गंभीर बीमारी से जूझ रहा देश का 'हीरो' लिंबा, नहीं भूल पाया हार का गम
नई दिल्ली। माैजूदा समय खिलाड़ियों के लिए पहचान बनाना कोई मुश्किल काम नहीं रहा है। एक बार माैका मिल जाए और अगर वो उसको भुना लें तो फिर सोशल मीडिया पर उसको खूब सराहा जाता है। एक ही दिन में लाखों फैंस उसके बन जाते हैं। नीरज चोपड़ा भी उन्हीं में से एक हैं, जिन्होंने ओलंपिक गोल्ड मेडल जीता और रातों-रात अपने करोड़ों फैंस बना लिए। ये बात रही इस दाैर की जब सोशल मीडिया खूब पैर पसार गया, लेकिन बहुत से ऐसे भी खिलाड़ी हैं जिन्होंने सालों पहले देश के लिए गाैरव भरा काम किया, पर अब उनको नजरअंदाज कर दिया जाता है। बदलते समय के साथ-साथ सोशल मीडिया पर नए सितारों को फॉलो किया जाता है, लेकिन सोशल मीडिया से दूर पूर्व भारतीय तीरंदाज लिंबा राम की कहानी बेहद दर्दभरी है। ये वही लिंबा राम हैं जिन्होंने देश में तीरंदाजी को अंतररराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई थी। लेकिन दुख इस बात का है कि देश का ये हीरो अब एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा है, लेकिन उसकी खबर लेने वाला कोई नहीं।
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गंभीर बिमारी से जूझ रहे लिंबा
1992 के बार्सिलोना ओलिंपिक में लिंबा ही वो तीरंदाज थे, जिनसे भारत को मेडल की उम्मीद थी। ऐसा नहीं है कि लिंबा ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं किया था। हम यह कह सकते हैं कि अंत में उनकी किस्मत ही थी जो उनका साथ ना दे पाई। इसका दुख आज भी लिंबा को है। लिंबा तब मेडल जीतने के काफी करीब थी। 1992 में बार्सिलोना ओलिंपिक से पहले लिंबा राम ने बीजिंग एशियन आर्चरी चैंपियनशिप में ताकायोशी माटसुशिटा के वर्ल्ड रिकॉर्ड की बराबरी की थी। इस कारण पूरी उम्मीद थी कि वो मेडल जीतेंगे। 70 मीटर के इवेंट में फाइनल मुकाबले के दाैरान लिंबा राम और ब्रिटेन के खिलाड़ी सायमन टेरी का स्कोर बराबरी पर था। लेकिन फिर भी स्कोर टाई होने के बाद मेडल टेरी को दिया गया था। तब कहा गया कि टेरी ने लिंबा के मुकाबले एक ज्यादा परफेक्ट स्कोर (10) स्कोर किया है। इस कारण लिंबा मेडल जीतने से चूक गए। लिंबा इससे सहमत नहीं थे। इस हार का दुख उन्हें आज भी है। वो आज भी खुद को चैंपियन मानते हैं। दिमाग में टेंशन होने के कारण वह गंभीर बिमारी का शिकार हो गई। वह लंबे समय से न्यूरोडिजेनेरेटिव और सिजोफेनिया नाम की बीमारी का शिकार हैं। उनका उपचार नेहरू स्टेडियम स्थित एक अस्पताल में चल रहा है। उनको ब्रेनस्ट्रोक होता है। यानी कि टेंशन के कारण वह बीमारी का शिकार हुए।

नहीं भूल पाए हार का गम
ओलंपिक में मेडल जीतने का माैका हाथ से गया तो लिंबा हार को स्वीकार नहीं कर पाए। उनकी पत्नी जेनी ने पिछले साल खुलासा करते हुए कहा था कि लिंबा तो आज भी खुद को विजेता मानते हैं। दरअसल, जीत क्या मायने रखती है, यह लिंबा का उसके प्रति झुकाव दिखाता है। 30 साल का गम उन्हें आज भी है। यह हम नहीं बल्कि उनकी पत्नी का ही कहना है जिन्होंने जून 2021 को कहा था, ''आज भी लिंबा खुद को विजेता मानते हैं। उन्हें लगता है कि उन्हें उस समय किसी के सपोर्ट की जरूरत थी, लेकिन तब कोई भी वहां ऐसा शख्स नहीं था जो उनके लिए लड़ सके। इसका असर उनके दिमाग पर पड़ा। वहीं डॉक्टर्स ने भी बताया कि लिंबा का दिमाग उस समय एक सदमे से गुजरा था। उस समय जो कुछ भी हुआ वो इनकी हालत का जिम्मेदार है। लिंबा आज भी उस सदमे से उबर नहीं पाए।''

