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Dadi Ratan Mohini: पाकिस्‍तान में जन्‍मी 'लक्ष्मी' राजस्‍थान आकर कैसे बनीं राजयोगिनी दादी रतन मोहिनी?

Who was Dadi Ratan Mohini: राजस्‍थान के सिरोही जिले में माउंटआबू स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की वर्तमान मुख्य प्रशासनिक प्रमुख राजयोगिनी दादी रतन मोहिनी आज 9 अप्रेल 2025 को अंतिम सफर पर हैं। आबूरोड के शांतिवन से बुधवार सुबह दादी रतन मोहिनी की अंतिम यात्रा शुरू हुई, जो माउंट आबू पहुंचेगी। रतन मोहिनी का निधन 7 अप्रैल 2025 को रात 1:20 बजे को हुआ है। उन्‍होंने 101 साल की उम्र में अहमदाबाद (गुजरात) के एक निजी अस्पताल में आखिरी सांस ली।

दादी रतन मोहिनी का अंतिम संस्‍कार 10 अप्रेल 2025 की सुबह 10 बजे शांतिवन में उनके कॉटेज के सामने स्थित गार्डन में किया जाएगा। माउंट आबू में ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के ज्ञान सरोवर, ग्लोबल अस्पताल, पांडव भवन और म्यूजियम आदि केंद्रों पर उनके पार्थिव शरीर को रखा जाएगा, जहां लोग उनके अंतिम दर्शन कर सकेंगे और दादी को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। यात्रा के बाद पार्थिव शरीर पुनः आबूरोड के शांतिवन लाया जाएगा।

Who Was Dadi Ratan Mohini

ब्रह्माकुमारी संस्थान की मुख्य प्रशासिका दादी रतन मोहिनी के निधन पर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और राज्यपालों ने भी दुख जताया है। दादी रतन मोहिनी की जीवनी के तार पाकिस्‍तान से जुड़े हैं। आइए जानते हैं कि उनका पूरा जीवन परिचय।

Who Was Dadi Ratan Mohini

Dadi Ratan Mohini Biography in Hindi: कौन थीं दादी रतन मोहिनी?

राजयोगिनी दादी रतन मोहिनी, प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय माउंटआबू की वर्तमान मुख्य प्रशासनिक प्रमुख थीं, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन ईश्वरीय ज्ञान, राजयोग साधना और सेवाओं को समर्पित किया। 11 मार्च 2021 को दादी गुलज़ार के दिवंगत होने के पश्चात वे ब्रह्माकुमारी संस्थान की शीर्ष जिम्मेदारी पर आसीन हुईं।

Who Was Dadi Ratan Mohini

Ratan Mohini Childhood name was Lakshmi: रतन मोहिनी का बचपन का नाम था लक्ष्‍मी

www.brahmakumaris.com के अनुसार दादी रतन मोहिनी का जन्म 25 मार्च 1925 को हैदराबाद (सिंध, अब पाकिस्तान में) में एक धार्मिक और प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। बचपन का नाम लक्ष्मी था। वे पढ़ाई में होशियार थीं और बचपन से ही पूजा-पाठ तथा आध्यात्मिक गतिविधियों में रुचि रखती थीं।

Who Was Dadi Ratan Mohini

उनकी उम्र मात्र 13 वर्ष थी जब उनका परिचय ओम् मंडली (ब्रह्माकुमारीज़ का प्रारंभिक नाम) से हुआ। एक सत्संग में जब उन्होंने ब्रह्मा बाबा के मुख से "ॐ" की ध्वनि सुनी, तो उन्हें गहन आंतरिक शांति का अनुभव हुआ। यहीं से उनके आध्यात्मिक जीवन की यात्रा प्रारंभ हुई। दादीजी हैदराबाद से कराची चली गईं और बाबा के मार्गदर्शन में रहने लगीं।

Who Was Dadi Ratan Mohini

ईश्वर से निकट संबंध की अनुभूति

दादी रतन मोहिनी ने बताया था "ॐ" की ध्वनि सुनने के बाद उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो ब्रह्मा बाबा के माध्यम से स्वयं परमात्मा ज्ञान दे रहे हों। हालांकि प्रारंभ में उनके परिवार ने इस रास्ते पर चलने की अनुमति नहीं दी, लेकिन बाद में उन्होंने अपना समर्थन दिया। इसके पश्चात लक्ष्मी ने अपना नाम बदलकर रतन मोहिनी रखा और ओम मंडली के आध्यात्मिक जीवन को पूर्ण रूप से अपना लिया।

Who Was Dadi Ratan Mohini

सेवा का जीवन और संगठन में योगदान

दादी रतन मोहिनी न केवल एक गहन साधिका रहीं, बल्कि उन्होंने ब्रह्माकुमारी संस्थान के विविध प्रशासनिक और संगठनात्मक कार्यों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे निम्नलिखित पदों पर कार्यरत रहीं।

  • राजयोग शिक्षा एवं अनुसंधान फाउंडेशन की युवा शाखा की अध्यक्ष
  • बीके मुख्यालय (माउंट आबू) के कार्मिक विभाग की निदेशक
  • राजस्थान ज़ोन की जोनल प्रमुख
    Who Was Dadi Ratan Mohini

भारत में शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम की निदेशक

दादी रतन मोहिनी ने सादगी, स्थिरता और आध्यात्मिक अनुशासन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिससे आज भी लाखों लोग प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं। अपने नेतृत्व काल में उन्होंने युवाओं, महिलाओं और शिक्षकों के बीच आत्म-जागृति और मूल्यों पर आधारित जीवन की भावना को प्रबल किया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक साधारण बालिका, जिसे ईश्वर के मार्ग की जानकारी तक नहीं थी। ब्रह्म ज्ञान, सेवा और योग के माध्यम से संस्था की सर्वोच्च शिखर तक पहुँच सकती है।

क्‍या है प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय?

