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Punjab Election: भगत सिंह आज तक पंजाब में क्यों नहीं बने चुनावी मुद्दा ?

चंडीगढ़, 10 जनवरी। जिसने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हुसैनीवाला यात्रा रोकी उसने अंजाने में इतिहास के बंद पन्नों को पलट दिया। भारत माता के वीर सपूत सरदार भगत सिंह की जो स्मृतियां मंद पड़ गयी थीं वो एकबारगी से ताजा हो गयीं। सिर्फ 23 साल की उम्र में देश के लिए जान कुर्बान करने वाले भगत सिंह को आजाद भारत में वो सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पश्चिम बंगाल में चुनावी मुद्दा बन सकते हैं। लेकिन भगत सिंह कभी पंजाब में चुनावी मुद्दा नहीं बने।

Why not Bhagat Singh become an issue in punjab election 2022

हैरानी की बात ये है कि जिस भगत सिंह को हम शहीदेआजम कहते हैं उसे सरकार शहीद ही नहीं मानती। अगर देश के लिए किसान बहुत अहम हैं तो भगत सिंह उनसे भी ज्यादा अहम हैं। वह इसलिए क्योंकि अगर भगत सिंह जैसे जांबाजों ने क्रांति का बिगुल नहीं फूंका होता तो हम सभी लोग (किसान भी) खुली हवा में सांस नहीं ले रहे होते। आंदोलन और विरोध की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। अब सवाल ये है कि पंजाब में कोई दल क्यों नहीं यह वायदा करता कि अगर वह सत्ता में आया तो भगत सिंह को कानूनी रूप से शहीद घोषित करेगा ? किसान मुद्दा बन सकते हैं तो भगत सिंह क्यों नहीं ?

सरकार भगत सिंह को नहीं मानती शहीद

सरकार भगत सिंह को नहीं मानती शहीद

कांग्रेस ने भगत सिंह की तो अनदेखी की ही, समाजवादी और भाजपा की सरकार ने भी उनकी कुर्बानी को भुला दिया। अगर उन्हें शहीद की मान्यता देने में कोई नियम या कानून आड़े आ रहा है तो क्यों नहीं उसे कैबिनेट की मंजूरी से खत्म कर दिया जा रहा ? इतने संविधान संशोधन हुए, एक भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के लिए कर लिया गया होता तो क्या बिगड़ जाता ? 2018 में पंजाब सरकार ने एक प्रश्न के जबाव में संविधान की धारा 18 का जिक्र करते कहा था, एबोलिशन ऑफ टाइटल्स नियम के तहत भगत सिंह को औपचारिक रूप से शहीद नहीं कहा जा सकता। राज्य सरकार के पास भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को शहीद घोषित करने का अधिकार ही नहीं है।

गांधी जी ने भगत सिंह के रास्ते का विरोध किया

गांधी जी ने भगत सिंह के रास्ते का विरोध किया

आजादी के पहले अंग्रेज तो उनके खिलाफ थे ही, महात्मा गांधी ने भी उनका विरोध किया था। आजादी के बाद नेहरू प्रधानमंत्री बने लेकिन उनका रवैया भी अंग्रेजों से अलग नहीं था। अगर उस समय ही भगत सिंह को रिकॉर्ड बुक में शहीद मान लिया जाता तो आज ये नौबत नहीं आती। महात्मा गांधी भले भगत सिंह के रास्ते का विरोध करते रहे लेकिन भारतीय जनमानस में भगत सिंह के प्रति आपार श्रद्धा थी। वे एक लोकप्रिय नायक थे। कांग्रेस के ही नेता पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस' में लिखा है, "गांधी और भगत सिंह समान रूप से लोकप्रिय थे (1928-29 के आसापास का समय)। एक सत्य के अपने प्रयोगों के कारण तो दूसरे अपने साहस और तार्किक लेखों के कारण।" यानी उस समय 21 साल के भगत सिंह 60 साल के गांधी जी के बराबर ही लोकप्रिय थे। इससे साबित होता है कि आजादी के दीवाने भगत सिंह का तब जनता में कितना सम्मान था। लेकिन गांधी जी और नेहरू जी उस समय कांग्रेस की हर सभा में हमेशा यही कहते रहे कि नौजवानों को भगत सिंह के रास्ते पर नहीं चलना है।

