UP में नए BOSS की रेस: ब्राह्मण-ओबीसी में फंसी BJP लेगी चौकाने वाला फैसला ?, जानिए इसकी वजहें

लखनऊ, 24 जून: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए तीन महीने से ज्यादा हो चुके हैं। प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह अब तिहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। जी हां एक तरफ तो वह सरकार में जलशक्ति मंत्री हैं और दूसरे विधान परिषद में बीजेपी के नेता सदन भी हैं। इसके अलावा उनके पास बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी है लेकिन पिछले एक महीने के उनके कामकाज पर नजर डालें तो वह अपने को संगठन के कामकाज से अलग कर चुके हैं। इस नाते अब संगठन के कामकाज और चल रहे कार्यक्रमों की पूरी कमान संगठन मंत्री सुनील बंसल के पास है। लेकिन सवाल ये है कि क्या बंसल के हाथ में ही कमान रहेगी या बीजेपी आलाकमान नया प्रदेश अध्यक्ष चुनेगा। हालांकि सूत्रों की माने तो आलाकमान को उस स्तर का कोई व्यक्ति नहीं मिल रहा है जैसी की वह तलाश कर रहा है।

यूपी में जारी है नए बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़

यूपी में जारी है नए बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के नए अध्यक्ष की दौड़ जारी है। जल शक्ति मंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ कैबिनेट में राज्य इकाई के प्रमुख स्वतंत्र देव सिंह को शामिल करने के बाद, पार्टी एक विश्वसनीय चेहरे की तलाश में है जो यूपी में संगठन की कमान संभाल सके। कम से कम आधा दर्जन वरिष्ठ नेताओं के नाम चर्चा में हैं लेकिन आलाकमान किसी भी नाम पर निर्णय ले पा रहा है। सूत्रों की माने तो आलाकमान भी ऐसे प्रदेश अध्यक्ष की तलाश में है जो लकीर का फकीर न रहे। उसमें काम करने का मद्दा हो और अपनी संगठन को आगे ले जा सके। यह देखना रोचक होगा कि बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष की यह दौड़ कब समाप्त होगी।

तेलंगाना राष्ट्रीय कार्यसमिति से पहले हो सकती है ताजपोशी

तेलंगाना राष्ट्रीय कार्यसमिति से पहले हो सकती है ताजपोशी

यूपी बीजेपी के कुछ नेताओं का मानना ​​है कि पार्टी संगठन के भीतर से एक नेता को इस पद पर पदोन्नत किया जाना चाहिए, जबकि अन्य पदाधिकारियों ने संकेत दिया कि यह पद यूपी के एक वरिष्ठ भाजपा सांसद के पास जा सकता है। जून के अंत तक एक नए राज्य इकाई प्रमुख के नाम को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है। इससे पहले, भाजपा जयपुर में अपने पदाधिकारियों की एक राष्ट्रीय बैठक कर चुकी है जो 21 मई को समाप्त हुई थी। अब सूत्रों की माने तो तेलंगाना में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय कार्यसमिति से पहले बीजेपी के नए अध्यक्ष की ताजपोशी हो सकती है।

किसी ओबीसी नेता को ही कमान सौंपने की तैयारी ?

किसी ओबीसी नेता को ही कमान सौंपने की तैयारी ?

स्वतंत्र देव सिंह एक प्रमुख ओबीसी नेता हैं और ऐसी अटकलें हैं कि पार्टी यूपी इकाई में शीर्ष पद के लिए एक और ओबीसी चेहरा चुन सकती है। हालांकि, कुछ वरिष्ठ भाजपा नेताओं को लगता है कि चूंकि सभी प्रमुख जातियों और समुदायों को आदित्यनाथ कैबिनेट या पार्टी संगठन में प्रतिनिधित्व दिया गया है, जाति एक निर्णायक कारक नहीं हो सकती है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि, "अब जब विधानसभा चुनाव खत्म हो गए हैं, तो पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखेगी और संगठन के किसी वरिष्ठ नेता या किसी वरिष्ठ सांसद को यूपी बीजेपी प्रमुख के रूप में चुन सकती है। पार्टी प्रयोग करने के मूड में नहीं है इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि किसी विशेष जाति के नेता को वरीयता मिलेगी।"

ब्राह्मण चेहरे पर क्यों नहीं दांव लगाना चाहती बीजेपी

ब्राह्मण चेहरे पर क्यों नहीं दांव लगाना चाहती बीजेपी

यूपी में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर पिछले तीन महीने से जिन नामों की चर्चा चल रही है उसमें पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष विजय बहादुर पाठक और महासचिव अश्विनी त्यागी और अमरपाल मौर्य हैं। राज्य इकाई के बाहर से, संभावित हैं बस्ती के सांसद हरीश द्विवेदी, देवरिया के सांसद रमापति राम त्रिपाठी, कन्नौज के सांसद सुब्रत पाठक और केंद्रीय मंत्री बी.एल. वर्मा और भानु प्रताप सिंह वर्मा का नाम शामिल है। हालांकि कुछ लोगों का दावा है कि ब्राह्मण ही प्रदेश अध्यक्ष होगा क्योंकि पिछले दो लोकसभा चुनावों में बीजेपी का इतिहास इसी तरफ इशारा कर रहा है। सूत्रों की माने तो डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक को जिस तरह से संगठन और सरकार की तरफ से प्रमोट किया जा रहा है उससे नहीं लगता कि कोई दूसरा ब्राह्मण नेता प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी संभालेगा।

चौंकाने वाला फैसला भी ले सकता है आलाकमान

चौंकाने वाला फैसला भी ले सकता है आलाकमान

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष को लेकर जिस तरह से कशमकश चल रही है उससे यह भी संभव है कि ब्राह्मण और ओबीसी के बीच बीजेपी नेतृत्व कोई नया दांव खेलकर सबको चौंका सकता है। सूत्रों की माने तो ब्राह्मण और ओबीसी के बीच किसी ऐसे वरिष्ठ नेता को जिम्मेदारी दी सकती है जो किसी ऐसे समुदाय या जाति से जुड़ा हो जिसका यूपी में कोई खास मतलब न हो लेकिन उसमें संगठन चलाने का मद्दा हो। हालांकि इस तरह के नेता की तलाश कब पूरी होगी यह देखने वाली बात होगी।

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