मोदी युग में कांग्रेस का पतन! 2014 के मुकाबले अब कितने राज्यों में Congress सरकार?
How Congress Shrunk in Modi Era: एक समय था जब देश की राजनीति का मतलब ही कांग्रेस हुआ करता था। दिल्ली की सत्ता से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री आवास तक कांग्रेस का झंडा दिखाई देता था। आजादी के बाद दशकों तक पार्टी ने भारतीय राजनीति की दिशा तय की। लेकिन पिछले दस-बारह सालों में भारतीय राजनीति ने ऐसी करवट ली कि वही कांग्रेस अब अपने अस्तित्व और प्रभाव को बचाने की लड़ाई लड़ती नजर आती है।
हालांकि, केरल विधानसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की बड़ी जीत ने पार्टी को नई ऊर्जा दी है। वी.डी. सतीशन के मुख्यमंत्री बनने के बाद अब फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या कांग्रेस वापसी कर रही है, या फिर वह धीरे-धीरे सिर्फ दक्षिण भारत तक सीमित पार्टी बनती जा रही है।

2014 में कांग्रेस की किन राज्यों में सत्ता में थी?
2014 लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस सिर्फ केंद्र की सत्ता में नहीं थी, बल्कि कई राज्यों में भी उसका मजबूत प्रभाव था। कर्नाटक, महाराष्ट्र, हरियाणा, असम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और केरल जैसे 14 राज्यों में पार्टी सीधे या गठबंधन के जरिए सत्ता में शामिल थी।
2026 में कितने राज्यों में कांग्रेस की है सरकार?
वहीं अब 2026 में कांग्रेस पार्टी की सरकार महज चार राज्यों हिमाचल, कर्नाटक, तेलंगाना और केरल में सिमट कर रह गई है। जिसमें महज तेलंगाना, कर्नाटक और हिमाचल में कांग्रेस अकेले दम पर सरकार चला रही है और केरल में कांग्रेस की गठबंधन सरकार है।
दरअसल, 2014 में कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसका राष्ट्रीय संगठन और हर राज्य में मौजूद स्थानीय नेतृत्व माना जाता था। पार्टी के पास हर क्षेत्र में मजबूत चेहरे थे। लेकिन धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के आरोप, महंगाई, नीति पक्षाघात और नेतृत्व संकट ने कांग्रेस की पकड़ कमजोर करनी शुरू कर दी।
मोदी युग के बाद पूरी तरह बदल गई राजनीति
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता में आने के बाद देश की राजनीति का पूरा समीकरण बदल गया। भाजपा ने सिर्फ केंद्र में सरकार नहीं बनाई, बल्कि राज्यों में भी आक्रामक तरीके से विस्तार शुरू किया।
हिंदी बेल्ट में कांग्रेस लगातार कमजोर होती चली गई। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पार्टी या तो सत्ता से बाहर हुई या फिर संगठनात्मक रूप से कमजोर पड़ती गई।
भाजपा का "कांग्रेस मुक्त भारत" नारा धीरे-धीरे राजनीतिक जमीन पर असर दिखाने लगा। कांग्रेस का वोट बैंक टूटता गया और कई पुराने नेता भी पार्टी छोड़ते चले गए।
लोकसभा में कांग्रेस की सबसे बड़ी गिरावट
2014 का चुनाव कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा झटका माना जाता है। पार्टी सिर्फ 44 सीटों पर सिमट गई। यह संख्या इतनी कम थी कि कांग्रेस को लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद भी नहीं मिला।
2019 में हालात और ज्यादा खराब हो गए। भाजपा 303 सीटों तक पहुंच गई जबकि कांग्रेस सिर्फ 52 सीटें जीत पाई। उस समय ऐसा लगने लगा था कि शायद कांग्रेस अब राष्ट्रीय राजनीति में हाशिये की पार्टी बन जाएगी।
लेकिन 2024 के चुनावों में तस्वीर थोड़ी बदली। कांग्रेस ने अपनी सीटें बढ़ाकर 99 कर लीं। भाजपा भी पहली बार अपने दम पर बहुमत से नीचे आ गई। इससे विपक्ष को नई ताकत मिली और कांग्रेस ने खुद को फिर से राष्ट्रीय विपक्ष के केंद्र में स्थापित करने की कोशिश शुरू की।
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का असर
कांग्रेस के लिए बड़ा मोड़ राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को माना जा रहा है। 2022 में कन्याकुमारी से कश्मीर तक चली इस यात्रा ने पार्टी को राजनीतिक और भावनात्मक दोनों स्तर पर नई पहचान दी।
भाजपा लगातार राहुल गांधी को कमजोर नेता के तौर पर पेश करती रही थी, लेकिन यात्रा के बाद उनकी छवि में बदलाव देखने को मिला। आम लोगों के बीच सीधे संवाद ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भी नई ऊर्जा भरी।
