अतीक अहमद हत्याकांड: आखिर 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' UP पुलिस ने हमलावरों पर क्यों नहीं चलाई गोली, उठे सवाल
Atiq Ahmed and Ashraf Ahmed killings: अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ अहमद की उत्तर प्रदेश के शहर प्रयागराज में 15 अप्रैल की रात 10 बजकर 35 मिनट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

अतीक अहमद और अशरफ अहमद के हत्याकांड के बाद उत्तर प्रदेश की पुलिस सवालों के घेर में है। 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट', 'एनकाउंटर पुलिस' और 'ट्रिगर हैप्पी' जैसे नामों से मशहूर यूपी पुलिस के सामने ही अतीक अहमद और अशरफ अहमद की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई।
अब सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर एनकाउंटर के लिए जानी जाने वाली यूपी पुलिस के सामने ही अतीक का 'एनकाउंटर' कैसे हो गया? आखिर यूपी पुलिस ने हमलावरों पर गोलियां क्यों नहीं चलाई....?
रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के पुलिसकर्मी के 18 जवान उस दिन अतीक अहमद और अशरफ के साथ थे, जब तीन हमलावरों ने पत्रकार बनकर प्रयागराज में 15 अप्रैल की रात 10 बजकर 35 मिनट पर अतीक और अशरफ को गोली मार दी।
22 सेकेंड तक आरोपियों ने अंधाधुध फायरिंग की। ये सबकुछ मीडिया चकाचौंध और भारी पुलिस उपस्थिति के बीच हुआ। ऐसे में यूपी पुलिस पर सवाल उठना लाजमी है...।

प्रयागराज पुलिस तीनों आरोपियों शूटर सनी उर्फ मोहित सिंह (हमीरपुर) लवलेश तिवारी (बांदा) और अरुण मौर्य (कासगंज) को जिंदा पकड़ने में कामयाब रही। लेकिन प्रयागराज की पुलिस को इस तरह के सवालों का सामना करना पड़ा कि एनकाउंटर के लिए जानी जाने वाली पुलिस फोर्स हमलावरों पर गोली चलाने में नाकाम क्यों रही?
प्रयागराज के काल्विन अस्पताल में मेडिकल के लिए ले जाते समय तीन युवकों ने अतीक और अशरफ अहमद पर फायरिंग शुरू की। सबसे पहले एक शूटर ने पहली गोली अतीक की बाईं कनपटी में दागी, जबकि दूसरे ने अशरफ को गोली मारी। गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच पुलिस और पत्रकारों सन्न हो गए।

ठीक 22 सेकेंड बाद गोलियां चलना बंद हो गईं। जैसे ही न्यूज चैनल के रिपोर्टरों ने अपने कैमरों पर फोकस किया तो देखा कि तीन युवक हाथ हवा में लहराते और धार्मिक नारे लगा रहे हैं। उनकी पिस्टल कुछ ही दूरी पर पड़ी मिली। पुलिस ने उन पर धावा बोला, उन्हें लिटाकर कंट्रोल किया और पुलिस जीप में बिठाकर ले गई।
जाहिर सवाल यह था कि पुलिस हमलावरों पर गोली चलाने में नाकाम क्यों रही? टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक एक पुलिस वाले ने कहा, "सारी चीजें इतनी जल्दी हुई कि उन्हें शायद रिएक्ट करने का वक्त ही नहीं मिला। इससे पहले कि कई लोग कुछ समझ पाते फायरिंग खत्म हो गई। जब तक हम चीजों को प्रोसेस कर पाते तीक और अशरफ जमीन पर पड़े हुए थे।''

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी एके जैन ने कहा, "इस तथ्य के अलावा कि सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि पुलिस को समय नहीं मिला, पुलिस हमेशा ओपेन में फायरिंग करने से बचती है। ओपेन में फायरिंग करना पुलिस के लिए एक प्रोफेशनल फैसला नहीं होता।''
एक अन्य रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी ने कहा, "अगर तीनों की मौके पर ही हत्या कर दी गई होती, तो दोनों हत्याओं के पीछे की साजिश को उजागर करने का कोई रास्ता नहीं बचता। उस मामले में सभी सबूतों को खत्म करने के लिए पुलिस को निशाना बनाया गया होता।"












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