसा, गुड़ की खीर, गुलगुला
- अम्बेडकर नगर - बालूशाही, चाट, खजला
- देवीपाटन मण्डल (गोण्डा) -दही बड़ा
- बहराईच- चमचम, कचौरी
- बलरामपुर- नारियल की बर्फी, कलाकंद, घमंजा, चाट
- श्रावस्ती - इमर्ती
- लखनऊ - रेवड़ी, आम उत्पाद, चाट, मलाई मक्खन
- आगरा- पेठा, दालमोठ
- फ़िरोज़ाबाद- टिक्की, कचौरी
- अलीगढ - डेयरी उत्पाद और कचौरी
- मथुरा- पेड़ा और माखन मिश्री
- मुरादाबाद - दाल के व्यंजन, हांडी का हलवा
- हरदोई -आलू पूड़ी, लड्डू, लौझड़
- लखीमपुर खीरी- केला, गुड़, खोया पेड़ा, खीर मोहन, रसगुल्ला
- रायबरेली - मसाले
- सीतापुर- माखन मलाई, समोसा, मिर्ची पकौड़ा, पेड़ा
- उन्नाव- काला जामुन, समोसा, कुशली, त्रिलोक परी
- अयोध्या - चंद्रकला, बालूशाही, दही
- ज़मगढ़ - सफेद गाजर का हलवा
- महोबा - खजूर का गुड़
- मेरठ- गजक और रेवड़ी
- प्रयागराज- कचौरी, समोसा और रसमलाई
- हमीरपुर -बुंदेली दाल से तैयार की गई तैयारियां
- वाराणसी - ठंडाई, तिरंगा बर्फी, लस्सी और बनारसी पान
राजनीतिक एंगल: 2027 से पहले सांस्कृतिक शिफ्ट?
यह सूची ठीक 2027 विधानसभा चुनाव से पहले आई है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने दिसंबर 2025 में योजना की घोषणा की थी और 24 जनवरी 2026 को अमित शाह ने लखनऊ में लॉन्च किया। आलोचकों का कहना है कि अवधी-मुगलई मिली-जुली संस्कृति (जिसमें हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों का योगदान है) को शाकाहारी 'सफेदी' में रंगने की कोशिश की जा रही है। यूपी की खान-पान की पहचान सदियों से बहुलवादी रही है। और कबाब-बिरयानी उसके अंग हैं।
ODOC योजना निस्संदेह ODOP की सफलता को खाने के क्षेत्र में ले जाने का अच्छा प्रयास है। लेकिन जब यूपी जैसी विविधतापूर्ण पाक-संस्कृति को केवल शाकाहारी चश्मे से देखा जाता है, तो सवाल उठना लाजमी है। क्या यह सिर्फ ब्रांडिंग का मुद्दा है या सांस्कृतिक पहचान को नई आधिकारिक छवि देने का सियासी प्रयोग? सरकार कह रही है सूची बदल सकती है। अब देखना यह है कि 2027 चुनाव से पहले जनमत और सिफारिशें कितनी जल्दी नॉन-वेज को प्लेटर पर जगह दिला पाती हैं। विरासत को बचाना या नई छवि बनाना - बहस जारी रहेगी। यूपी की थाली अब सिर्फ मीठी नहीं, बल्कि सवालों से भरी हुई है।













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