इलाहाबाद में डगमगाया अद, घटा अनुप्रिया का कद, 3 में एक पर जीत
केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल सोनेलाल को जिले की गठबंधन में तीन सीटें मिली थीं। लेकिन सिर्फ सोरांव में अद प्रत्याशी ने जीत दर्ज की। हंडिया व प्रतापपुर में अद पैर नहीं जमा सका।
इलाहाबाद। मोदी की सुनामी में 9 सीटों पर उतरे भाजपा प्रत्याशियों ने 8 पर जीत दर्ज की, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन में तीन सीटों पर उतरी अपना दल के खाते में जिले की सिर्फ एक सीट आई है। अपना दल के डॉ.जमुना प्रसाद ने सोरांव विधानसभा सीट से बसपा और सपा को शिकस्त देकर एक सीट अद के नाम की। जबकि हंडिया में राकेशधर का जादू नहीं चला जिससे उनकी पत्नी व अद प्रत्याशी प्रमिला त्रिपाठी हार गई। जबकि प्रतापपुर विधानसभा सीट भी अद के हाथ से खिसक गई । कहीं न कहीं भाजपा को गठबंधन से इन दोनों सीटों पर नुकसान हुआ है क्योंकि इन दोनों सीटो पर भाजपा दावेदारों ने टिकट के लिये खूब जद्दोजहद की थी। यहां तक कि पूर्व जिलाध्यक्ष रामरक्षा द्विवेदी ने बगावत कर निर्दलीय लड़ने का एलान कर दिया था।

मोदी लहर में भी अद को सिर्फ एक सीट
अपना दल की ओर से अनुप्रिया पटेल को हमेशा से सीएम कैंडिडेट के रूप में पेश किया जाता रहा है। केंद्रीय मंत्रीमंडल में जगह बनाने के बाद अनुप्रिया का कद लगातार बढ़ता ही गया था। यही वजह थी कि इलाहाबाद में भारी बगावत के बाद भी अनुप्रिया ने तीन सीटें हासिल कर ली थी। इलाहाबाद की एक सीट पर परचम लहरा कर अद ने अपना पैर भी जमाना शुरू कर दिया है । लेकिन मोदी लहर के बावजूद दो सीटों पर हार अनुप्रिया की सरकार में दावेदारी को कुछ कमजोर करेगी।
सोरांव जीतना था जरूरी
अनुप्रिया पटेल और उनकी पार्टी अद दोनों के लिये सोरांव सीट जीतना बहुत जरूरी था। क्योंकि सूबे की यह ऐसी सीट थी जहां सबसे ज्यादा विवाद हुआ और मतदान तक जारी रहा। इस सीट पर भाजपा ने अपना प्रत्याशी उतार दिया था । जिसके बाद अनुप्रिया ने इसे साख का विषय बताते हुये मिर्जापुर समेत बनारस की सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का एलान कर दिया था। ऐसे में यह सीट अद से फिसलती तो अनुप्रिया की किरकिरी होती। जमुना प्रसाद को 77814 वोट मिले। जबकि गीता देवी बसपा को 60079 व सत्यवीर मुन्ना सपा को 54345 वोट मिले।

भिड़ गये थे भाजपा-अद प्रत्याशी
सोरांव विधानसभा सीट पर अपना दल के जमुना प्रसाद व भाजपा के सुरेन्द्र चौधरी में जमकर बवाल हुआ था। मारपीट व गोलीबारी भी हुई थी। जिसके बाद एकाएक भूचाल आ गया था और आनन-फानन में अनुप्रिया को मनाने के लिये केशव ने अपने नजदीकी सुरेन्द्र से दावेदारी छीन ली थी। लेकिन आयोग के नियम के चलते ईवीएम पर कमल का निशान बना रहा और उस पर साढे 6 हजार वोट भी पड़े।
प्रतापपुर में खुद पैर पर चली कुल्हाड़ी
प्रतापपुर विधान सीट हारने का प्रमुख कारण अपना दल नेतृत्व खुद रहा । यहां से अपना दल ने करन सिंह को टिकट दिया था। बाद में करन का टिकट काटकर बृजेश पाण्डेय को प्रत्याशी घोषित कर दिया गया । लेकिन जब चुनाव चिन्ह आवंटित हुआ तो करन को अपना दल का सिंबल कप प्लेट मिला। जबकि घोषित प्रत्याशी बृजेश को आयोग ने निर्दलीय घोषित कर चुनाव चिन्ह बैट दे दिया । जिससे कार्यकर्ता असमंजस में रहे और आपसी मनमुटाव में पार्टी की लुटिया डुबो दी। बसपा के मुज्जतबा सिद्दीकी 66805 के साथ विजयी हुये। जबकि अद प्रत्याशी करन सिंह को 64651 व विवाद का कारण बने बृजेश पाण्डेय 1640 वोट मिले। यहां विवाद न होता तो निश्चित तौर पर यह सीट अद के खाते में जाती।

हंडिया में उलझ गई अद
इलाहाबाद की हंडिया विधानसभा सीट पर पहले कालेधन के दागी पूर्व मंत्री राकेशधर त्रिपाठी को चुनाव लड़ना था। लेकिन राकेश ने खुद चुनाव न लड़कर पत्नी प्रमिला त्रिपाठी को मैदान में उतारा । जिससे व्यक्तिगत वोट बैंक पर अद को नुकसान उठाना पड़ा। वहीं रही सही कसर राकेशधर के बेटे ने मां के खिलाफ बगावत कर पूरी कर दी। नामांकन महज औपचारिकता थी। डा. प्रभात त्रिपाठी ने आखिरी दिन नामांकन किया था और राजनैतिक समीकरण को बिगाड़ दिया था। हालांकि प्रभात 973 वोट पर ही सिमट गये। लेकिन बगावत से नुकसान का जो संदेश जनता के बीच गया था, उसके चलते अपना दल को 63920 वोट मिले और सीट गंवानी पड़ी। यहां से बसपा के हाकिम ने 72446 वोट हासिल किये।












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