छत्तीसगढ़ में जारी है आरक्षण पर रण, जनता को लाभ देने सुप्रीम कोर्ट जाएगी भूपेश सरकार
छत्तीसगढ़ में एक बार फिर आरक्षण के मामले पर सियासी माहौल गरमाया हुआ है। आरक्षण मामले मेंछत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ा बयान दिया है। बघेल ने बुधवार को कहा कि 12 साल पहले बीजेपी ने बिना तैयारी
रायपुर , 21 सितंबर। छत्तीसगढ़ में एक बार फिर आरक्षण के मामले पर सियासी माहौल गरमाया हुआ है। आरक्षण मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ा बयान दिया है। बघेल ने बुधवार को कहा कि 12 साल पहले बीजेपी ने बिना तैयारी किए आरक्षण बढ़ाया था। इसका औचित्य अदालत के समक्ष साबित नहीं कर पाए। जिसका नुकसान लोगों को भुगतना पड़ा है।सीएम भूपेश ने कहा, फैसले का अध्ययन करने के बाद हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।

भाजपा को सीएम भूपेश ने दिया जवाब
सीएम भूपेश बघेल बुधवार को बालोद के दौरे पर थे। शाम को वह रायपुर वापस लौटने के बाद कहा कि भाजपा सरकार ने बिना तैयारी के आरक्षण 58 प्रतिशत कर दिया। जोकि अदालत में लंबित था, अब अदालत का फैसला आया है कि उस आधार पर उसे रिवर्ट कर दिया है । यह बात वाकई सही है कि इससे जनता का नुकसान है। छत्तीसगढ़ की जनसंख्या के आधार पर उन्हें रिज़र्वेशन नहीं दिया गया है। लेकिन बीजेपी ने बिना तैयारी उसको लागू कर दिया था, जिसका नुकसान जनता को भुगतना पड़ा है। हम इसका अध्ययन करके फिर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।
आरक्षण मामले में बचाव के लिए कोर्ट में कोई बड़ा अधिवक्ता नहीं खड़ा करने के बीजेपी के आरोपों पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा, भारतीय जनता पार्टी अपने वक़्त का भी निकाल कर देख ले। इस मामले में कब और कितने वकील उन्होंने खड़े किए थे, वह बताएं कि अपनी सरकार में वह खुद खड़े किए हैं या नहीं । वह 15 वर्षों सत्ता में रहे हैं, कितने अधिवक्ता को खड़ा किए हैं बता दें।

भाजपा के हैं यह आरोप
बीजेपी अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष विकास मरकाम ने भूपेश बघेल सरकार पर आदिवासी विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा है कि भूपेश बघेल का शासनकाल जनजाति समाज के लिए काला अध्याय है। छ ग लोकसेवा आरक्षण संशोधन अधिनियम 2012 को उच्च न्यायालय द्वारा अपास्त किए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा है कि बीते 4 वर्षों में भूपेश बघेल सरकार द्वारा उच्च न्यायालय में गलत तथ्य प्रस्तुत करने के कारण जनजाति समाज के 32% आरक्षण पर कुठाराघात हुआ है।
उन्होंने कांग्रेस सरकार पर उच्च न्यायालय में जनजाति समाज का पक्ष ठीक से नहीं रखने का आरोप लगाते हुए कहा है कि कर्नाटक की रत्नप्रभा कमेटी के तर्ज पर पदोन्नति में आरक्षण का औचित्य साबित करने वाली गठित पिंगुआ कमेटी की रिपोर्ट को बेवजह हाईकोर्ट में पेश किया गया। इस कमेटी ने जनजाति समाज के बढ़े हुए आरक्षण का बचाव करने की जगह अन्य पिछड़ा वर्ग के संदर्भ को शामिल कर उच्च न्यायालय में गलत तथ्य प्रस्तुत किया। कांग्रेस सरकार की इस गलती का खामियाजा अब जनजाति समाज को चुकाना पड़ेगा। लिहाजा उच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब अनुसूचित जनजाति का आरक्षण 32% से घटकर 20% हो सकता है।

कांग्रेस पर अदालत में मजबूती से पक्ष ना रखने का आरोप
भाजपा नेता ने बयान जारी करके कहा था कि पूर्व सीएम डॉ रमन सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने 2012 में जनजाति समाज को प्रदेश में उनकी जनसंख्या के अनुपात में 32% आरक्षण देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था और 2018 में सरकार रहते तक उक्त आरक्षण प्रदान किया। उच्च न्यायालय में याचिका दायर होने के बाद भाजपा सरकार द्वारा 2018 तक जनजाति समाज के हित में मजबूती के साथ लगातार अपना पक्ष रखते रहे हैं, जिसके कारण आरक्षण यथावत रहा परंतु कांग्रेस की सरकार आने के बाद से जनजाति समाज का पक्ष मजबूती के साथ नहीं रखा गया। भूपेश सरकार की विफलता का ही परिणाम है कि माननीय उच्च न्यायालय में जनजाति समाज के खिलाफ ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय सामने आया।

सोमवार को आया था अदालत का फैसला
गौरतलब है कि एक दिन पहले ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने अहम फैसले में राज्य के इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में 58 प्रतिशत आरक्षण को असंवैधानिक ठहराया है। चीफ जस्टिस अरूप कुमार गोस्वामी और जस्टिस पीपी साहू की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को मंजूर करते हुए कहा कि किसी भी स्थिति में आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। हाईकोर्ट में छत्तीसगढ़ शासन के वर्ष 2012 में बनाए गए आरक्षण नियम को चुनौती देते हुए 21 अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थी, जिस पर अदालत ने लगभग दो माह पूर्व फैसला सुरक्षित रखा था, लेकिन सोमवार को फैसला आया है।

यह हुआ था
छत्तीसगढ़ शासन ने साल 2012 में आरक्षण नियमों में बदलाव करते हुए अनुसूचित जाति वर्ग का आरक्षण 4 प्रतिशत घटाते हुए 16 से 12 % कर दिया था। वहीं, अनुसूचित जनजाति का आरक्षण बढ़ाते हुए 20 से 32 प्रतिशत कर दिया था । इसके अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को 14 प्रतिशत रखा था। अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग के आरक्षण प्रतिशत में 12 % की बढ़ोतरी और अनुसूचित जाति वर्ग के आरक्षण में चार फीसदी की कटौती को लेकर उच्च न्यायलय में जनहित याचिका लगाई गई थी।
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