ताइवान पर Trump ने टेके घुटने! किस 'लोभ' में गिरवी रखी दशकों पुरानी US पॉलिसी? बीजिंग समिट के बाद का पूरा सच
Trump Warns Taiwan After Xi Jinping Summit: ग्लोबल पॉलिटिक्स में महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका ने क्या चीन के आगे घुटने टेक दिए हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपनी दो दिवसीय हाई-प्रोफाइल बीजिंग समिट खत्म करने के बाद एक ऐसा बयान दिया है, जिसने वाशिंगटन की दशकों पुरानी विदेश नीति को हिलाकर रख दिया है। ट्रंप ने साफ शब्दों में ताइवान को चेतावनी दी है कि वह चीन से खुद को पूरी तरह आजाद घोषित करने की गलती बिल्कुल न करे। ट्रंप ने कहा, 'चीन बहुत ताकतवर है, आजादी की बात भूल जाओ'
फॉक्स न्यूज से बातचीत के दौरान ट्रंप ने 15 मई को साफ कहा कि वह किसी भी देश को आजाद होते हुए देखने के मूड में नहीं हैं। इस हैरान करने वाले यू-टर्न ने पूरी दुनिया के कूटनीतिज्ञों को चौंका दिया है। कल तक ताइवान की सुरक्षा की कसम खाने वाला अमेरिका आज इस कदर बदल गया है कि ट्रंप ताइवान को ही अमेरिकी तकनीक चुराने का दोषी बता रहे हैं। कूटनीतिक गलियारों में अब यह बहस छिड़ गई है कि आखिर ट्रंप ने किस कारोबारी और रणनीतिक 'लोभ' में अमेरिका की साख और उसकी ताइवान नीति को बीजिंग के हाथों गिरवी रख दिया है।

▶️ दूरी और ताकत का गणित: ट्रंप ने समझाया ताइवान क्यों है 'मुश्किल समस्या'
राष्ट्रपति ट्रंप ने ताइवान और चीन के बीच के इस विवाद को एक भौगोलिक और सैन्य नजरिए से समझाने की कोशिश की है। उन्होंने ताइवान को एक 'कठिन समस्या' बताते हुए कहा कि अगर आप दोनों देशों की ताकत और स्थिति की तुलना करेंगे, तो आपको जमीन-आसमान का अंतर दिखेगा।
ट्रंप ने कहा, "जब आप आंकड़ों और परिस्थितियों को देखते हैं, तो समझ आता है कि चीन एक बहुत ही विशाल और बेहद शक्तिशाली देश है। दूसरी तरफ ताइवान बहुत ही छोटा सा द्वीप है। जरा सोचिए, ताइवान चीन की मुख्य भूमि से महज 59 मील की दूरी पर है, जबकि हम (अमेरिका) वहां से 9,500 मील दूर बैठे हैं। ऐसे में ताइवान की रक्षा करना वाकई एक बड़ी और पेचीदा चुनौती है।"
▶️कारोबारी 'लोभ' या ईरान का डर? ट्रंप के इस महा-समझौते का इनसाइड गेम (Why Trump Compromised US Policy Over Taiwan)
डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से एक बिजनेसमैन की तरह राजनीति करने के लिए जाने जाते हैं, और इस बार भी उन्होंने ताइवान जैसे रणनीतिक साझेदार की बलि चढ़ाकर 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) के तहत अपने आर्थिक और कूटनीतिक फायदों को प्राथमिकता दी है। जानकारों का मानना है कि ट्रंप के इस आत्मसमर्पण के पीछे दो बड़े 'लोभ' और मजबूरियां साफ नजर आती हैं।
🔹पहला लोभ है- बड़ा व्यापारिक फायदा। ट्रंप ने खुद इशारा किया कि चीन की सरकारी कंपनियां अमेरिकी विमान निर्माता 'बोइंग' (Boeing) से शुरुआती तौर पर ही 200 पैसेंजर एयरक्राफ्ट खरीदने की तैयारी में हैं, जिसकी डील अरबों डॉलर की है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नौकरियों को बढ़ावा देने के लिए ट्रंप को चीन के इस बड़े ऑर्डर की सख्त जरूरत थी।
🔹 दूसरा बड़ा कारण है- ईरान का परमाणु संकट और वैश्विक दबाव। ट्रंप ने दावा किया कि शी जिनपिंग इस बात पर सहमत हो गए हैं कि परमाणु हथियारों से लैस ईरान दुनिया के लिए खतरा है और चीन इस मुद्दे को सुलझाने में अमेरिका की मदद करेगा। मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप को अच्छी तरह पता है कि बिना चीन के सहयोग के ईरान को काबू करना नामुमकिन है।
इसके अलावा, ट्रंप ताइवान की चिप और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री (Semiconductor Industry) से भी बेहद नाराज हैं, जिसे वे अमेरिका के रोजगार को नुकसान पहुंचाने वाला मानते हैं। यही वजह है कि उन्होंने ताइवान को मिलने वाले अमेरिकी हथियारों के पैकेज पर भी रोक लगा दी है। साफ शब्दों में कहें तो, ट्रंप ने बोइंग विमानों की बिक्री और ईरान के मोर्चे पर चीन का साथ पाने के लालच में ताइवान की सुरक्षा और अमेरिका की दशकों पुरानी 'रणनीतिक अस्पष्टता' (Strategic Ambiguity) की नीति को दांव पर लगा दिया है।
