Akhilesh Yadav OBC Card : सपा कार्यकारिणी में बड़े पदों से हटाए गए ब्राह्मण और ठाकुर, क्या है अखिलेश का प्लान

पूर्व CM Akhilesh Yadav OBC Card खेल रहे हैं, ऐसा सियासी पंडितों का मानना है। सपा कार्यकारिणी के नए पदाधिकारियों की लिस्ट के आधार पर कहा जा रहा है कि ब्राह्मण और ठाकुर नेताओं को बड़े पदों से हटाना अखिलेश की नई रणनीति है

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उत्तर प्रदेश की सियासत में Akhilesh Yadav OBC Card के सहारे समाजवादी पार्टी (SP) को दोबारा संगठित करने की कवायद करते दिख रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण सम्मान से नवाजे जाने की घोषणा के बाद समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा की गई। पदाधिकारियों की सूची के आधार पर राजनीतिक समीक्षक मान रहे हैं कि अखिलेश यादव ने पिछड़ों-दलितों और मुसलमानों के समीकरण पर ही राजनीति करने वाली सपा की रणनीति को साफ कर दिया है। सपा कार्यकारिणी को देखकर कहना गलत नहीं होगा कि अब मुस्लिम और यादवों के अलावा सपा में ओबीसी नेताओं का भी दबदबा दिखेगा। यह भी साफ हो गया है कि समाजवादी पार्टी की राजनीति में ब्राह्मणों और ठाकुरों के लिए कोई जगह नहीं। हालांकि, रोचक ये भी है कि उत्तर प्रदेश की डेमोग्राफी देखते हुए सपा कुछ समय पहले तक ब्राह्मणों और ठाकुरों को भी जगह देने में परहेज नहीं करती थी।

दरअसल, रविवार को जैसे ही समाजवादी पार्टी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद उपाध्यक्ष, मुख्य राष्ट्रीय महासचिव, राष्ट्रीय महासचिव और राष्ट्रीय सचिवों के नामों की घोषणा की, इसे अखिलेश यादव का ओबीसी कार्ड माना गया। ऐसा इसलिए क्योंकि पार्टी ने 14 राष्ट्रीय महासचिवों की सूची जारी की, जिसमें एक भी ब्राह्मण या ठाकुर चेहरा नहीं है। राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर आजम खान के अलावा किसी मुस्लिम चेहरे को जगह नहीं मिली है। लिस्ट के आधार पर कहना गलत नहीं है कि अखिलेश यादव ने ओबीसी नेताओं को तरजीह दी है। रवि प्रकाश वर्मा, स्वामी प्रसाद मौर्य, विश्वंभर प्रसाद निषाद, लालजी वर्मा, राम अचल राजभर हरेंद्र मलिक नीरज चौधरी ऐसे नाम हैं जिन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है।

स्वामी प्रसाद मौर्य का नाम फोकस में इसलिए भी है, क्योंकि हाल ही में मौर्य रामचरितमानस पर बयान के कारण विवादों में घिरे। इसके बाद उनपर प्राथमिकी दर्ज कराई गई। खास बात ये कि लखनऊ दौरे पर मां पीतांबरा के 108 कुंडीय यज्ञ में शामिल होने पहुंचे अखिलेश यादव ने जब उनसे भेंट की तब इस मुद्दे पर कोई भी बयान सामने नहीं आया। हालांकि, अखिलेश ने बीजेपी और आरएसएस पर गुंडे भेजने और जातिवादी राजनीति को प्रश्रय देने के गंभीर आरोप भी लगाए। इसे स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान के बाद 'सपा का डैमेज कंट्रोल एप्रोच' माना गया।

