Fifa World Cup 2022: मोरक्को से हार के बाद बेल्जियम में दंगे क्यों हुए ?
2022 के विश्वकप फुटबॉल प्रतियोगिता में जीत-हार का उन्माद कुछ ऐसा फैला कि कतर से करीब छह हजार किलोमीटर दूर एक देश में दंगे भड़क गये। मोरक्को अफ्रीका का देश है और बेल्जियम यूरोप का।
2022 के विश्वकप फुटबॉल प्रतियोगिता में जीत-हार का उन्माद कुछ ऐसा फैला कि कतर से करीब छह हजार किलोमीटर दूर एक देश में दंगे भड़क गये। मोरक्को अफ्रीका का देश है और बेल्जियम यूरोप का। विश्वकप फुटबॉल प्रतियोगिता में अगर मोरक्को ने बेल्जियम को हरा दिया तो दंगे क्यों भड़क गये ? बेल्जियम आखिर क्यों साम्प्रदायिकता की आग में जल गया ? फुटबॉल के खेल में आखिर नस्ली और साम्प्रादायिक घृणा कहां से आ गयी ? इन बातों को समझने के लिए बेल्जियम के राजनीतिक इतिहास के पन्ने पलटने होंगे।

समुद्री मार्ग के कारण बेल्जियम के नजदीक है मोरक्को
मोरक्को अफ्रीका महादेश के उत्तर में बसा एक देश है। यह अटलांटिक महासागर और भूमध्यसागर के किनारे बसा है। जिब्राल्टर जलसंधि अफ्रीका के मोरक्को और यूरोप के स्पेन को अलग करती है। समुद्री जल मार्ग के कारण मोरक्को बिल्कुल यूरोप के नजदीक है। मोरक्को के सबसे नजदीक स्पेन है। स्पेन की सीमा फ्रांस से मिलती है। फ्रांस, बोल्जियम का पड़ोसी देश है। इस लिहाज से बेल्जियम भी मोरक्को के नजदीक है। मोरक्को में पहले रोमन सामाज्य का शासन था। फिर यूनानियों ने इस पर प्रभाव जमाया। सातवीं शताब्दी में अरब के लोग यहां आये। फिर यहां इस्लाम का प्रचार हुआ। 15वीं शताब्दी मे सबसे पहले पुर्तगाल ने मोरक्को पर नियंत्रण स्थापित किया। जिब्राल्टर जलसंधि, अटलांटिक महासागर और भूमध्यसागर को जोड़ती है। इसलिए मोरक्को की भौगिलक स्थिति यूरोप के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। व्यापारिक रूप से भी और सामरिक रूप से भी। यूरोपीय देश मोरक्को में प्रभाव के लिए होड़ कर रहे थे। फ्रांस शक्तिशाली देश था। 1912 में फ्रांस, मोरक्को का संरक्षक बन गया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद मोरक्को में आजादी की मांग उठने लगी। 1956 में मोरक्को को आजादी मिली। चूंकि मोरक्को में फ्रांस और स्पेन का प्रभाव रहा इसलिए यहां के लोग अरबी भाषा के अलावे फ्रांसीसी और स्पेनिस भाषा भी बोलते थे। बाद में भाषा के इसी ज्ञान की वजह से मोरक्को के निवासियों ने बेल्जियम पर गहरा असर डाला।
बेल्जियम की आंतरिक समस्याएं
बेल्जियम यूरोप का महत्वपूर्ण देश है। यूरोपीय संघ का मुख्यालय यहीं हैं। अमेरिका और पश्चिमी देशों के सैनिक संगठन नाटो का मुख्यालय भी यहीं है। यह एक छोटा सा देश है जिसकी आबादी केवल 1 करोड़ 15 लाख है। यह एक ऐसा देश है जो भाषायी रूप से विभाजित है। 59 फीसदी लोग डच (नीदरलैंड) भाषा बोलते हैं और ये जिस क्षेत्र में रहते हैं उसे प्लेमिश कहा जाता है। 40 फीसदी लोग फ्रेंच भाषा बोलते हैं और ये वालोनिया क्षेत्र में रहते हैं। इन दोनों समुदायों में संघर्ष और विरोध के कारण बेल्जियम की आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था बहुत अस्थिर रही। चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता। मिली जुली सरकार बनती भी तो वह जल्द गिर जाती। अस्थिर सरकारों की वजह से बेल्जियम की शासन व्यवस्था बहुत लुंजपुंज रही। सत्ता के लिए कई समझौते करने पड़े। फिर दूसरे देशों से आने वाले लोगों की आबादी बढ़ती गयी। कमजोर सरकारें प्रवासियों की बाढ़ पर नियंत्रण नहीं लगा सकीं। इसके कारण इस देश में नयी दिक्कतें शुरू हो गयीं।
