सड़क से फिर गुलजार होते दिबांग घाटी के गांव

arunachal pradesh: दिबांग घाटी के मिपी सर्किल के गांवों के लोगों को जरूरी चीजें और खाने-पीने के सामानों की खरीदारी के लिए यहां 38 किलोमीटर दूर नजदीकी कस्बे तक पहुंचने में दो दिन पैदल चलना पड़ता था.

दिबांग घाटी के गांवों में लौटने लगे हैं लोग

दिबांग घाटी के मिपी सर्किल के गांवों के लोगों को जरूरी चीजें और खाने-पीने के सामानों की खरीदारी के लिए यहां 38 किलोमीटर दूर नजदीकी कस्बे तक पहुंचने में दो दिन पैदल चलना पड़ता था. इस वजह से एक दशक पहले ज्यादातर लोग गांव छोड़ कर कस्बे में बस गए थे.

सूने हुए थे गांव

अरुणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी की गिनती देश के सबसे दुर्गम इलाकों में होती है. तिब्बत की सीमा से सटे इस इलाके में बसे गांवों में जीवन बेहद दुरूह है. इसकी वजह यह है कि मिपी सर्किल के 13 गांवों में आजादी के 75 साल बाद भी पक्की सड़क नहीं पहुंच सकी थी. लोगों को पहाड़ की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से होकर गांव तक पहुंचना पड़ता था. वह भी बरसात के दिनो में भारी बारिश या जमीन धंसने के कारण बंद हो जाता था. इलाके की आजीविका खेती और मछली पालन पर निर्भर है.

किसी की तबीयत खराब होने या फिर जरूरत का सामान खरीदने के लिए लोगों को नजदीकी कस्बे में जाना पड़ता था. इसके लिए उन्हें दो दिनों तक पैदल चलना पड़ता था. बीते एक दशक के दौरान ज्यादातर गांव वीरान हो गए थे. लोग घरों में ताले लगा कर नजदीकी कस्बे में चले गए थे. चीन की ओर से बढ़ती चुनौतियों की वजह से अब सीमावर्ती इलाके में आधारभूत ढांचा मजबूत करने की कवायद के तहत इलाके में बड़े पैमाने पर पहाड़ियों को काट कर सड़क बनाने का काम शुरू हुआ है.

सड़क बन जाने के बाद गांवों की ओर वापस लौटने लगे हैं लोग

सीमा से सटे घाटी के आखिरी गांव बेराली में तो महज एक ही कच्चा मकान बचा था. जमीन धंसने की घटनाओं की वजह से इलाके में ज्यादातर मकान बांस के बने होते हैं. बीते साल के आखिर में इनमें से कई गांवों तक पक्की सड़क पहुंच गई. उसके कुछ दिनों बाद लोग धीरे-धीरे शहर से गांव की ओर लौटने लगे हैं. इस सड़क के कारण नजदीकी कस्बे तक की दूरी दो घंटे में हो जाती है. बेराली से पहले ब्रांगू गांव के मुखिया तोचा मिपी को भरोसा है कि इलाके में एकाध सड़कों पर ब्रिज बनाने का काम पूरा होने के बाद गांव के तमाम लोग यहां लौट आएंगे.

गांव लौटे लोगों ने जिला प्रशासन के सहयोग से लंबे समय से बंजर पड़े अपने खेतों की सफाई कर उनमें साग-सब्जियां उगाने का काम शुरू कर दिया है. कुछ लोगों ने सुअर और दूसरे पशु खरीद लिए हैं. धीरे-धीरे बांस के मकान भी बनने लगे हैं. अपनी जन्मभूमि पर लौट कर यह लोग बेहद खुश हैं.

बेराली के एक युवक जी. मेलो कहते हैं, हम अपने घर पहुंच कर बेहद खुश हैं. गांव छोड़ने के कारण हम अपने ही घर में बेगाने हो गए थे. उनका परिवार कोई दस साल बाद गांव लौटा है.

अब पीने के पानी और मोबाइल नेटवर्क ही इलाके के लोगों की चिंता का विषय है. एक सर्विस प्रोवाइडर ने नजदीक के अनिनी कस्बे में अपने टावर लगाए हैं, लेकिन अभी वह काम नहीं कर रहे हैं. जिला प्रशासन का कहना है कि इलाके के हर घर तक जल जीवन मिशन के तहत पीने का पानी पहुंचाने पर काम चल रहा है.

गांव के लोग स्थानीय विधायक मोपी मिहू की भूमिका की भी सराहना करते हैं. उनको भरोसा है कि राज्य के डेढ़ हजार किलोमीटर की फ्रंटियर हाईवे परियोजना पूरी होने के बाद यह जिला जल्द ही बाकी जिलों से बेहतर सड़कों से जुड़ जाएगा. सभी सीमावर्ती क्षेत्रों को पूर्व से पश्चिम तक जोड़ने के लिए हाल ही में इस योजना को मंजूरी मिली है.

केंद्र सरकार राज्य में आधारभूत ढांचा मजबूत कर रही है

आधारभूत ढांचा मजबूत करने पर जोर

चीन के तेवरों और हाल में तवांग इलाके में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हुए संघर्ष के बीच भारत अरुणाचल प्रदेश में आधारभूत ढांचा तेजी से मजबूत कर रहा है. अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे इसका अहम हिस्सा है. इस पर वर्ष 2022 में काम शुरू हुआ. दो हजार किमी लंबी इस सड़क का निर्माण भूटान के पास मागो से शुरू हुआ है.

यह परियोजना तवांग, अपर सुबनसिरी, तूतिंग, मेचुका, अपर सियांग, दिबांग घाटी, दसली, छागलागाम, किबिथू, डोंग से होती हुई म्यांमार सीमा से सटे विजयनगर को जोड़ेगी.

राज्य में सीमा सड़क संगठन की ओर से 13,700 फीट की ऊंचाई पर बनाई जा रही सेला टनल के जुलाई 2023 तक पूरी होने की उम्मीद है. सेला बाईपास के लिए बनने वाली दो सुरंगों से दूरी नौ किलोमीटर घटेगी. इससे करीब एक घंटे का समय भी बचेगा. करीब 40 हजार करोड़ रुपए लागत वाली इस परियोजना का लाभ आम लोगों के अलावा सेना को भी मिलेगा. इसके जरिए बहुत कम समय में सीमा तक जवानों और सैन्य उपकरणों को भेजा जा सकेगा.

प्रदेश का राजमार्ग विभाग भी फ्रंटियर हाईवे से अपने गलियारे जोड़ेगा. इसकी वजह से सीमा पर स्थित कई शहर और गांव हाईवे से जुड़ जाएंगे. इससे रोजगार के मौके तो पैदा होंगे ही, लोगों का पलायन भी रुकेगा.

Source: DW

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