नेताजी देख लीजिए, शिवपाल चाचा साइकिल के टायर की हवा निकाल कर भाग रहे हैं

चुनाव आयोग से लौटते हुए मुलायम जब अखिलेश की पास से गुजरे तो हमने भी कान लगा लिया कि देखें नेताजी के मन में क्या चल रहा है। दोनों के बीच शिवपाल, रामगोपाल और अमर सिंह को लेकर हुई बातचीत हमने सुन ली।

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में एक तरफ चुनाव की सरगर्मी हर रोज बढ़ रही है तो वहीं समाजवादी पार्टी में लड़ाई भी हर रोज बढ़ती जा रही है। साइकिल की सवारी करने को मुलायम और अखिलेश आमने-सामने हैं। बात चुनाव आयोग तक पहुंच गई है।

आज दोनों तरफ के लोग चुनाव आयोग में पहुंचे तो उम्मीद थी कि किसी एक गुट को साइकिल मिल जाएगी लेकिन आयोग ने मामला आगे के लिए टाल दिया। तो दोनों तरफ के लोग घर जाने के लिए निकले। मुलायम जब अखिलेश की पास से गुजरे तो हमने भी कान लगा लिया कि देखें नेताजी के मन में क्या चल रहा है। लीजिए सुनिए बाप-बेटे के बीच क्या बातचीत हुई।

नेताजी देख लीजिए, शिवपाल चाचा साइकिल के टायर की हवा निकाल कर भाग रहे हैं

नेताजी- अरे अक्लेस, भागे काहे जा रहे हो. हम बुढ़ा गए हैं तो क्या दो कदम साथ भी ना चलोगे?

अखिलेश-नेताजी, कैसी बाते करते हैं. आप मेरे पिता, मेरे गुरू सब कुछ हैं लेकिन अब मैं आपके इस इमोशनल अत्याचार में नहीं आने वाला। आप मुझसे सारी बाते मनवा लेंगे और फिर मेरी जेब से माल निकालकर जाकर चाचा शिवपाल को सौंप देंगे।

नेताजी-तो फिर क्या हुआ, सिप्पाल क्या तुमाए चाचा नहीं हैं? क्यों चिढ़े हुए हो तुम चाचा से। गोद में खिलाए है तुमे सिप्पाल, अब तुम उस पर निगाह तिच्छी कर रए हो।

अखिलेश-नेताजी, आपको बरगला दिया है चाचा और अकंल ने कि साइकिल ले लो बेटे से। आप अब पोते-पोतियों के साथ खेलिए. नए नेताओं को आशीर्वाद दीजिए और मजे लीजिए। अब बुढ़ापे में आप साइकिल का क्या करेंगे।

नेताजी- साइकिल देने को हम कब मना किए तुमे, हम तो कहे तुम गद्दी पर बैठकर चलाओ, हमें पीछे कैरियर पर बैठा लो, तुम उसके लिए भी तैयार नई।

अखिलेश- हम आपको पीछे बैठाने को कब मना किए, लेकिन चाचा शिवपाल बार-बार साइकल के टायर की हवा निकाल कर भाग जाते हैं। हम हवा भरते हैं तो चाचा साइकिल पीछे से खींचते रहते हैं चलने नहीं देते। हम कित्ती बढ़िया साइकिल चलाते हैं, ये आप जानते हैं नेताजी लेकिन आपके कैरियर पर बैठते ही चाचा कहते हैं गिरा देगा, गिरा देगा और आप उनकी बातों में आकर उतर जाते हैं नेताजी, हमें बताइए कि क्या आप हमें अभी भी सीखू साइकिल चलाने वाला मानते हैं।

नेताजी- तुम गलत सोच रए हो, सिप्पाल ने पाटी के लिए बहुत काम किया है वो तो हमे आगाह करता है कि कहीं तुम अमें सैफई ले जाकर ना पटक दो और हमाई इच्छा है दिल्ली जाने की. बस इसी बात से डरते हैं थोआ।

अखिलेश- नेताजी, हम आपके बेटे हैं हमें साइकिल से लखनऊ जाने दो फिर हम खुद तुमको साइकिल दे देंगे चले जाना दिल्ली। लेकिन चाचा से कहिए साइकिल का कैरियर खींचना छोड़ दें और अभी हमें जाने दो।

नेताजी- चाचा.. चाचा... बेटा अक्लेस, पीछे से कोई नहीं खींच रहा तेरी साइकिल ये डंडे पे जो आमओपाल बैठा है, ये नहीं चलने दे रहा. इसको उताए दे.

अखिलेश- नेताजी, रामगोपाल चाचा ही तो आगे बैठकर बताएंगे कि किधर से जाना है। आप कह रहे हैं इनको ही उतार दूं।

नेताजी- तेरे पैदा होने से पहले से राजनीति कर रहा हूं. मैं और सिप्पाल तो साइकिल के पीछे हैं तो फिर ये आगे के टायर की हवा किन्ने निकाई? अक्लेस, तू समज नहीं रहा हैं आमओपाल की मुट्ठी खुलवा उसमें सुईं हैं. इसने अबी-अबी टायर में मारी है।

अखिलेश- नेताजी, आपको शिवपाल चाचा पता नहीं क्या-क्या बता रहे हैं। रामगोपाल चाचा एक दावत से आए हैं, उनके हाथ में माउथस्टिक है, वो दांत कुरेद रहे हैं और आप हैं कि..

नेताजी- तो तुम बाप की ना मानेगे लेकिन इस आमओपाल की मानोगे?

अखिलेश- नेताजी फिर आप कहते हैं क्यों लड़ता है, देख लीजिए अब देखिए आप... आप रामगोपाल, रामगोपाल करते रहो वो अमर सिंह अंकल चैन उतार के भाग गए मेरी साइकिल की, अब बताओ कैसे चलेगी साइकिल? हमारे बातों में लगते ही ये अमर सिंह बार-बार चैन उतार के भागता है और आप हैं के... हुंह

नेताजी- तो तुम ना मानोगे अक्लेस, अपनी-अपनी चलाओगे?

अखिलेश- नेताजी, आप मेरे पिता हैं और मैं आपका बेटा. आप ना मानेंगे तो मैं भी ना मानूंगा।

नेताजी- अक्लेस, हम बताए रहे, मान जाओ वरना और तरीके भी हमें आते हैं समझाए के.

अखिलेश- नेताजी, अब आपकी कुछ नहीं चलने वाली. आपके अब साइकिल का हैंडल मेरे हाथ में हैं और गद्दी मेरे नीचे।

नेताजी-तो तू साइकल लेकर भाग जाएगा.. हां?

अखिलेश- हां भाग जाउंगा, साइकिल लेकर दौड़ जाऊंगा मैं, आप नहीं मानते तो...

नेताजी- तो जा, ले जा साइकिल.. ये ले अब ले जा.. गद्दी उतार ली मैंने..

अखिलेश- नेताजी, मैं अब साइकिल कैसे चलाऊंगा. गद्दी आपने उतार ली, अगर कहीं बैठने की जरूरत पड़ी तो?

नेताजी- हमाई नहीं मानता तो जा चला ले ऐसे ही साइकिल.. देखता हूं कब तक चलाएगा बिना बैठे, जा.... सिप्पाल अरे सिप्पाल आओ घर चलो। (यह एक व्यंग्य लेख है)
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