Mukhtar and Afzal: आजमगढ़-रामपुर-मैनपुरी के बाद अब Ghazipur By Election पर टिकी निगाहें
2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से यूपी में तीन लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हो चुका है। इससे पहले रामपुर, आजमगढ़ और मैनपुरी में उपचुनाव हो चुका है। इन तीन सीटों में दो बीजेपी और एक सीट सपा के पाले में गई है।

Afzal set to lose LS membership: उत्तर प्रदेश में एक तरफ जहां यूपी निकाय चुनाव की सरगर्मी बढ़ी हुई है वहीं दूसरी ओर निकाय चुनाव समाप्त होते ही यूपी में एक और लोकसभा सीट पर उपचनुाव की गूंज सुनाई देगी। यूपी में रामपुर-आजमगढ़ और मैनपुरी के बाद अब गाजीपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव का ऐलान कभी भी निर्वाचन आयोग की तरफ से किया जा सकता है। 2024 के सियासी रण में उतरने से पहले एक बार फिर विपक्ष और सरकार आमने सामने होंगे और दोनों को अपने आपको आजमाने का एक मौका मिल सकता है।

2019 लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के बीच था गठबंधन
पिछली बार जब 2019 में लोकसभा के चुनाव हुए थे तब गाजीपुर के राजनीतिक और सियासी समीकरण पूरी तरह से बदले हुए थे। इस चुनाव में बसपा की चीफ मायावती और सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। सपा-बसपा के गठबंधन के बाद यह सीट बसपा के खाते में गई थी और इस सीट से बाहुबली माफिया मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी को बसपा ने टिकट दिया था। इस चुनाव में दलित-मुस्लिम-यादव का ऐसा कंबिनेशन बना कि तत्कालीन कैबिनेट मंत्री मनोज सिन्हा को हार का सामना करना पड़ा था।

2014 में मनोज सिन्हा ने मोदी लहर में जीता था चुनाव
2019 से पहले 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर अपने चरम पर थी। उस समय मनोज सिन्हा को बीजेपी ने टिकट दिया था। इस चुनाव में सपा और बसपा के बीच गठबंधन नहीं था जिसकी वजह से मनोज सिन्हा यह सीट जीतने में सफल रहे थे। राजनीति के इतिहास में यह पहली बार हुआ जब बीजेपी की सरकार केंद्र के सत्ता में थी और गाजीपुर में बीजेपी का सांसद जीता था नहीं तो सामान्य तौर पर इस सीट का एक इतिहास रहा है कि यहां के लोग हमेशा से ही सत्ता विरोधी सांसदों को जिताते रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद मनोज सिन्हा ने गाजीपुर और बनारस समेत पूरे पूर्वांचल में विकास कराने का काम किया। विकास के दम पर उनको विश्वास था कि अगले चुनाव में वह आसानी से चुनाव जीत जाएंगे लेकिन 2019 का चुनाव उनके लिए एक बड़ा सबक लेकर आया और वह चुनाव हार गए।

मैनपुरी-आजमगढ़-रामपुर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव
दरअसल यूपी में 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद तीन लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हो चुके हैं। अफजाल की तरह ही रामपुर में एक मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद आजम खां की लोकसभा की सदस्ता चली गई थी। जिसके बाद उपचुनाव में यह सीट बीजेपी ने जीत ली। वहीं आजमगढ़ सीट पर उपचुनाव इसलिए कराना पड़ा क्योंकि विधानसभा चुनाव में मैनपुरी की करहल से विधानसभा चुनाव लड़कर अखिलेश ने विधानसभा में रहने का फैसला किया था। करहल से जीतने के बाद उन्होंने आजमगढ़ सीट छोड़ दी थी। यहां हुए उपचुनाव में बीजपी ने दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ को टिकट दिया था जो जीतने में सफल रहे। तीसरा उपचुनाव मैनपुरी में अखिलेश के पिता और यूपी के पूर्व सीएम मुलायम सिंह के निधन के बाद मैनपुरी सीट पर हुआ। इस सीट पर सपा ने अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव को टिकट दिया जो बड़े अंतर से जीतने में सफल रहीं थीं।

गाजीपुर लोकसभा उपचुनाव में दिखेगा रोचक मुकाबला
मैनपुरी-रामपुर-आजमगढ़ में दो सीटों पर बीजेपी और एक सीट पर सपा की जीत के बाद गाजीपुर उपचुनाव में एक रोचक मुकाबला हो सकता है। हालांकि पिछले चुनाव की अपेक्षा इस बार सियासी समकीरण बिल्कुल अलग होंगे। एक तरफ जहां बसपा मुस्लिम-दलित समीकरण पर फोकस रही है वहीं अखिलेश मुस्लिम-यादव समीकरण को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। इन दोनों के बीच बीजेपी मोदी और योगी की नीतियों के सहारे एक बार फिर मैदान में होगी। खासतौर से ऐसे समय में जब अतीक अहमद-अशरफ की हत्या और अंसारी बंधुओं पर नकेल कसने की वजह से बीजेपी पूर्वांचल में ध्रुवीकरण कराने में कामयाब साबित हो रही है।

बसपा सांसद अफजाल के दोषी करार दिए जाने के बाद रिक्त होगी यह सीट
बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) के सांसद अफजाल अंसारी को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक विशेष अदालत द्वारा शनिवार को उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम मामले में चार साल की कैद की सजा सुनाए जाने के बाद उनकी लोकसभा सदस्यता कभी भी समाप्त हो सकती है। सजा सुनाए जाने के बाद अफजाल को तुरंत हिरासत में ले लिया गया था। दरअसल, 2013 के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के अनुसार, एक सांसद एवं विधायक की सदस्यता रद्द कर दी जाती है यदि उसे दोषी ठहराया जाता है और दो साल या उससे अधिक की सजा सुनाई जाती है। अफजल ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को हराकर गाजीपुर निर्वाचन क्षेत्र से 2019 का लोकसभा चुनाव जीता था।
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