सपा में दूसरे दलों के नेताओं की स्वीकार्यता

जिस प्रदेश में जाति आधारित सियासत और सीटों का बंटवारा होता है, वहां ओबीसी कैटेगरी में भी कई जातियां है, इसका ध्यान भी रखा जाता है। सपा ने ओबीसी के अंतर्गत आने वाली सभी प्रमुख जातियों के नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में बड़े पदों पर रखा है। राष्ट्रीय संगठन के पदों पर सपा ने मौर्य, राजभर निषाद और कुर्मी जातियों के अलावा जाट नेताओं को भी जगह दी है। पासी, जाटव जैसी दलित जातियों को भी जगह दी गई है। जाति के अलावा समाजवादी पार्टी ने दूसरी पार्टी से आने वाले नेताओं को भी कार्यकारिणी में पूरी जगह दी है। भाजपा, बसपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों से आए नेताओं को भी संगठन में काफी जगह मिली है।

अखिलेश ने चाचा शिवपाल को भी पद दिया

रिपोर्ट्स के मुताबिक पारिवारिक टकराव और सपा के बिखराव के कारण सुर्खियों में रहे शिवपाल यादव को भी अखिलेश की पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया है। सियासी चौसर के समीकरणों पर नजर रखने वाले जानकारों के मुताबिक मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी सीट खाली हो गई थी। सपा के हाथ से मैनपुरी सीट नहीं फिसले इसमें शिवपाल की अहम भूमिका रही। मैनपुरी सीट अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव को जिताने में चाचा शिवपाल ने पूरी मदद की। अब भतीजे अखिलेश ने चाचा का आभार प्रकट करने के लिए शिवपाल को कार्यकारिणी में शामिल किया है। खुद अखिलेश यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालेंगे। किरणमय नंदा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, जबकि वेटरन राजनेता राम गोपाल यादव राष्ट्रीय महासचिव के रूप में सपा की कमान संभालेंगे।

सपा का समीकरण बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती !

लोक सभा चुनाव 2024 की घोषणा से लगभग 14 महीने पहले देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने जिस तरह संगठन में बदलाव किया है, इससे स्पष्ट हो गया है कि ठाकुर और ब्राह्मण समाजवादी पार्टी के प्रमुख चेहरे नहीं हैं। समाजवादी पार्टी ओबीसी और दलितों के लिए मुस्लिम यादव (एमवाई) समीकरण के साथ ओबीसी को जोड़कर नया समीकरण बना रही है। जाति की राजनीति वाले इलाकों में सपा की ऐसी स्ट्रैटजी बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।

बता दें कि पुरानी राजनीतिक कहावत है कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश होकर गुजरता है। ऐसे में माना जा रहा है कि 80 लोकसभा सीटों वाले सूबे उत्तर प्रदेश में बीजेपी को रोकने के लिए अखिलेश इस थ्योरी पर चल रहे हैं कि ब्राह्मणों और ठाकुरों का बहुमत वोट बीजेपी को ही जाएगा। इस वर्द के वोटर्स पर मेहनत करने से पार्टी को खास फायदा नहीं। जनाधार बढ़ाने के लिए अब सपा मुस्लिम, यादव के अलावा ओबीसी और दलितों पर भी फोकस कर रही है।

यूपी का जातीय समीकरण और लोक सभा चुनाव

लोकसभा चुनाव के लिहाज से देखें तो यूपी में फिलहाल बीजेपी के पास सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें हैं। 2019 के चुनाव में बीजेपी को 64 सीटें मिली थीं, जबकि दो सीटों पर उसकी सहयोगी अपना दल (एस) का कब्जा है। 10 सीटों पर मायावती की बसपा, तीन सीटों पर समाजवादी पार्टी और एक सीट पर कांग्रेस का कब्जा है। यूपी के जातीय समीकरणों के आधार पर सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़ा वर्ग है। राज्य में 18 फीसदी सवर्ण हैं। 10 फीसदी ब्राह्मण हैं। पिछड़े वर्ग की संख्या 40 फीसदी है। इसमें यादव 10 फीसदी, कुर्मी सैथवार आठ फीसदी, मल्लाह पांच फीसदी, लोध तीन फीसदी, जाट तीन फीसदी, विश्वकर्मा दो फीसदी, गुर्जर दो फीसदी और अन्य की संख्या है। पिछड़ी जातियां 7 प्रतिशत हैं। इसके अलावा राज्य में अनुसूचित जाति 22 फीसदी और मुस्लिम आबादी 18 फीसदी है।

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