Premanand Maharaj Secrets: कानपुर के अनिरुद्ध पांडेय कैसे बन गए वृंदावन के प्रेमानंद महाराज? 8 अनसुने राज
Premanand Maharaj Secrets: वृंदावन के भक्ति रसवतार संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज, जिन्हें करोड़ों भक्त प्रेमानंद महाराज कहकर पुकारते हैं, आज दुनिया भर में राधा-कृष्ण की भक्ति के प्रतीक हैं। लेकिन उनकी जिंदगी की शुरुआत उत्तर प्रदेश के कानपुर के सरसौल ब्लॉक के अखरी गांव के एक साधारण ब्राह्मण परिवार से हुई, जहां उनका नाम अनिरुद्ध कुमार पांडेय था।
13 साल की उम्र में घर छोड़कर संन्यास लेने वाले अनिरुद्ध ने काशी की गंगा तटों से गुजरते हुए वृंदावन की राधा भक्ति को अपनाया। आज उनकी किडनी की बीमारी के बीच भी भक्ति का जज्बा देख भक्त दंग हैं। आइए, जानते हैं अनिरुद्ध से प्रेमानंद बनने के 8 अनसुने राज, जो आज तक कम ही लोगों को पता हैं...

राज 1: अखरी गांव का साधारण बचपन - शिव भक्ति की नींव
अनिरुद्ध का जन्म 30 मार्च 1969 को कानपुर के सर्सौल ब्लॉक के अखरी गांव में शंभू नारायण पांडेय और रमा देवी के घर हुआ। पिता पुरोहित थे, और परिवार में 3 भाई थे - अनिरुद्ध मंझले। गांव के प्राइमरी स्कूल के सामने पतली गली में उनका पैतृक घर आज भी है, जहां नेमप्लेट पर 'श्री गोविंद महाराज प्रेमानंद' लिखा है। बचपन से अनिरुद्ध पूजा-पाठ में डूबे रहते। बड़े भाई गणेश दत्त पांडेय बताते हैं, 'हर पीढ़ी में कोई संत निकला। अनिरुद्ध को शिव भक्ति विरासत में मिली। वे भगवद्गीता पढ़ते और ध्यान करते।' 8वीं तक पढ़ाई की, लेकिन 9वीं में भास्करानंद विद्यालय छोड़ दिया।
राज 2: 13 साल की उम्र में संन्यास - घर छोड़ने का फैसला
13 साल की उम्र में अनिरुद्ध का मन घर से उचट गया। शिव मंदिर में चबूतरा बनाने का सपना टूटा, जब ग्रामीणों ने रोक दिया। मन उदास हो गया। बिना बताए घर छोड़ दिया। परिवार ने खोजा, तो सरसौल के नंदेश्वर मंदिर में मिले। घर लाने की कोशिश नाकाम। अनिरुद्ध ने कहा, 'मैं भगवान के पास जा रहा हूं।' नाम बदलकर आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी हो गए।
राज 3: सरसौल से महराजपुर, कानपुर - भूखे-प्यासे की तपस्या
घर छोड़ने के बाद अनिरुद्ध पांडेय (Anirudh Pandey) सरसौल नंदेश्वर मंदिर पहुंचे। 14 घंटे भूखे-प्यासे ध्यान किया। फिर महराजपुर के सैमसी मंदिर, कानपुर के बिठूर, और काशी चले गए। काशी में 15 महीने रहे। वाराणसी के तुलसी घाट पर गंगा स्नान, शिव-गंगा पूजन, और रोज एक बार भिक्षा। कई दिन बिना भोजन के रहे। संतों ने कहा, 'यह तपस्या है।'
राज 4: काशी में बिगड़ी तबीयत, डॉक्टरों ने राधा-रानी की शरण में भेजा
काशी में अनिरुद्ध की अचानक तबीयत खराब हो गई। संतों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। दोनों किडनी खराब होने पर, डॉक्टरों ने उन्हें वृंदावन जाने की सलाह दी। कहा कि अनिरुद्ध तुम वृंदावन जाओ, राधा-रानी सबकुछ ठीक कर देंगी।
राज 5: वृंदावन की ओर यात्रा - राधा नाम जप शुरू
अनिरुद्ध ने काशी-मथुरा ट्रेन पकड़ी। वृंदावन पहुंचे। वहां श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज ने अनिरुद्ध को रासिक संत बनाया। 10 साल गुरु सेवा की। नाम प्रेमानंद गोविंद शरण हो गया। महाराज ने राधा नाम जप शुरू किया। 2016 में श्री हित राधा केली कुंज ट्रस्ट बनाया।
राज 6: किडनी की बीमारी का खुलासा - 2006 में पेट दर्द से शुरू
2006 में पेट दर्द हुआ। कानपुर के डॉक्टर ने पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज (PKD) बताई - आनुवंशिक बीमारी। दिल्ली में जांच से दोनों किडनी फेल। डॉक्टरों ने कहा, 'जीवन सीमित।' अनिरुद्ध ने वृंदावन लौटकर राधा जप बढ़ाया। किडनियों का नाम 'कृष्णा' और 'राधा' रखा।
राज 7: ऑस्ट्रेलिया से डॉक्टर दंपति की सेवा - नौकरी छोड़ वृंदावन आए
महाराज के भक्तों में ऑस्ट्रेलिया के हार्ट स्पेशलिस्ट डॉ. राजेश कुमार और उनकी प्रोफेसर पत्नी हैं। एक सत्संग में प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। वृंदावन में फ्लैट लिया, रोज महाराज की सेवा करते हैं। डॉ. राजेश ने कहा, 'महाराज की भक्ति ने हमें बुलाया।'
राज 8: राधा नाम जप का चमत्कार - 19 साल से किडनी फेल, फिर भी स्वस्थ
PKD में किडनी फेल होने पर जीवन 2-3 साल रहता है, लेकिन महाराज 19 साल से बिना किडनी जीवित हैं। राधा जप, ब्रह्मचर्य, और सात्विक जीवन का श्रेय। वे कहते हैं, 'राधा रानी की कृपा से सब संभव।' भक्त किडनी दान की पेशकश करते हैं, लेकिन महाराज ठुकराते हैं।
महाराज की भक्ति सीमाओं से परे है। मदीना के सुफियान अल्लाहाबादी ने दुआ की। कलियर दरगाह में मुस्लिम भक्त चित्र चढ़ाते हैं। महाराज कहते हैं, 'भक्ति धर्म की नहीं, प्रेम की है।' अनिरुद्ध पांडेय से प्रेमानंद महाराज बनने का सफर भक्ति, तपस्या, और चमत्कार की कहानी है। कानपुर के गांव से वृंदावन के राधा कुंज तक, उनकी जिंदगी लाखों को प्रेरित करती है।
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