यही कारण रहा कि 2023 में कांग्रेस ने कर्नाटक और तेलंगाना में जीत हासिल की। हिमाचल प्रदेश में भी पार्टी सत्ता में लौटी। इससे यह संदेश गया कि कांग्रेस पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
2026 में कांग्रेस की नई ताकत बना दक्षिण भारत
अब कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत दक्षिण भारत बनता दिखाई दे रहा है। कर्नाटक और तेलंगाना में पहले से सरकार होने के बाद अब केरल में UDF की बड़ी जीत ने पार्टी को मजबूत आधार दिया है। केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन को 102 सीटें मिलीं, जो पिछले कई दशकों में उसका सबसे मजबूत प्रदर्शन माना जा रहा है।
इसके अलावा तमिलनाडु की राजनीति में भी कांग्रेस ने चौंकाने वाला कदम उठाया। उसने डीएमके से दूरी बनाकर विजय की टीवीके के साथ गठबंधन किया और सत्ता समीकरण में खुद को बनाए रखा।
यानी जिन राज्यों में भाजपा की पकड़ कमजोर है, वहां कांग्रेस अपने लिए नई राजनीतिक जमीन तलाशती दिखाई दे रही है।
क्या कांग्रेस अब "साउथ इंडिया पार्टी" बनती जा रही है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का जनाधार अब उत्तर भारत से ज्यादा दक्षिण भारत में बचा हुआ है। राहुल गांधी का वायनाड से चुनाव लड़ना भी इसी राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा गया।
दक्षिण भारत में कांग्रेस अभी भी भाजपा के खिलाफ एक मजबूत वैकल्पिक ताकत के रूप में मौजूद है। कर्नाटक, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु में पार्टी गठबंधन राजनीति के जरिए खुद को प्रासंगिक बनाए हुए है।
लेकिन उत्तर भारत में कांग्रेस की स्थिति अब भी कमजोर बनी हुई है। यूपी और बिहार जैसे बड़े राज्यों में पार्टी सहयोगी दलों पर निर्भर है। मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों में संगठनात्मक कमजोरी साफ दिखाई देती है।
कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व और संगठन मानी जा रही है। पार्टी के कई बड़े राज्य स्तरीय चेहरे खत्म हो चुके हैं या कमजोर पड़ गए हैं। भाजपा जहां बूथ स्तर तक मजबूत संगठन बना चुकी है, वहीं कांग्रेस कई राज्यों में जमीनी नेटवर्क खड़ा करने के लिए संघर्ष कर रही है। युवा वोटर, सोशल मीडिया राजनीति और नए सामाजिक समीकरणों में भी पार्टी उतनी प्रभावी नजर नहीं आती। इसके अलावा कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और निर्णय लेने में देरी भी उसकी बड़ी कमजोरी रही है।
पंजाब और उत्तर प्रदेश में नई उम्मीद
अगले कुछ साल कांग्रेस के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं। पंजाब विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए बड़ा मौका हो सकता है। आम आदमी पार्टी की अंदरूनी चुनौतियां कांग्रेस को वापसी का अवसर दे सकती हैं।
वहीं उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए राजनीतिक जमीन बचाने का जरिया बन सकता है। हालांकि इन राज्यों में सफलता के लिए सिर्फ गठबंधन नहीं, बल्कि मजबूत स्थानीय नेतृत्व और संगठन भी जरूरी होगा।
क्या "कांग्रेस-मुक्त भारत" संभव है?
पिछले एक दशक में भाजपा ने कांग्रेस को भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचाया है, लेकिन कांग्रेस पूरी तरह खत्म नहीं हुई। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। देश की राजनीति में अभी भी कांग्रेस वह पार्टी है जो लगभग हर राज्य में मौजूद है। क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों तक सीमित हैं, लेकिन कांग्रेस अब भी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की धुरी बनी हुई है।
सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस खत्म होगी या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस खुद को नए भारत की राजनीति के हिसाब से बदल पाएगी? अगर पार्टी मजबूत स्थानीय नेतृत्व तैयार करती है, संगठन को फिर से खड़ा करती है और राहुल गांधी लगातार सक्रिय राजनीति में बने रहते हैं, तो कांग्रेस वापसी कर सकती है। लेकिन अगर वह सिर्फ भाजपा की गलतियों के भरोसे राजनीति करती रही, तो उसका दायरा और छोटा हो सकता है।













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