क्या राजस्थान में कुछ बड़ा होने वाला है? भजनलाल-वसुंधरा ने PM मोदी से की मुलाकात, जानें सियासी मायने
Vasundhara Raje PM Modi meeting: राजस्थान की राजनीति का असली रंग अक्सर दिल्ली में तय होता है। इस बार भी कुछ वैसा ही होता दिख रहा है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अलग-अलग मुलाकातों ने संकेत दे दिया है कि भारतीय जनता पार्टी राजस्थान में सिर्फ शासन नहीं, संगठन और संतुलन की नई बिसात बिछाने जा रही है।
राजनीति में मुलाकातें अक्सर प्रतीकों से ज्यादा संदेश होती हैं। जब एक ही राज्य के दो बड़े नेता दिल्ली दरबार में हाजिरी लगाते हैं, तो सवाल सिर्फ प्रोटोकॉल का नहीं, शक्ति संतुलन और राजनीतिक नए समीकरणों का भी होता है। खासकर तब, जब एक ओर जाट समुदाय की नाराजगी और दूसरी ओर उपराष्ट्रपति पद खाली हो चुका हो।

मुख्यमंत्री की 'प्रोग्रेस रिपोर्ट' और हादसे पर चर्चा
राजस्थान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की पीएम मोदी से 45 मिनट लंबी मुलाकात को यदि केवल विकास योजनाओं की प्रस्तुति माना जाए, तो वह अधूरा विश्लेषण होगा। हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री की यह पेशकश उस वक्त आई है, जब राज्य में हालिया हादसों को लेकर सरकार की साख पर सवाल उठ रहे हैं। झालावाड़ के पिपलोदी गांव में स्कूल की छत गिरने की त्रासदी न सिर्फ भावनात्मक मुद्दा है, बल्कि एक संवेदनशील राजनीतिक क्षेत्र वसुंधरा राजे का गढ़ झालावाड़ से भी जुड़ा है। इस हादसे पर प्रधानमंत्री की संवेदना के साथ-साथ मुख्यमंत्री से सीधे प्रतिक्रिया लेना बताता है कि दिल्ली, राजस्थान की जमीनी स्थिति पर बारीकी से नज़र रखे हुए है।
राजे की मुलाकात: 'नाराज़ समर्थकों' को संदेश या शक्ति प्रदर्शन?
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पीएम मोदी से मुलाकात को लेकर राजनीतिक गलियारों में जो सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है। वह यह कि क्या यह एक 'कमबैक सिग्नल' है? पार्टी में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि उनके समर्थकों को सरकार और संगठन में वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा।
मीडिया की खबरों के अनुसार राजे ने संसद भवन में पीएम मोदी से मुलाकात की और फिर उसके बाद गृह मंत्री अमित शाह से भी मिलीं। राजे खामोश तो रहीं, लेकिन उनके करीबी लगातार दिल्ली से लेकर जयपुर तक अपनी जगह मांगते रहे। अब जब खुद राजे ने दिल्ली पहुंचकर प्रधानमंत्री से समय लिया, तो ऐसा संकेत है कि वह अब संगठन या सत्ता में अधिक सक्रिय भूमिका की इच्छुक हैं।
जगदीप धनखड़ का इस्तीफा: सत्ता और समाज के बीच खाली जगह
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे ने केवल एक संवैधानिक पद को नहीं छोड़ा, बल्कि जाट समाज में प्रतिनिधित्व का एक बड़ा सवाल भी उठाया है। बीजेपी की नजर में यह महज एक रिक्ति नहीं, बल्कि एक अवसर भी है। जाटों को फिर से अपने साथ जोड़ने का।
पार्टी नेतृत्व अच्छी तरह जानता है कि इस समाज की राजनीतिक चेतना और सामूहिक वोटिंग पैटर्न को साधना आसान नहीं। वसुंधरा राजे का इस वर्ग में प्रभाव आज भी गिना जाता है। ऐसे में माना जा रहा है कि पीएम मोदी ने जाट प्रतिनिधित्व के भविष्य पर वसुंधरा और भजनलाल दोनों से चर्चा की है।
ओम माथुर बनाम वसुंधरा: बीजेपी की अंदरूनी पहेली
मीडिया की खबरों में संभावना जताई जा रही है कि उपराष्ट्रपति पद के लिए ओम माथुर का नाम चर्चा में है, लेकिन यह वही नाम है जिनसे वसुंधरा राजे की राजनीतिक पटरी कभी नहीं बैठी। यदि दिल्ली इस नाम पर आगे बढ़ती है, तो पार्टी को न सिर्फ बाहर की समीकरण देखने होंगे, बल्कि अंदर के मनोबल और संतुलन को भी साधना होगा। कयासों के अनुसार वसुंधरा को दरकिनार करना आसान नहीं, खासकर तब जब पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे पदों पर नए चेहरे तलाश रही हो और राजे का नाम भी उन्हीं विकल्पों में गिना जा रहा हो।
राजस्थान में कैबिनेट और संगठन का फेरबदल
सियासी सूत्रों की मानें तो इन हाई-प्रोफाइल मुलाकातों के बाद राजस्थान सरकार के मंत्रिमंडल में बदलाव की तैयारियां तेज हो गई हैं। जिन चेहरों की लंबे समय से अनदेखी हुई, उन्हें सरकार या बोर्ड-निगमों में समायोजित किया जा सकता है। खासतौर पर वसुंधरा गुट के नेताओं को अब संतुष्ट करना पार्टी के लिए रणनीतिक जरूरत बन गया है। संगठन स्तर पर भी बदलाव की सुगबुगाहट है। पार्टी की कोशिश रहेगी कि हर गुट को एक 'सम्मानजनक' हिस्सेदारी दी जाए, जिससे न तो असंतोष बढ़े, और न ही ज़मीन पर काम रुकने पाए।












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