पिता की नौकरी गई, अकादमी जाना था मुश्किल, कोरोनो ने भी नहीं छोड़ा, पर बेटे ने जीतकर दिखाया वर्ल्ड कप

नई दिल्ली। वेस्टइंडीज की मेजबानी में खेले गये अंडर 19 विश्वकप के फाइनल मैच में भारतीय टीम ने इंग्लैंड को 4 विकेट से मात देकर पांचवा खिताब जीत लिया है। भारतीय टीम को मिली इस ऐतिहासिक जीत में उसके कप्तान यश धुल, उपकप्तान शेख रशीद, राज बावा, रवि कुमार और निशांत सिंधु ने शानदार प्रदर्शन से अहम योगदान दिया। भारतीय टीम के उपकप्तान शेख रशीद ने सेमीफाइनल मैच की तरह फाइनल मैच में भी अहम पारी खेली और टीम की जीत को सुनिश्चित किया। जहां रशीद ने सेमीफाइनल मैच में 94 रन की पारी खेलकर कप्तान यश धुल के साथ 200 रनों से ज्यादा की साझेदारी कर बड़ी स्कोर खड़ा करने में अहम योगदान दिया था।
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वहीं फाइनल मैच में भी शेख रशीद ने 50 रनों की अहम पारी खेलकर टीम को मुश्किलों से बाहर निकाला और रन चेज में अहम योगदान दिया।शेख रशीद की इन पारियों की बात करें तो इसकी सबसे खास बात यह रही कि उनके बल्ले से यह पारियां उस वक्त निकलकर आयी जब भारतीय टीम ने अचानक से विकेट खो दिये। शेख रशीद की इन पारियों को देखने के बाद उन्हें मध्यक्रम बल्लेबाजी के भविष्य के रूप में देखा जा रहा है, जिनके पास न सिर्फ पारी को संभालने का टैलेंट है बल्कि तेजी से रन बनाने की प्रतिभा है।
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आसान नहीं था राशिद का यहां तक पहुंचने का सफर
हालांकि क्रिकेट के इस मुकाम पर पहुंचने का शेख रशीद का सफर आसान नहीं रहा है और उनके यहां तक पहुंचने में उनके पिता ने काफी योगदान दिया है। उल्लेखनीय है कि गुंतुर के रहने वाले शेख रशीद जिस क्रिकेट अकादमी में सीखने के लिये जाते थे वह उनके घर से 50 किमी दूर मंगलगिरी में था। घर से इतनी दूर होने के बावजूद शेख रशीद कभी प्रैक्टिस के लिये लेट नहीं हुए क्योंकि उनके पिता शेख बलिशा अपने स्कूटर से हर रोज छोड़ने के लिये लेकर जाते थे। शेख रशीद के पिता को इसके चलते काफी खामियाजा भी भुगतना पड़ा और इसकी वजह से वह ऑफिस लेट पहुंचते थे। ऑफिस देर से पहुंचने के चलते शेख रशीद के पिता को अपनी जॉब से भी हाथ धोना पड़ा, कतो वहलीं पर कई शहरों को बदलना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद उनके पिता ने हार नहीं मानी और अपने बेटे के दिल में क्रिकेट खेलने की आग को जलते रहने दिया।

ऐसे हुई पिता को राशिद के टैलेंट की पहचान
शेख रशीद के पिता ने प्रसाद क्रिकेट अकादमी में उनके पहली बार सेलेक्शन की घटना को याद करते हुए बताया कि उनके दोस्त ने राशिद को पहली बार एक मैच के दौरान खेलते हुए देखा था। शेख राशिद के पिता उस समय हैदराबाद के बैंकों में रिकवरी एजेंट का काम किया करते थे।
उन्होंने बताया,' मेरे दोस्त ने मुझे बुलाया और बताया कि राशिद में खेलने के हुनर का गिफ्ट है, ऐसे में उसे अपने टैलेंट के प्रति बढ़ावा देना चाहिये। दुर्भाग्य से हम आर्थिक रूप से उतने मजबूत नहीं थे कि किराया देने के साथ ही उसकी ट्रेनिंग और पढ़ाई का खर्चा उठा सकें। इस वजह से 2012 में हम गुंतुर चले गये। लेकिन तभी और ज्यादा परेशानियों ने घर बना लिया और मुझे समझ नहीं आ रहा ता कि मैं क्या करूं। मैं राशिद को घर से 6 किमी दूर एक मैदान पर लेकर जाने लगा और वहां पर थ्रो डाउन कराने लगा। कुछ महीनों बाद मुझे एसीए रेजिडेंशियल क्रिकेट अकादमी के बारे में पता चला, जहां पर मैं उसे ट्रायल के लिये लेकर गया।'