▶️ 'हमारे पुराने राष्ट्रपतियों को अक्ल नहीं थी'- ताइवान पर भड़के ट्रंप
इस बातचीत के दौरान डोनाल्ड ट्रंप सिर्फ चीन की तारीफ करने तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने अमेरिका के पुराने राष्ट्रपतियों और ताइवान के सबसे बड़े बिजनेस 'सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री' पर भी जमकर भड़ास निकाली। उन्होंने ताइवान पर अमेरिका की तकनीक चुराने का एक बड़ा आरोप मढ़ दिया।
ट्रंप ने इतिहास का हवाला देते हुए तीखे लहजे में कहा कि ताइवान आज जो कुछ भी है, वह सिर्फ इसलिए है क्योंकि अतीत में अमेरिका के पास ऐसे राष्ट्रपति थे जिन्हें यह अंदाजा ही नहीं था कि वे क्या कर रहे हैं। ट्रंप के मुताबिक, उन नेताओं की बेवकूफी की वजह से ताइवान ने अमेरिका के पूरे चिप (Semiconductor) उद्योग को ही हमसे छीन लिया।
▶️ क्या ताइवान को नहीं मिलेंगे अमेरिकी हथियार? बढ़ गया सस्पेंस
ट्रंप के इस नए रुख के बाद अब ताइवान को मिलने वाली अमेरिकी सैन्य मदद पर काले बादल मंडराने लगे हैं। दरअसल अमेरिका ने पहले ताइवान के लिए एक बड़े हथियार पैकेज (Arms Package) को मंजूरी दी थी। लेकिन ट्रंप ने अब खुलासा किया है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। जिनपिंग के विरोध के बाद ट्रंप ने साफ कहा कि उन्होंने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वे ताइवान को यह वेपन पैकेज देंगे या नहीं।
जब ट्रंप से पूछा गया कि अगर चीन कल को ताइवान पर हमला कर देता है, तो क्या अमेरिकी सेना बीच में आएगी? इस पर ट्रंप ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने वाशिंगटन की दशकों पुरानी 'रणनीतिक अस्पष्टता' (Strategic Ambiguity) की नीति को बनाए रखा, जिसके तहत अमेरिका कभी यह साफ नहीं करता कि वह युद्ध की स्थिति में सीधे लड़ेगा या नहीं।
हालांकि, ट्रंप ने यह उम्मीद जरूर जताई कि जब तक वे राष्ट्रपति की कुर्सी पर हैं, चीन ताइवान के खिलाफ कोई फौजी कार्रवाई नहीं करेगा। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनके हटने के बाद चीन ऐसा कदम जरूर उठा सकता है।
▶️ एयरफोर्स वन में हुई सीक्रेट बात: व्यापार और ईरान पर भी बनी सहमति?
चीन दौरे के दौरान ट्रंप ने सार्वजनिक मंचों पर तो ताइवान के मुद्दे को उठाने से परहेज किया, क्योंकि बीजिंग इस मुद्दे पर बेहद आक्रामक रहता है। लेकिन जब वे अपने विशेष विमान 'एयरफोर्स वन' से वापस लौट रहे थे, तो उन्होंने पत्रकारों को बताया कि बंद कमरों की बैठक में शी जिनपिंग ने ताइवान का मुद्दा बेहद मजबूती से उठाया था।
इस ऐतिहासिक दौरे में ताइवान के अलावा दो और बड़े मुद्दों पर चर्चा हुई:
- ईरान का परमाणु संकट: ट्रंप का दावा है कि शी जिनपिंग इस बात पर पूरी तरह सहमत थे कि परमाणु हथियारों से लैस ईरान दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा है और वे इस विवाद को सुलझाने में मदद करने के इच्छुक हैं। हालांकि, चीन की सरकार ने इस बातचीत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
- अरबों डॉलर की ट्रेड डील: व्यापार के मोर्चे पर ट्रंप ने संकेत दिया कि चीन शुरुआती तौर पर अमेरिकी कंपनी बोइंग (Boeing) से 200 हवाई जहाज खरीद सकता है, और आने वाले समय में यह संख्या सैकड़ों तक जा सकती है। हालांकि, अभी तक किसी फाइनल एग्रीमेंट की घोषणा नहीं हुई है।
पूरी यात्रा के दौरान ट्रंप चीनी राष्ट्रपति के मुरीद नजर आए। उन्होंने जिनपिंग को एक 'महान नेता' बताया और कहा कि दोनों देशों का भविष्य एक साथ बेहद शानदार होने वाला है। लेकिन इस 'शानदार भविष्य' की वेदी पर कहीं न कहीं ताइवान की सुरक्षा को दांव पर लगा दिया गया है, जो आने वाले समय में एशिया-पैसिफिक क्षेत्र की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है।














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