राजस्थान के अरावली पर्वत श्रृंखला की ऊँचाई पर स्थित माउंट आबू, न केवल एक प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल है, बल्कि आत्मचिंतन और शांति का केंद्र भी है। वर्ष 1950 में ब्रह्माकुमारीज़ संगठन का स्थानांतरण कराची (पाकिस्तान) से यहीं हुआ। प्रारंभ में कुछ वर्षों तक किराए के भवनों में कार्य चलता रहा, लेकिन शीघ्र ही संगठन ने माउंट आबू में स्थायी निवास बना लिया। यहीं 'प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय' की स्थापना हुई, जिसे आज मधुबन के नाम से जाना जाता है।

आरंभ की कहानी - ओम् मण्डली से ब्रह्माकुमारीज़ तक

ब्रह्माकुमारीज़ की स्थापना वर्ष 1937 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत के हैदराबाद शहर में दादा लेखराज कृपलानी द्वारा की गई। आध्यात्मिक अनुभूतियों की एक श्रृंखला के बाद उन्हें राजयोग ध्यान और आत्मिक ज्ञान पर आधारित एक विद्यालय की स्थापना की प्रेरणा मिली। प्रारंभिक संस्था को ओम् मण्डली नाम दिया गया, जिसमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे सम्मिलित थे। उन्होंने मिलकर एक आध्यात्मिक परिवार के रूप में जीवन जीना प्रारंभ किया। 1940 के आसपास यह समूह कराची स्थानांतरित हुआ।

भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद, वर्ष 1950 में संस्था ने भारत आकर माउंट आबू में अपने नए केंद्र की स्थापना की। तब तक इस संगठन के सदस्य लगभग 400 हो चुके थे, जो आत्म-अनुशासन, राजयोग और आध्यात्मिक ज्ञान के अभ्यास में संलग्न थे।

संस्थापक ब्रह्मा बाबा (दादा लेखराज कृपलानी) कौन थे?

दादा लेखराज कृपलानी का जन्म वर्ष 1880 में एक साधारण परिवार में हुआ था। प्रारंभिक जीवन में उन्होंने हीरे-जवाहरात का व्यवसाय शुरू किया और उसमें ख्याति प्राप्त की। वे एक सफल व्यवसायी, समाजसेवी और परिवार प्रमुख थे।

लेकिन जीवन के एक मोड़ पर, 1936 में, उन्हें गहरे आध्यात्मिक अनुभव होने लगे। उन्होंने अनुभव किया कि उनका जीवन अब एक नई दिशा चाहता है। उन्होंने अपना व्यवसाय छोड़ दिया और अपने समय, धन और ऊर्जा को आध्यात्मिक सेवा में लगा दिया। यही से ब्रह्माकुमारीज़ की नींव पड़ी।

1937-38 के बीच उन्होंने 8 युवा बहनों की एक संचालन समिति बनाई और अपनी पूरी संपत्ति एक सार्वजनिक ट्रस्ट को समर्पित कर दी। उन्होंने महिलाओं को नेतृत्व में आगे रखा, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था।

ब्रह्मा बाबा की विरासत

ब्रह्मा बाबा ने 18 जनवरी 1969 को अपनी भौतिक देह का त्याग किया। आज भी, माउंट आबू स्थित शांति स्तम्भ उनके जीवन और कार्यों की स्मृति को जीवित रखे हुए है। उनकी दी हुई शिक्षाएं - आत्मा और परमात्मा का ज्ञान, राजयोग ध्यान, और जीवन के नैतिक मूल्य - आज भी लाखों लोगों को प्रेरित कर रही हैं। जिन युवा बहनों को उन्होंने जिम्मेदारी सौंपी थी, वे आज भी सेवा कार्यों में सक्रिय हैं, और आध्यात्मिक ज्ञान व शांति का प्रकाश फैला रही हैं।

ब्रह्माकुमारीज़ की आज की भूमिका

आज ब्रह्माकुमारीज़ एक अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था बन चुकी है, जिसके विश्वभर में हजारों सेवा केंद्र हैं। यह संस्था जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के भेदभाव से परे, आत्मिक जागरूकता और विश्व शांति के संदेश को फैलाने में लगी हुई है।

यह भी पढ़ें- Dadi Ratan Mohini Passed Away: ब्रह्माकुमारीज संस्थान की प्रमुख दादी रतन मोहिनी का 101 वर्ष की उम्र में निधन

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