2007 विश्वकप फाइनल के 15 साल बाद मिस्बाह उल हक ने किया खुलासा, बताया क्यों खेला था वो स्कूप शॉट

नई दिल्ली। क्रिकेट के सबसे छोटे फॉर्मेट टी20 के पहले विश्वकप संस्करण को कौन भूल सकता है, जिसमें भारतीय टीम ने बेहतरीन ड्रामेटिक तरीके से पाकिस्तान को फाइनल में हराकर खिताब अपने नाम कर लिया था। भारतीय टीम ने इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने से पहले सिर्फ एक ही अंतर्राष्ट्रीय टी20 मैच खेला था, जिसके चलते उसका जीतना ही नहीं सेमीफाइनल में पहुंचना भी काफी मुश्किल नजर आ रहा था। हालांकि इसके बावजूद भारतीय टीम ने सभी को हैरान करते हुए फाइनल में जगह बना ली, जहां पर उसका सामना पाकिस्तान की टीम से हुआ। भारत ने इस टूर्नामेंट का पहला मैच भी पाकिस्तान के खिलाफ खेला था, जहां पर उसे बॉल आउट नियम के चलते जीत मिली थी।
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ऐसे में सभी को एक रोमांचक फाइनल देखने की उम्मीद थी और वही देखने को भी मिला। पाकिस्तान की टीम फाइनल मैच में जीतने के करीब थी और उसे जीत के लिये सिर्फ 6 रन की दरकार थी। मिस्बाह उल हक एक अच्छी पारी खेल रहे थे और अपनी टीम को जीत दिलाने के करीब थे लेकिन तभी जोगिंदर शर्मा की गेंद पर मिस्बाह उल हक ने स्कूप शॉट खेला और श्रीसंत को एक आसान सा कैच थमा दिया। इस कैच के साथ ही भारत ने अपना पहला टी20 विश्वकप जीत लिया।

15 साल बाद खोला स्कूप शॉट खेलने का राज
पाकिस्तान क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मिस्बाह उल हक ने 2007 टी20 विश्वकप फाइनल के खत्म होने के 15 साल बाद इस बात का खुलासा किया है कि उन्होंने जोगिंदर शर्मा की गेंद पर वो स्कूप शॉट क्यों खेला था। पाकिस्तान क्रिकेट टीम के अपने पूर्व साथियों शोएब अख्तर और मोहम्मद युसुफ के साथ बात करते हुए मिस्बाह उल हक ने 2007 टी20 विश्वकप फाइनल और 2011 वनडे विश्वकप सेमीफाइनल पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि कैसे वो थोड़ा सा ओवरकॉन्फिडेंट हो गये थे जिसकी वजह से उन्होंने वो शॉट खेला था।
मिस्बाह ने कहा,'2007 में मैंने पूरे टूर्नामेंट के दौरान को उस शॉट को खेलते हुए बहुत सारे चौके बटोरे थे। यहां तक कि फाइन लेग वहां पर मौजूद होता था तो वहां पर मैं सिंगल्स बटोर लिया करता था। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वो शॉट खेलकर मैंने बहुत सारे रन बटोरे थे, तो वहीं स्पिनर्स के खिलाफ काफी रन बनाये। मैं उस दौरान इस एक शॉट से फाइन लेग को पीछे छोड़ देता था। तो हां यह कह सकते हैं कि मैं उस वक्त थोड़ा ओवरकॉन्फिडेंट हो गया था और मिसटाइम कर बैठा वो भी तब जब मुझे सबसे ज्यादा विश्वास था।'

बैटिंग पावरप्ले का फायदा उठाना चाहते थे हम
मिस्बाह ने इसके बाद 2011 विश्वकप में मोहाली के मैदान पर खेले गये सेमीफाइनल को भी याद किया और बताया कि उनकी टीम ने रनों का पीछा करते आखिरी के बल्लेबाजी पावरप्ले में रन बनाने का सोचा था और आखिरी के 5 ओवर्स में पारी को बदलने की कोशिश की थी, हालांकि उन्हें ज्यादा स्ट्राइक नहीं मिली की वो अंतर पैदा कर सकें।
उन्होंने कहा,'2011 में मोहाली की पिच पर भारत ने 4 ओवर्स में 44 (39/0) के आस पास रन बनाये थे, लेकिन जैसे-जैसे गेंद पुरानी होने लगी, रन बनाना मुश्किल हो गया। सचिन तेंदुलकर ने उस मैच में 80 के आसपास (85) रन बनाये थे और मैन ऑफ द मैच बने थे। भारत उस अच्छी शुरुआत के बाद लगातार संघर्ष कर रहा था। यहां तक कि हमने अच्छी शुरुआत करते हुए 15 ओवर्स में सिर्फ एक विकेट गंवाकर 80 रन बना लिये थे लेकिन अगले कुछ ओवर्स में हमने कोई खास रन नहीं बनाये और 3 विकेट खो दिये। इसके बाद युवराज और हरभजन की स्पिन ने हमारे लिये मुश्किल पैदा की और उनके तेज गेंदबाज भी आ गये। जब सिंगल्स लेना मुश्किल हो गया तो एक ही चीज बची थी कि या तो आप बहुत जोर से मारें या बर्दाश्त करें।'

अगर दूसरे छोर से मिलता साथ तो जीत जाते मैच
मिस्बाह उल हक ने इसी मैच पर बात करते हुए आगे कहा कि 2011 के विश्वकप के दौरान हम पारी के आखिर में मिलने वाले पावरप्ले में बहुत तेजी से रन बना रहे थे और हमारे दिमाग में था कि आखिर के 10 ओवर्स में हमें 100 रन भी बनाने होंगे तो हमारे पास 5 ओवर्स का बैटिंग पावरप्ले रहेगा। अगर हमारे पास उस वक्त तक विकेट होती तो हम आसानी से चेज कर जाते। आखिरी के 5 ओवर्स में मैं अकेला खड़ा रह गया था और सिर्फ 2 ओवर्स ही बल्लेबाजी करने को मिली। हम उस मैच को 20-22 रन से हार गये और मुझे पावरप्ले के 3 ओवर खेलने को नहीं मिले। दूसरे छोर पर कोई बल्लेबाज ही नहीं बचा था।












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