अंसारी बंधुओं से मायावती का मोहभंग, पूर्वांचल में कितना उठाना पड़ेगा इसका नुकसान: इनको इग्नोर करना आसान नहीं

लखनऊ, 13 सितम्बर: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दलों ने अपनी अपनी तरफ से बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी ने कुछ दिनों पहले ही बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के भाई और मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट से पूर्व विधायक सिबगतुल्लाह अंसारी को पार्टी में शामिल कराया था उसके बाद अब बसपा ने अंसारी बंधुओं से किनारा करने का ऐलान किया है। पूर्वांचल में अंसारी बंधुओं को दरकिनार करने के बाद बसपा को कितना नुकसान होगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन राजनीतिक दलों की बदलती चाल से पूर्वांचल का समीकरण रोचक जरूर होता जा रहा है।

मुख्तार अंसारी

दरअसल, जनवरी 2017 में, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अभियान के लिए मतदान से कुछ हफ्ते पहले ही बहुजन समाज पार्टी ने दागी विधायक मुख्तार अंसारी, उनके भाइयों अफजल अंसारी को बसपा में शामिल करने का जोखिम भरा कदम उठाया था। इसके साथ ही पूर्व विधायक सिगबतुल्लाह अंसारी, और पुत्र अब्बास भी बसपा में शामिल हुए थे। तब मायावती के प्रतिद्वंद्वी और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी स्वच्छ छवि को ध्यान में रखते हुए अंसारी बंधुओं को पार्टी में लेने से मना कर दिया था। लेकिन आज सीन पूरी तरह से बदल चुका है वही सपा अंसारी बंधुओं को गले लगाने को तैयार बैठी है तो बसपा की बहनजी ने उनको दागी और अपराधी बताकर दूरी बना ली है।

पिछले चुनाव में घाटे का सौदा साबित हुए अंसारी बंधु
पिछले चुनाव के दौरान विधायक मुख्तार अंसारी को शामिल किए जाने का बचाव करते हुए मायावती ने कहा था कि, "अन्य दलों में बड़े गुंडे हैं। मुख्तार अंसारी के खिलाफ कई आपराधिक मामले ऐसे हैं जो वास्तविक नहीं हैं।'' मायावती को तब इस बात का लालच था कि पूर्वांचल के गाजीपुर, मऊ, बलिया और वाराणसी में अंसारियों के दबदबे से लाभ मिल सकता है। अपनी रणनीति के तहत मुसलमानों को एक बड़ा संदेश भी दिया था लेकिन उनकी यह चाल कामयाब नहीं हुई थी और पूर्वांचल में मुस्लिम और दलितों का गठजोड़ नहीं बन पाया था।

मायावती

समय के साथ बहनजी ने बदला अपना रुख
अगले विधानसभा चुनाव में जाने से पहले मायावती ने कहा कि, "आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में, बसपा कोशिश करेगी कि कोई बाहुबली या माफिया पार्टी से चुनाव न लड़ेगा," उन्होंने घोषणा की कि भीम राजभर मऊ से नए उम्मीदवार होंगे। राजभर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं और ओबीसी राजभर समुदाय से हैं। मायावती ने अब अंसारी बंधुओं से पीछा छुड़ाकर नई रणनीति तैयार की है। इसके मुताबिक वो अब मुस्लिम से ज्यादा राजभरों पर फोकस करना चाहती हैं। राजभर समुदाय भी पूर्वांचल की कई सीटों पर अहम भूमिका निभाता है और मायावती को पता है कि राजभर समुदाय यदि साथ आ गया तो मुस्लिम से ज्यादा कारगर साबित होगा।

राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफेसर डॉ मुकेश मिश्रा कहते हैं कि,

'' सियासत में समय के बड़े मायने होते हैं। सपा और बसपा के लिए परिस्थितियां बिलकुल बदल चुकी हैं। जिन बाहुबलियों से पहले अखिलेश ने दूरी बनाई वो मायावती को रास आ रहे थे। लेकिन 2017 के चुनावी नतीजों ने इस समीकरण के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया। सोशल इंजीनियरिंग के सहारे बसपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहती है तो सपा अंसारी बंधुओं के सहारे पूर्वांचल में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। लेकिन पूर्वांचल में इसके अपने साइडइफेक्टस भी हैं। लेकिन एक बात तो साफ है कि पूर्वांचल में अंसारी बंधुओं को आप इगनोर नहीं कर सकते हैं।''

सपा

सपा के सहयोग से ही बसपा से सांसद बने थे अफजाल अंसारी
इस बीच, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि हाल ही में अखिलेश यादव ने अपनी पिछली रणनीति को उलटते हुए मुख्तार अंसारी के भाई और पूर्व विधायक सिगबतुल्लाह अंसारी का अपनी पार्टी में स्वागत किया था, जिससे सत्तारूढ़ भाजपा ने चुटकी ली थी। अब्बास अंसारी 2017 का चुनाव बसपा के चुनाव चिह्न पर हार गए थे, जबकि अफजल अंसारी ने बसपा के टिकट पर गाजीपुर से 2019 का लोकसभा चुनाव जीता था, जब पार्टी ने सपा के साथ गठबंधन किया था।

मुरली मनोहर जोशी

मुख्तार अंसारी ने मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ भी लड़ा था चुनाव
मुख्तार ने 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर वाराणसी से चुनाव लड़ा था। जेल में रहने के बावजूद, भाजपा के दिग्गज मुरली मनोहर जोशी से केवल 17,000 वोटों के मामूली अंतर से हार गए। 2012 में, अभी भी जेल में, उन्होंने उत्तर प्रदेश की मऊ विधानसभा सीट से जीत हासिल की। समाजवादी पार्टी के सांसद और विधायक के रूप में सफलता का स्वाद चखते हुए अफजल ने भी जेल के दिनों को देखा है। सिबकतुल्लाह मोहम्मदाबाद से पूर्व विधायक रहे हैं।

अंसारी बंधुओं ने 2010 में बनाया था कौमी एकता दल

अंसारी बंधुओं ने 2010 में ही कौमी एकता दल (कोएद) का गठन किया, जब सभी पार्टियों ने अंततः अपराध में शामिल होने के कारण उन पर दरवाजे बंद कर दिए। मुख्तार को पहले गाजीपुर जेल में रखा गया था, लेकिन बाद में आगरा में स्थानांतरित कर दिया गया था। दरअसल अंसारियों का अपना शानदार इतिहास भी रहा है। भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी उनके करीबियों में शामिल हैं और दादा मुख्तार अहमद अंसारी एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और एक प्रसिद्ध डॉक्टर थे और उन्होंने ब्रिटेन में सर्जरी का अध्ययन किया था। मुख्तार अहमद अंसारी को महात्मा गांधी का काफी करीबी भी माना जाता था।

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