'ऐसा लगता है जैसे भेड़-बकरी हों', सीएसके के दिग्गज खिलाड़ी ने खोला IPL नीलामी के डार्क साइड का राज
नई दिल्ली। दुनिया की सबसे बड़ी टी20 लीग आईपीएल के लिये होने वाली खिलाड़ियों की नीलामी कई प्लेयर्स के लिये जीवन बदल देने वाला लम्हा होता है तो कई खिलाड़ियों के लिये उतना ही निराशाजनक भी साबित होता है। नीलामी के दौरान कई खिलाड़ी जो अनसोल्ड रह जाते हैं, उन्हें रिजेक्शन से उबरने में समय लगता है, खासतौर से टीमों की ओर से खुद को इग्नोर होते देखना, अपने जानने वाले साथी खिलाड़ियों पर पैसों की बरसात होते देखना कई प्लेयर्स पर गहरा प्रभाव छोड़ जाता है। इस साल भी जब आईपीएल ऑक्शन का आयोजन हुआ तो 590 खिलाड़ियों की किस्मत पर बोली लगी लेकिन सिर्फ 204 खिलाड़ी ही बिके, जबकि बाकियों की किस्मत का फैसला अगले साल के लिये टल गया है।

नीलामी के दौरान फ्रैंचाइजियों ने शुरुआत में बड़े नामों की ओर ही ध्यान दिया और जब लगभग टीम तैयार हो चुकी थी तो आखिर में जाकर कई खिलाड़ियों को अपने खेमे में शामिल किया। आईपीएल नीलामी के दौरान टीमें लंबे समय तक खिलाड़ियों को अपने खेमे से शामिल करने के उद्देश्य से खरीदती नजर आ रही थी। इसी फेहरिस्त में भारत के सीनियर बल्लेबाज रॉबिन उथप्पा को भी लंबे इंतजार के बाद सीएसके की टीम ने 2 करोड़ के बेस प्राइस में अपने खेमे में शामिल किया।
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खिलाड़ी की मेंटल हेल्थ के लिये सही नहीं है ऑक्शन सिस्टम
भले ही चेन्नई सुपर किंग्स की टीम में वापस आकर रॉबिन उथप्पा खुशी से फूले नहीं समा रहे हों लेकिन उनका मानना है कि आईपीएल ऑक्शन किसी भी खिलाड़ी को मानसिक रूप से थका देती है। उथप्पा का मानना है कि नीलामी का सिस्टम किसी भी खिलाड़ी के मानसिक स्वास्थ्य के लिये सही नहीं है।
न्यूज 9 से बात करते हुए उथप्पा ने कहा,'सीएसके जैसी टीम के लिये खेलना मेरी चाहत थी, मैं यही प्रार्थना कर रहा था कि सीएसके में वापस ले लिया जाये, मेरा परिवार और मेरे बेटे ने भी इसको लेकर प्रार्थना की थी। मैं खुश हूं कि मुझे वापस अपनी जगह मिली है क्योंकि वह पर एक सम्मान और सुरक्षा का अनुभव होता है। वहां पर खिलाड़ियों को बैक किया जाता है जिससे मुझे लगता है कि मैं कुछ भी कर सकता हूं।'

भेड़ बकरियों जैसे होता है महसूस
रॉबिन उथप्पा ने आगे बात करते हुए कहा कि नीलामी उस एग्जाम की तरह लगती है जिसके लिये आपने लंबे समय पहले टेस्ट दिया हो और सिर्फ नतीजे का इंतजार हो। उथप्पा का मानना है कि नीलामी के दौरान भेड़-बकरियों जैसा महसूस होता है।
उन्होंने कहा,'सच कहूं तो नीलामी के दौरान आपको भेड़ बकरी जैसा एहसास होता है, जो खुद के बिकने का इंतजार कर रहा होता है। यह अच्छा एहसास नहीं है और मुझे लगता है कि यही एहसास ज्यादातर खिलाड़ियों को क्रिकेट में आता है, खास तौर से भारत में। आपकी हर चीज को देखकर उस पर अपनी राय देने वाले लोगों की एक अलग दुनिया है जो आपको खाने को तैयार है। आपके प्रदर्शन को लेकर राय देना एक अलग चीज है लेकिन आप कितने में बिके हैं इसको लेकर राय बनाना कुछ अलग ही है।'

नीलामी में नहीं होती पागलपन की हद
उथप्पा का मानना है कि मौजूदा नीलामी प्रक्रिया में पागलपन को रोकने का कोई तरीका नहीं है, जिसमें आपको कई बड़े नाम अनसोल्ड या फिर कम पैसों में बिकते हुए नजर आयेंगे, तो ऐसे में खिलाड़ियों के बीच मानसिक संतुलन बनाये रखने के लिये मौजूदा नीलामी प्रक्रिया को खत्म कर ड्रॉफ्ट सिस्टम लागू करना चाहिये जो कि ज्यादा सम्मानजनक होता है।
उन्होंने कहा,'आप लोग इस बात को महसूस नहीं कर सकते कि जो खिलाड़ी नीलामी में नहीं बिका है, वह किस चीज से गुजर रहा है। यह किसी के लिये भी अच्छा एहसास नहीं हो सकता। मेरा दिल उन खिलाड़ियों के बारे में सोचकर बैठ जाता है जो लंबे समय से इस लीग में खेल रहे थे लेकिन इस साल नीलामी में नहीं बिकने की वजह से हिस्सा नहीं बन सके हैं। यह कई बार हरा देने वाला होता है, अचानक से एक क्रिकेटर के रूप में वैल्यू इस बात पर निर्भर करती है कि कोई टीम आप पर कितना खर्च करने को राजी है, और यह खतरनाक है। नीलामी की प्रक्रिया में पागलपन की कोई हद नहीं होती।'

नीलामी के बजाय ऐसे चुने जायें खिलाड़ी
उथप्पा ने नीलामी की प्रक्रिया को खत्म कर ड्रॉफ्ट सिस्टम को लागू करने की बात कही, ताकि खिलाड़ियों का ज्यादा सम्मानित तरीके से टीम में शामिल किया जा सके और किसी को भी यह मानसिक उत्पीड़न न झेलना पड़े।
उन्होंने कहा,'पिछले 15 सालों में लोगों ने नीलामी के चारों ओर हाथापाई करने की पूरी कोशिश की है, और मुझे नहीं पता कि उन्हें इस बात का कोई भी एहसास है। अगर आप नीलामी में मौजूद लोगों से बात करेंगे तो वो यही कहेंगे कि यह काफी अनिश्चित है...अगर आप पहले आते हैं तो औसत पैसा मिलता है जबकि बाद में आने पर पैसों की बरसात होती है। पर सच तो यही है कि किसी के पहले और बाद में आने पर फर्क नहीं पड़ता। हालांकि इस प्रक्रिया के बाद जो होता है वो काफी थकाऊ होता है, ऐसे में मुझे लगता है कि ड्राफ्ट सिस्टम ज्यादा बेहतर और सम्मानजनक होता है।'
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