यूपी चुनावों पर गेस्ट हाउस कांड का पड़ा बड़ा असर, मुलायम के खिलाफ भाजपा की मदद से दलित मायावती बनीं बड़ी ताकत
लखनऊ, 26 नवंबर। तारीख 1 जून 1995, दिन गुरुवार। बसपा-सपा गठबंधन सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यालय में उस समय के आईएएस अफसर पीएल पुनिया अचानक पहुंचे। जिस समय पीएल पुनिया पहुंचे उस समय मुलायम सिंह यादव प्रदेशभर से आए सपा नेताओं की बैठक में थे। पीएल पुनिया ने मुलायम सिंह यादव को एक नोट दिया जिसको पढ़कर उनके चेहरे के भाव ही बदल हुए। बैठक में मुलायम ने सपा नेताओं से आगे चुनाव की तैयारी करने के लिए कहा। दरअसल पीएल पुनिया मुलायम सिंह यादव को यह बताने आए थे कि बसपा गठबंधन सरकार से समर्थन वापसी करने वाली है। तारीख 2 जून, 1995, दिन शुक्रवार, जगह- लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस। गेस्ट हाउस में मायावती बसपा विधायकों के साथ बैठक कर रही थीं और आगे की रणनीति पर चर्चा कर रही थीं। तभी कुछ सपा विधायकों ने हथियारों से लैस करीब 300 समर्थकों के साथ गेस्ट हाउस को घेर लिया। मीटिंग रूम में घुसकर सपाइयों ने बसपा विधायकों पर हमला बोल दिया। बिजली और टेलिफोन के तार काट दिए गए। बसपा विधायकों को लाठी से पीटा गया। मायावती ने भागकर खुद को एक कमरे में बंद कर लिया। बताया जाता है कि तब भाजपा विधायक ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने मायावती को वहां से बचाकर निकाला था। पुलिस गेस्ट हाउस में कांड की मूकदर्शक बनी रही। यूपी की राजनीति में इसे ही गेस्ट हाउस कांड कहा जाता है जिसके बाद सपा और बसपा के बीच रिश्ते इतने खराब हो गए कि आगे चलकर चुनावी सियासत पर इसका बहुत ही गहरा असर पड़ा।

सपा-बसपा का पहला गठबंधन, बड़ी जीत और बड़ा कांड
राम मंदिर आंदोलन की लहर पर सवार होकर 1991 में भाजपा ने बहुमत लाकर सरकार बनाई थी। मंडल कमंडल राजनीति के उस दौर में 1991 का चुनाव अहम है। इसमें कमंडल की राजनीति कर 425 सीटों की विधानसभा में भाजपा ने 221 सीट जीती थी जबकि मंडल राजनीति में जनता दल से निकली मुलायम की सपा को 34 और कांशीराम की बसपा को 12 सीटें मिली थीं। बाबरी विध्वंस के बाद कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था और 1993 में फिर से चुनाव कराए गए थे। इस चुनाव में मुलायम सिंह यादव की सपा और कांशीराम की बसपा ने गठबंधन किया था। भाजपा को रोकने के लिए सपा-बसपा साथ आई थी और इसकी पहल मुलायम ने ही की थी। कांशीराम ने इस मौके का फायदा पार्टी को सत्ता में लाने के लिए उठाया। 1993 के चुनाव में भाजपा को 33 प्रतिशत वोट मिले और सीटें मिलीं 177। वहीं सपा बसपा गठबंधन ने 29 प्रतिशत वोट हासिल कर 176 सीटों पर विजय पाई। सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिलीं। सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा को किसी पार्टी का समर्थन नहीं मिला। सपा-बसपा गठबंधन ने अन्य दलों के समर्थन से सरकार बना ली और मुलायम सिंह यादव फिर से मुख्यमंत्री बने थे। 1995 में गेस्ट हाउस कांड ने उत्तर प्रदेश की राजनीति ही पलट दी। इधर केंद्र सरकार ने मुलायम सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करने का अवसर दिए बिना राज्यपाल की सिफारिश पर बर्खास्त कर दिया। उधर भाजपा ने मौके का फायदा उठाकर बसपा की सरकार बनवा दी और मायावती प्रदेश की पहली दलित मुख्यमंत्री बन गई।

गेस्ट हाउस कांड ने तय कर दी बसपा की राजनीति
गेस्ट हाउस कांड ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा की रणनीति को एक दिशा दे दी। सपाइयों को गुंडा कहते हुए बसपा ने चुनावी नारा दिया था- चढ़ गुंडन की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर। सपा के खिलाफ बसपा को खड़ा करने में भाजपा ने बड़ी मदद दी। यहां अहम बात यह है कि भाजपा को मनुवादी कहकर बसपा ने अपनी राजनीति खड़ी की थी लेकिन उसी के सहारे आगे चलकर मायावती तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुई थीं। 1993, 1996 और 2002 के यूपी विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा और बसपा ने मिलकर सरकार बनाने और चलाने की कोशिश की लेकिन तीनों बार ज्यादा समय तक नहीं चल पाई। बसपा में बड़ी टूट के बाद मुलायम सिंह यादव ने 2003 में सरकार बना ली थी। इसके बाद 2007 और 2012 का चुनाव सपा और बसपा दोनों के लिए निर्णायक बहुमत वाले रहे थे। 2007 से 2017 के बीच का दशक सपा और बसपा का कहा जा सकता है जहां दोनों पार्टियों ने एक दूसरे के खिलाफ नारे उछाले, नए समीकरण जमाए और पांच-पांच साल के लिए बहुमत की सरकार बनाई। 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा ने 206 सीटें लाकर मायावती की सरकार बनाई तो वहीं 2012 में सपा ने 224 सीट जीतकर अखिलेश की सरकार बनाई।

सपा-बसपा 2019 में साथ आकर फिर अलग हो गए
23 साल बाद 2018 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिर वही परिस्थिति हो गई जैसी कि 1993 में थी। नरेंद्र मोदी और हिंदुत्व की लहर में भाजपा ने केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों किला फतह कर लिया था। कहा जाता है कि फूलपुर और गोरखपुर में हुए लोकसभा उपचुनाव में सपा ने बसपा की मदद से भाजपा को पटखनी दी थी। भाजपा के खिलाफ मायावती का समर्थन लेने के लिए मुलायम ने अखिलेश से कहा था। उपचुनाव में मिली जीत के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा ने गठबंधन किया था। बरसों बाद मुलायम और मायावती फिर से एक मंच पर दिखे थे। लेकिन इस गठबंधन से बसपा को फायदा हुआ, सपा को नहीं। 2014 में खाता नहीं खोल पाने वाली बसपा ने लोकसभा की दस सीटों पर जीत हासिल की जबकि सपा को सिर्फ पांच सीट मिली। राजनीति के जानकार कहते हैं कि 2019 लोकसभा चुनाव में सपा के वोट तो बसपा को मिल गए लेकिन सपा को बसपा के वोटबैंक का लाभ नहीं मिला। लोकसभा चुनाव परिणामों के एक महीने बाद ही मायावती ने सपा से गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया। 2022 के विधानसभा चुनाव में मायावती की बसपा अकेले चुनाव लड़ रही है जबकि इस बार अखिलेश छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करने में लगे हैं। सपा की कमान अखिलेश के हाथों में आने के बाद गेस्ट हाउस कांड तो पीछे छूट गया लेकिन वोटों की सियासत और मायावती का रवैया देखते हुए आगे भविष्य में सपा और बसपा के साथ आने की संभावना अभी कम ही दिख रही है।
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