इसरो वैज्ञानिक नंबी नारायणन को जासूसी मामले में फंसाने के लिए CBI ने केरल के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज की FIR
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने साल 1994 के जासूसी मामले में पूर्व इसरो वैज्ञानिक डॉ एस नांबी नारायणन के फंसाने के लिए केरल के कुछ अधिकारयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
तिरुवनंतपुरम, 26 जुलाई। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने साल 1994 के जासूसी मामले में पूर्व इसरो वैज्ञानिक डॉ एस नांबी नारायणन के फंसाने के लिए केरल के कुछ अधिकारयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। सीबीआई ने न्यायमूर्ति डीके जैन समिति के निष्कर्षों के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की।

शीर्ष अदालत द्वारा नारायणन को फंसाने में पुलिस द्वारा निभाई गई भूमिका की जांच के लिए अप्रैल में सीबीआई जांच के आदेश के बाद एजेंसी ने एक स्थिति रिपोर्ट दायर की। सोमवार को न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर ने कहा- संबंधित पहलू की जांच के बाद रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया गया है, प्राथमिकी दर्ज की गई है। अब कानून को अपना काम करना है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि सीबीआई न्यायमूर्ति डीके जैन समिति के आधार पर अपनी प्राथमिकी का आधार नहीं बना सकती है और एजेंसी को कानून के अनुसार स्वतंत्र जांच शुरू करने का निर्देश दिया।
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आरोपी सिपाही डीजीपी सिबी मैथ्यूज के वकील अमित शर्मा और एक अन्य आरोपी के वकील कलेश्वरम राज के वकील ने कहा कि जस्टिस डीके जैन कमेटी की रिपोर्ट आरोपी के साथ साझा नहीं की गई है। उन्होंने तर्क दिया कि सीबीआई द्वारा रिपोर्ट साझा करने से इनकार करने से अभियुक्तों को उनके वैधानिक उपायों का लाभ उठाने में पूर्वाग्रह पैदा हो रहा है और तर्क दिया कि केंद्रीय जांच एजेंसी FIR में रिपोर्ट पर भरोसा कर रही है।
वहीं केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को सूचित कियाकि पीठ के आदेश के बाद आज ही एफआईआर अपलोड कर दी जाएगी। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने यह भी कहा कि सीबीआई मामले की जांच के लिए सितंबर 2018 में गठित शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश डीके जैन की अध्यक्षता वाले पैनल की रिपोर्ट के आधार पर आगे नहीं बढ़ सकती है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल को सीबीआई को 1994 के जासूसी मामले में नारायणन को फंसाने के आरोप में केरल पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने का आदेश दिया था। अदालत ने शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश डी के जैन की अध्यक्षता वाले पैनल द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था। अदालत ने कहा था कि यह मामला काफी गंभीर है और इसमें सीबीआई जांच की जरूरत है।
बैंच ने तत्कालीन कार्यवाहक सीबीआई निदेशक को मामले की जिम्मेदारी लेने और मामले की आगे की जांच करने के लिए न्यायमूर्ति जैन के पैनल द्वारा दी गई रिपोर्ट को प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के रूप में मानने के लिए कहा था। इसके अलावा कोर्ट ने सीबीआई को इस मामले में तीन महीने के अंदर अपनी जांच की स्थिति पर रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा था। शीर्ष अदालत ने आदेश दिया था कि पैनल की रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे में गोपनीय रखा जाए।












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