बेल्जियम में मोरक्को मूल के लोग
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के अन्य देशों की तरह बेल्जियम में भी नवनिर्माण की शुरुआत हुई। संरचना खड़ा करने के लिए मजदूरों की कमी थी। मोरक्को चूंकि नजदीक था और वहां के लोग फ्रांसीसी बोलते थे। इसलिए वहां के श्रमिकों को अहमियत दी गयी। बेल्जियम 1974 तक मोरक्को से श्रमिक बुलाता रहा। फिर उनके परिवारों को भी लाने की इजाजत दे दी गयी। मोरक्को से आने वाले श्रमिक मुस्लिम समुदाय के थे। धीरे-धीरे बेल्जियम में मुस्लिम समुदाय की एक बड़ी आबादी बस गयी। इसके बाद अन्य देशों से भी मुस्लिम लोग आकर यहां बसे। इनमें सबसे बड़ी जनसंख्या मोरक्को के लोगों की है। धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से अलग होने के कारण मोरक्को मूल के लोग, बेल्जियम के ईसाई लोगों से घुलमिल नहीं पाये। फिर धीरे-धीरे दोनों में पूर्वाग्रह और अविश्वास बढ़ने लगा। मोरक्को मूल के लोग कई पीढ़ियों से बेल्जियम के नागरिक हैं लेकिन अब भी उनका प्रेम मोरक्को के प्रति बना हुआ है। बेल्जियम की राजधानी ब्रूसेल्स का एक उपनगर है मोलनबेक। मोलनबेक की आधी आबादी मुस्लिम समुदाय की है। ईसाई धर्म के बाद इस्लाम धर्म यहां का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है। अब तो इस्लाम पार्टी बेल्जियम के चुनाव में शामिल भी होती है। 2012 के स्थानीय चुनाव में मोलनबेक से उनका एक प्रत्याशी जीता भी था।
फुटबॉल और हिंसा
दूसरी तरफ अविश्वास और अशांति के बीच भी मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग बेल्जियम के विकास में भूमिका निभाते रहे। मूसा डेंबले बेल्जियम के मशहूर फुटबॉल खिलाड़ी थे। वे सेंटर हाफ के पोजिशन से खेलते थे और बॉक्स टू बॉक्स मार्किंग में माहिर थे। इसके अलावा मारुएन फेलेनी, अदनान जनूजाज ने भी बेल्जियम के लिए फुटबॉल खेला। लेकिन मोरक्को को लेकर यहां की एक बड़ी मुस्लिम आबादी में खास आग्रह रहा है। 2017 में मोरक्को ने विश्वकप फुटबॉल प्रतियोगिता 2018 के लिए क्वालिफाई किया था। इसके बाद बेल्जियम के कई इलाकों में मोरक्को समर्थक सड़क पर निकल कर जश्न मनाने लगे। यह जश्न जल्द ही हिंसक प्रदर्शन में बदल गया। हंगामा कर रहे लोगों ने करीब 20 पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया था। 2022 के विश्वकप में तो मोरक्को ने बेल्जियम को हरा ही दिया। ये फुटबॉल का बहुत बड़ा उलटपेर था। ये हार बेल्जियम के सभी नागरिकों के लिए अपमानजनक थी। लेकिन जब बेल्जियम के एक खास समुदाय ने मोरक्को के समर्थन में जश्न मनाना शुरू कर दिया तो बात बिगड़ गयी। प्रदर्शनकारी मोरक्को के झंडे में लिपटे हुए थे। कुछ जानकारों का कहना है, चूंकि फ्रांस ने मोरक्को को गुलाम बनाया था इसलिए वे फ्रांसीसी भाषियों के प्रति अपना आक्रोश प्रगट करने के लिए ये गलत रास्ता अपनाते हैं। वजह चाहे कुछ भी हो, किसी हाल में हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता।












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