Chhattisgarh: 'मजबूरी थी साहब क्या करते', बेटे के शव को ऑटो के पायदान पर रख 35 KM भटकता रहा पिता
Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले से सामने आई एक दर्दनाक घटना सामने आई है। इस घटना ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक आदिवासी पिता को अपने जवान बेटे के शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल ले जाने तक के लिए सरकारी वाहन नहीं मिला। मजबूरी इतनी बड़ी थी कि पिता ने निजी ऑटो किराए पर लिया और बेटे के शव को ऑटो के पायदान पर रखकर अस्पताल तक पहुंचाया। यह दृश्य जिसने भी देखा, उसकी आंखें नम हो गईं।
जानकारी के मुताबिक, विशेषरा गांव निवासी 22 वर्षीय कमलेश गोंड लंबे समय से मानसिक बीमारी से परेशान था। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और गांव में जागरूकता की कमी के कारण उसका इलाज सही तरीके से नहीं हो सका। परिजन उसे अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूंक के लिए माटी कछार गांव ले गए थे। इसी दौरान कमलेश ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। बेटे की मौत के बाद परिवार पूरी तरह टूट गया।

शव वाहन के लिए भटकता रहा परिवार
कमलेश की मौत के बाद पिता ज्ञान सिंह गोंड के सामने सबसे बड़ी समस्या बेटे के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल पहुंचाने की थी। परिजनों ने पुलिस और अस्पताल प्रशासन से मदद मांगी, लेकिन आरोप है कि घंटों इंतजार के बावजूद कोई सरकारी वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया। परिवार पहले ही गहरे सदमे में था, ऊपर से उन्हें सिस्टम की बेरुखी का सामना करना पड़ा।
₹2 हजार देकर किराए पर लिया ऑटो
हादसे के बाद पिता ज्ञान सिंह गोंड ने पुलिस और अस्पताल प्रशासन से शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल ले जाने हेतु वाहन की मांग की। आरोप है कि घंटों मिन्नतें करने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग या पुलिस प्रशासन ने कोई सुध नहीं ली। ज जब कहीं से मदद नहीं मिली तो पिता ने मजबूरी में ₹2,000 देकर एक निजी ऑटो किराए पर लिया। लेकिन ऑटो में इतनी जगह नहीं थी कि शव को अंदर रखा जा सके। ऐसे में कमलेश के शव को ऑटो के पायदान पर रखकर करीब 20 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल ले जाया गया।
"मजबूरी थी साहब, क्या करते..."
पीड़ित पिता ज्ञान सिंह ने रुंधे गले से बताया, "बेटा बीमार था, सोचा था ठीक हो जाएगा, पर उसने जान दे दी। अस्पताल ले जाने के लिए कोई गाड़ी नहीं मिली, घंटों इंतजार किया। आखिर में ₹2,000 देकर ऑटो किया। बेटे को इस हाल में ले जाते देख कलेजा फट रहा था, पर कोई सुनने वाला नहीं था।"
यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था और आदिवासी कल्याण की योजनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। ग्रामीण इलाकों में 108 एंबुलेंस और शव वाहन सेवा की उपलब्धता महज कागजों तक सीमित नजर आ रही है। स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर भारी रोष है कि आखिर एक शोक संतप्त परिवार को सिस्टम की इस संवेदनहीनता का शिकार क्यों होना पड़ा?












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