UP में आजम की अगुवाई में होगी मुस्लिम विधायकों की लामबंदी ?, क्या समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ेंगे मुसलमान
लखनऊ, 5 मई: उत्तर प्रदेश में एक तरफ जहां शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच शीतयुद्ध छिड़ा हुआ है वहीं दूसरी ओर जेल में बंद आजम खां अब समाजवादी पार्टी के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी करने वाले हैं। यूपी में हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में सपा के सबसे अधिक विधायक जीते थे। सपा और उसके सहयोगियों को मिलाकर 34 मुस्लिम विधायक जीतकर सदन में पहुंचे थे लेकिन सूत्रों की माने तो ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि मुस्लिम विधायकों में अखिलेश के प्रति नाराजगी दिखाई दे रही है। माना जा रहा है कि मुस्लिम विधायक एकजुट होकर आजम की अगुवाई में नया मोर्चा बना सकते हैं। हालांकि राजनीतिक पंडितों की माने तो यह इतना आसान नहीं है लेकिन इसकी संभावनाएं बराबर बनी हुई हैं।

अखिलेश से क्यों नाराज है आज़म ख़ान का ख़ेमा?
दरअसल यूपी की सियासत में आजम खां एक बड़ा नाम है। आजम इस समय जेल में बंद हैं लेकिन उनके समर्थक लगातार अखिलेश पर निशाना साध रहे हैं। आजम के समर्थकों का आरोप है कि जब एक राष्ट्रीय अध्यक्ष अपने खास नेता के साथ नहीं खड़ा रह सकता तो फिर वह आम कार्यकर्ताओं के साथ कैसे खड़ा रह सकता है। हालांकि अखिलेश यादव ने आजम समर्थकों और शिवपाल को करारा जवाब देते हुए कहा कि पार्टी हमेशा आजम साहब के साथ खड़ी है। राजनीतिक पंडितों की माने तो दरअसल अब अखिलेश की राजनीति बदल चुकी है और वो अब 80 और 20 के समीकरण में केवल 20 फीसदी वर्ग के साथ खड़े होना नहीं दिखना चाहते जैसा कि उनके पिता मुलायम सिंह किया करते थे।

क्या मुसलमान विधायक बनाएंगे अपना राजनीतिक दल?
2022 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में 34 मुसलमान विधायक चुन कर आये हैं। पिछली बार इनकी संख्या 24 थी जिसमें 21 विधायक पश्चिम उत्तर प्रदेश से, छह मध्य उत्तर प्रदेश से और सात पूर्वांचल से जीते हैं। 34 में से 31 विधायक सपा के हैं, दो उसकी सहयोगी दल आरएलडी और एक सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का, जो भी सपा गठबंधन का हिस्सा है। अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या यह 34 विधायक एकजुट होकर मुसलमानों के हक की राजनीति कर सकते हैं? क्या इसके लिए वो आजम को अपना नेता मानकर चलेंगे। पत्रकार रिजवान अहमद कहते हैं कि कहीं न कहीं यह बात उठ रही है, लेकिन मुसलमानों का कोई भी नेता कभी मुसलमान नहीं बना है। कभी मुलायम सिंह नेता बने, कभी मायावती। ओवैसी पर बीजेपी के होने का ठप्पा लगा है। कहीं ना कहीं यह बात उठ रही है कि इन्हें इकठ्ठा होकर अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। उसकी अगुवाई कौन करेगा, यह एक बड़ा सवाल है।

मुसलमानों ने आजम को कभी नेता नहीं माना ?
राजनीतिक पंडितों की माने तो भाजपा में न तो मुसलमानों का मन मिलेगा, ना बात मिलेगी। इतनी तादाद में भाजपा की ओर मुसलमान ना जा पाएं। हो सकता है यह लोग कांग्रेस का रुख़ करें। और ऐसा नहीं तो वो अपनी पार्टी भी बना सकते हैं। किसी दल में जाते हैं तो दूसरी बात है, लेकिन अगर पार्टी बनाते हैं तो वो बड़ा परिवर्तन होगा। क्या आज़म ख़ान के पक्ष में मुसलमानों की गोलबंदी हो सकती है? इस सवाल पर रिजवान अहमद कहते हैं, "आज़म ख़ान की 35-36 सालों की जो राजनीति रही है, उसमें मुसलमानों ने उन्हें अपने नेता के रूप में नहीं स्वीकारा है। वो समाजवादी पार्टी का मुस्लिम चेहरा तो थे, लेकिन वो मुस्लिम नेता कभी नहीं थे। आज़म ख़ान की जो उम्र है, जो उनके मुक़दमे हैं, उसकी वजह से मुसलमान उनका नेतृत्व स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

समाजवादी के 34 विधायक सदन में पहुंचे
यूपी विधानसभा में अब तक 2012-2017 के कार्यकाल में सबसे ज्यादा मुस्लिम विधायक 69 रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इनमें से 45 विधायक उस वक्त समाजवादी पार्टी के थे। 1991 में, राज्य विधानसभा ने कथित तौर पर सबसे कम आंकड़ा देखा जब केवल 17 मुस्लिम विधायक चुने गए थे। रिपोर्टों के अनुसार, 2022 के राज्य चुनावों में, मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने 88 मुस्लिम नेताओं को टिकट दिया था, जबकि समाजवादी पार्टी ने 64 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने 60 से अधिक सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए थे।












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