50 किमी दूर ले जाना पड़ता था ट्रेनिंग के लिये
राशिद ने अपने पिता की बात मानते हुए अपने सपने को जिंदा रखने के लिये खेलना जारी रखा। राशिद के पिता ने अपने बेटे की तारीफ करते हुए कहा कि उसने कभी भी मुझसे फिल्म दिखाने, किसी एडवेंचर पार्क ले जाने, किसी खिलौने या फिर गैजेट को दिलाने की जिद नहीं की। वह हमेशा क्रिकेट खेलने में अपना ध्यान लगातार रहा और मैंने वो सब कुछ किया जो उसके लिये कर सकता था। वह 7-8 साल का रहा होगा जब हमारी किस्मत ने बदलना शुरु किया। जब राशिद कोच जे कृष्णा की अकादमी में ट्रायल देने के लिये पहुंचा तो कोच उसकी तकनीक देखकर हैरान रह गये। वो उतनी छोटी उम्र में अंडर 16 के गेंदबाजों को आसानी से खेलता हुआ नजर आ रहा था और काफी शांत नजर आ रहा था। मुझे यह पता था कि उसके अंदर टैलेंट है और मुझे उसे बढ़ाने में पूरी मदद करनी है।

जब छूट गई पिता की नौकरी
सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन तभी शेख राशिद के पिता जो कि उस समय एक स्थानीय ऑटोमोबाइल फर्म में काम करते थे, काम पर देरी से पहुंचने की वजह से नौकरी से हाथ धो बैठे। इसके बाद कोच राव (जो कि विकेटकीपर केएस भरत के भी कोच रहे हैं) ने एक सुझाव दिया कि राशिद को ट्रेनिंग कैम्प में ही रहने की इजाजत दे दी जाये। राशिद के पिता पहले तो हिचकिचाये लेकिन बाद में मान गये। दो साल के बाद राशिद का चयन आंध्र की अंडर 14 टीम में हुआ, जिसके बाद उसने 2018-19 की विजय मर्चेंट ट्रॉफी के सीजन में 3 शतक लगाकर 674 रन बनाये और अपनी काबिलियत का परिचय दे डाला।
2020-21 की वीनू मांकड़ ट्रॉफी में उन्होंने 6 मैचों में 376 रन बनाये और सबसे ज्यादा रन बनाने वाले दूसरे खिलाड़ी बने। इस प्रदर्शन के दम पर उन्हें अंडर 19 एशिया कप 2021 की टीम में जगह दी गई। दिसंबर में खेले गये इस टूर्नामेंट के सेमीफाइनल मैच में राशिद ने नाबाद 90 रनों की पारी खेलकर टीम को फाइनल में पहुंचाया, जहां पर उसने श्रीलंका को मात देकर खिताब अपने नाम कर लिया।

पहले मैच के बाद कोरोना ने जकड़ा
एशिया कप में शानदार जीत दिलाने के बाद शेख राशिद के लिये अंडर 19 विश्वकप का मंच सच उठा था लेकिन साउथ अफ्रीका के खिलाफ पहला मैच खेलने के बाद ही वो कोरोना वायरस के संक्रमण का शिकार हो गये। निराशा से भरे राशिद ने अपने कोच कृष्ण राव को फोन लगाया और रोने लगे। राशिद को लगा कि उनका विश्वकप का सपना अधूरा ही रह जायेगा, क्योंकि उनकी हालत ज्यादा खराब थी जिसकी वजह से नॉकआउट मैचों तक उनके रिकवर होने की उम्मीद कम नजर आ रही थी। हालांकि कोच ने उन्हें समझाते हुए नकारात्मक विचारों से बाहर निकाला।

फिर भी सच किया विश्वकप जीतने का सपना
बांग्लादेश के खिलाफ क्वार्टरफाइनल मैच से पहले राशिद ठीक होकर टीम में वापस लौटे तो 26 रनों की जुझारू पारी खेली और थोड़ा कमजोर नजर आये। लेकिन जब टीम को सेमीफाइनल और फाइनल मैच में उनके बल्ले से रनों की जरूरत पड़ी तो उन्होंने सबसे अहम पारियां खेलकर विश्वकप जीतने के सपने को पूरा किया। राशिद इन दोनों ही मैचों में मेच्योरिटी दिखायी और जब विकेटों का पतन जल्दी हुआ तो उन्होंने पारी को संभालकर आगे ले जाने का काम किया और आगे जब तेजी से रन बनाने की जरूरत पड़ी तो वो भी कर के दिखाया। राशिद का विश्वकप जीतने का सपना जरूर पूरा हो गया है और यहां से एक नया भविष्य तैयार होने जा रहा है लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर हजारों युवाओं के लिये प्रेरणा स्त्रोत बनेगा।
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