गुरदासपुर में आसान नहीं है सनी देओल की राह, जानें क्या है चुनावी समीकरण
Gurdaspur news, गुरदासपुर। सिनेमा में देश भक्ति का जज्बा और साफ छवि भले ही पंजाब के गुरदासपुर के लिए के लिए भाजपा टिकट के सनी देओल कविता खन्ना और स्वर्ण सलारिया की दावेदारी पर भारी पड़े हों, लेकिन सनी देओल के लिए गुरदासपुर जैसे सरहदी इलाके में चुनाव फतेह करना उतना आसान नहीं है, जितना समझा जा रहा है। कम समय में पार्टी के सभी गुटों को साथ लेकर आम मतदाता तक पहुंचना आसान नहीं है। गुरदासपुर एक ओर पाकिस्तान से सटा है तो दूसरी ओर जम्मू का इलाका। पंजाब में इस बार राजनैतिक हालात 2014 के विपरीत हैं। भाजपा के सहयोगी दल शिरोमणी अकाली दल को लोगों का कोई समर्थन नहीं मिल पा रहा है। वहीं, कठुआ रेप केस के बाद इस इलाके में भाजपा के खिलाफ माहौल साफ देखा जा रहा है। पंजाब भाजपा नेतृत्व के संकट से जूझ रही है। रही सही कसर विजय सांपला के टिकट के कट जाने से पूरी हो गई है।

अपने दम पर लड़नी होगी लड़ाई
गुरदासपुर में कविता खन्ना और स्वर्ण सलारिया के बीच टिकट की लड़ाई चल रही थी, यदि दोनों में किसी एक को टिकट मिलता तो पार्टी में फूट पड़ सकती थी। इसी सोच के चलते हाई कमान ने सनी को मैदान में उतार कर इस धड़ेबंदी को खत्म करने का प्रयास किया है। लेकिन सनी देओल को गुरदासपुर में लड़ाई अपने ही बूते लड़नी होगी। हालांकि, उनके परिवार का राजनीतिक इतिहास यह बताता है कि परिवार के सदस्यों ने जहां-जहां से चुनाव लड़ा, जनता ने उनको सिर-माथे पर बैठाया। फिर चाहें 2004 में बीकानेर से चुनाव जीतने वाले धर्मेन्द्र हों या मथुरा से 2014 में चुनाव जीतने वाली हेमा मालिनी, लेकिन सनी देओल के लिए गुरदासपुर किसी चुनौती से कम नहीं है।

चुनाव प्रचार के लिए 26 दिनों का समय
सबसे बड़ी मुश्किल उनके टिकट की आखिरी समय में घोषणा होने की वजह से पैदा हुई है। यहां 19 मई को मतदान है। लिहाजा उन्हें अपना चुनाव क्षेत्र 26 दिनों में पूरा करना होगा। इतने कम समय में गुरदासपुर जैसे बड़े क्षेत्र प्रचार करना आसान नहीं है। वहीं, भाजपा का यहां विनोद खन्ना के निधन के बाद प्रभाव लगातार घटता जा रहा है। 2017 में हुए उपचुनाव के दौरान भाजपा के स्वर्ण सलारिया 1,93,219 मतों के बड़े अंतर से हारे थे। इतने बड़े अंतर को पाटना सनी के लिए बड़ी चुनौती है।

क्या है चुनावी इतिहास
2017 के उपचुनाव में इस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार सुनील जाखड़ विजेता रहे थे, लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान पिछली बार भी गुरदासपुर के मतदाताओं ने यह सीट भाजपा की झोली डाली थी और फिल्मी स्टार विनोद खन्ना इस सीट से विजेता रहे थे। विनोद खन्ना को इस सीट पर 4,82,255 वोट मिले थे और उनके मुकाबले उस समय कांग्रेस के कद्दावर उम्मीदवार प्रताप सिंह बाजवा थे। बाजवा इस सीट पर 2009 का चुनाव भी जीत चुके थे और मतदान दौरान जाखड़ की तरह पंजाब कांग्रेस के प्रधान थे, लेकिन इसके बावजूद बाजवा 3,46,190 वोट हासिल कर 1,36,065 वोट के बड़े अंतर से हार गए थे।

सनी देओल के लिए नया है क्षेत्र
सिने जगत में सफलता के झंडे गाड़ने वाले सनी देओल के लिए सियासत नई है, खासतौर पर गुरदासपुर हलका उनके लिए बिल्कुल नया है। उनका स्थानीय स्तर पर पार्टी वर्करों और नेताओं के साथ पहले से कोई संपर्क नहीं रहा है। उनके लिए भाजपा के साथ-साथ अकाली दल के वर्करों से तालमेल बैठाना भी बड़ी चुनौती होगी। हालांकि, यह क्षेत्र लम्बे समय से बाहरी उम्मीदवार को संसद में भेजता रहा है और फिल्मी सितारों के प्रति इस हलके का आकर्षण ज्यादा है, लेकिन उनके मुकाबले कांग्रेस के सुनील जाखड़ न सिर्फ इस सीट के मौजूदा सांसद हैं, बल्कि मंझे हुए राजनीतिज्ञ भी हैं। इस लिहाज से जाखड़ को चुनौती देना आसान नहीं होगा।

भाजपा के बड़े नेता सनी के लिए प्रचार करने आ सकते हैं
गुरदासपुर सीट अधीन आने वाली चार विधानसभा सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ती है, जबकि 5 सीटों पर शिरोमणी अकाली दल चुनाव लड़ता है। शिरोमणी अकाली दल से नाराज होकर टकसालियों के साथ सेवा सिंह सेखवां भी इसी हलके से संबंध रखते हैं और उनकी नाराजगी का नुक्सान भी सनी को हो सकता है। बहरहाल, सनी के मैदान में आने के बाद भाजपा की केंद्रीय नेतृत्व भी इस सीट पर गंभीरता के साथ जोर लगाएगी और भाजपा के बड़े नेता इस सीट पर सनी के लिए प्रचार करने आ सकते हैं। गुरदासपुर की यह सीट पाकिस्तान के सीमा साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के साथ लगती है। भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक का इस इलाके के मतदाताओं पर कितना प्रभाव रहा है, यह तो मतदान के बाद ही पता चलेगा। वहीं, सनी के प्रचार में कविता खन्ना और स्वर्ण सलारिया शामिल होते हैं कि नहीं यह भी देखने वाली बात होगी।
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