भगत सिंह के परिवार की जासूसी करायी कांग्रेस ने

भगत सिंह के परिवार की जासूसी करायी कांग्रेस ने

कहा जाता है कि आजादी के बाद भी नेहरू क्रांतिकारियों की लोकप्रियता से घबराते थे। नेहरू सोचते थे कि अगर भगत सिंह की लोकप्रियता बनी रही तो उनके समर्थकों की ताकत बढ़ सकती है। वे कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकते हैं। सत्ता जा भी सकती है। उस समय ये अफवाह बहुत तेज थी कि सुभाष चंद्र बोस हवाई हादसे में मरे नहीं हैं बल्कि वेश बदल कर कहीं छिपे हुए हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को ये डर सताता था कि अगर सुभाष चंद्र बोस कहीं प्रगट हो गये तो उनकी सत्ता खत्म हो जाएगी। कहा जाता है तब उनके इशारे इंटेलीजेंस ब्यूरो के जासूस नेताजी के परिवार के सदस्यों की जासूसी करते रहे थे। इसी तरह आजादी के बाद भगत सिंह के परिवार की भी कांग्रेस सरकार ने जासूसी करायी थी। ये आरोप भगत सिंह के पोता (छोटे भाई के पुत्र) अभय सिंह संधु ने लगाये थे। भगत सिंह के छोटे भाई कुलबीर सिंह को कांग्रेस ने अपनी पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया था। इसके बाद कांग्रेस सरकार ने उनकी जासूसी करानी शुरू कर दी।

भगत सिंह के एक भाई जनसंघ से बने थे विधायक

भगत सिंह के एक भाई जनसंघ से बने थे विधायक

आम तौर पर भगत सिंह को समाजवादी-साम्यवादी विचारधारा के नजदीक माना जाता है। उन्होंने खुद को नास्तिक बताया था। लेकिन आजादी के बाद भारत के साम्यवादी दल ने भी उन पर चुप्पी साध ली। भगत सिंह पांच भाई और तीन बहन थे। कांग्रेस और साम्यवादी दल के रवैये से क्षुब्ध उनके एक छोटे भाई कुलबीर सिंह जब राजनीति में आये तो उन्होंने जनसंघ का उम्मीदवार बनना पसंद किया। 1962 के पंजाब विधानसभा चुनाव में वे जनसंघ के टिकट पर फिरोजपुर (इसी जिले के हुसैनीवाला में भगत सिंह की समाधि है) से खड़े हुए। उन्होंने कांग्रेस के कुंदन लाल को हरा कर चुनाव जीत लिया। कहा जाता है कि नेहरू को इस बात का अंदेशा था कि कुलबीर सिंह अभी भी क्रांतिकारियों के सम्पर्क में हैं और वे इनके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। तब गृहमंत्रालय ने कुलबीर सिंह की जासूसी करने का आदेश दिया। नेहरू के जमाने से शुरू हुई जासूसी इंदिरा गांधी के शासन में भी जारी रही। अभय सिंह संधु के मुताबिक, 1982 में एक नौजवान रिसर्च स्कॉलर बन कर आया। उसने मेरे पिता (कुलबीर सिंह) से कहा कि वह भगत सिंह और सरदार अजीत सिंह पर शोध करना चाहता है। मेरे पिता जी ने उसे अपने घर में ही रहने के लिए कमरा दे दिया। 1983 में जब मेरे पिताजी का देहांत हो गया तो वह उसी रात अचानक गायब हो गया। अभय संधु के मुताबिक जासूसी का ये सिलसिला 1993 तक चलते रहा। उस समय केन्द्र में नरसिम्हा राव की सरकार थी।

भगत सिंह के एक भाई कांग्रेस के विधायक बने थे

भगत सिंह के एक भाई कांग्रेस के विधायक बने थे

भगत सिंह के एक छोटे भाई कुलतार सिंह तत्कालीन उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में रहते थे।1974 में वे सहारनपुर शहर सीट से कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। 1974 में कांग्रेस को 424 में से 215 सीटें मिलीं थी। जब नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में सरकार बनी तो कुलतार सिंह को राज्यमंत्री बनाया गया था। कांग्रेस की सेवा करने के बाद भी कुलतार सिंह अपने भाई भगत सिंह को शहीद का दर्जा नहीं दिला पाये थे। कांग्रेस ही क्यों, कोई अन्य दल भी भगत सिंह को सम्मान दिलाने के लिए आगे नहीं आया। भगत सिंह के प्रपौत्र यादवेन्द्र सिंह संधु ने 2019 में कहा था, दिल्ली यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में 'भारत का स्वतंत्रता संघर्ष' नामक एक पुस्तक पढ़ायी जाती है। इस किताब में भगत सिंह के बारे में जगह-जगह 'क्रांतिकारी आतंकवादी" लिखा गया है। 2019 में जब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने भगत सिंह को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए केन्द्र सरकार को पत्र लिखने का फैसला किया तो राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। सिख विद्वानों ने सवाल खड़ा कर दिया कि क्या भगत सिंह पूर्ण मर्यादा वाले सिख थे ? कई लोग कहने लगे कि भगत सिंह सिख मर्यादा के मुताबिक सिखों के रोल मॉडल नहीं थे। यानी भगत सिंह की कुर्बानियों को सियासत के जाल में उलझा दिया गया। अगर नरेन्द्र मोदी सच में भगत सिंह को नमन करने के लिए हुसैनीवाला जा रहे थे तो क्यों नहीं वे उन्हें शहीद का दर्जा दिलाने के लिए पहल कर रहे ?

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