नहीं ले रहा कोई खबर
दुख इस बात का है कि जिस खिलाड़ी के एक निशाने पर तालियां बजती थीं, जिसे राष्ट्रीय हीरो माना जाता है, आज उसकी खबर लेने वाला कोई नहीं है। लिंबा राम को तींरदाजी के भविष्य की चिंता सताती रहती है। वह 2009 से 2012 तक नेशनल टीम के कोच भी रहे थे। उनके नेतृत्व में खिलाड़ियों ने शानदार खेल भी दिखाया। तब भारत को 2009 विश्व कप में तीन गोल्ड, तीन सिल्वर और चार ब्राॅन्ज मेडल भी मिले। फिर साल 2010 विश्व कप में दो गोल्ड, तीन सिल्वर आैर दो ब्राॅन्ज मिले। इसके अलावा काॅमनवेल्थ गेम्स में भी तीन गोलल्ज, एक सिल्वर और चार ब्राॅन्ज मेडल आए। लिंबा ने खिलाड़ियों की सुविधायों के लिए लगातार मांगें उठाईं। वर्ल्ड फीटा आर्चरी ग्राउंड बनाने की डिमांड करते रहे। लेकिन आज वक्त ने सब बदल दिया। बीमारी ने लिंबा को ऐसा जकड़ा कि वो चल भी नहीं पा रहे। भले ही वो इस वक्त स्वस्थ ना हों, लेकिन अभी भी उनके दिमाग में खिलाड़ियों को बेहतर बनाने की सोच रहती है। क्योंकि उन्हें दुख है कि ओलंपिक में जो मेडल वो नहीं ला पाए वो आगे खिलाड़ी लेकर आएं। लेकिन दुख इस बात का है कि लिंबा जब बुरे दाैर से गुजर रहे हैं तो उनका हाल पूछने वाला भी कोई नहीं है। भारतीय खेल प्राधिकरण उनकी सहायता कर रहा है लेकिन सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं। उनको इस बात का भी मलाल है कि मीडिया भी उनका दुख जानने के लिए आगे नहीं आया।

आखिर कहां से हैं लिंबा, क्या हैं उपलब्धिया?
लिंबा राम राजस्थान के उदयपुर के छोटे से गांव सरादित के रहने वाले हैं। आदिवासी परिवार में उनका जन्म 30 अक्तूबर 1972 हुआ है। लिंबा ही वो शख्स थे, जिन्होंने देश में तीरंदाजी को लोकप्रिय बनाने का काम किया था। आर्चरी में वर्ल्ड रिकॉर्ड के साथ एशियन चैंपियनशिप जीतने के साथ वह तीन बार (1988, 1992, 1998) ओलिंपिक में हिस्सा ले चुके हैं। गरीबी के कारण लिंबा राम गौरैया, तीतर जैसे पक्षियों का शिकार करते थे ताकि पेट भरा जा सके। वह बांस से बनाए हुए तीरों के साथ शिकार करते थे। फिर उनके चाचा ही थे, जिन्होंने लांबा को खबर दी कि सरकार अच्छे तीरंदाजों की तलाशमें थे। तब लांबा 15 साल के थे जब उन्हें आर.एस. सोढ़ी की कोचिंग के तहच चार महीने की ट्रेनिंग के लिए स्पेशल एरिया गेम्स प्रोग्राम के लिए नई दिल्ली बुलाया गया था। फिर यहां से लिंबा ने मुड़कर नहीं देखा। 1987 में वह बैंगलोर में आयोजित राष्ट्रीय जूनियर स्तर की तीरंदाजी टूर्नामेंट में समग्र चैंपियन बने। फिर 1988 में नेशनल सीनियर लेवल टूर्नामेंट में विजयी रहे। 1988 में ओलंपिक खेलने के बाद 1989 में वह स्विट्जरलैंड के लुसाने में आयोजित विश्व तीरंदाजी चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल में पहुंचे। लिंबा को भारत सरकार ने 1991 में अर्जुन पुरस्कार और 2012 में पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया।












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