पंजाब की वो 34 सीटें जो अनुसूचित जातियों के लिए है रिज़र्व, जानिए चुनावी रण में डी-फ़ैक्टर का प्रभाव
पंजाब विधानसभा चुनाव के सियासी रण में उतरने के लिए सभी सियासी पार्टियां कमर कस चुकी हैं। सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए रणनीति तैयार कर मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश कर रही हैं। ग़ौरतलब है कि पंजाब की सियासत में सत्ता..
चंडीगढ़, 30 दिसंबर, 2021। पंजाब विधानसभा चुनाव के सियासी रण में उतरने के लिए सभी सियासी पार्टियां कमर कस चुकी हैं। सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए रणनीति तैयार कर मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश कर रही हैं। ग़ौरतलब है कि पंजाब की सियासत में सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए दलित समुदाय अहम किरदार निभाता है। हिंदुस्तान में दूसरे राज्यों के मुक़ाबले में पंजाब में सबसे ज़्यादा दलित आबादी रहती है। पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में करीब 50 विधानसभा सीटों पर दलितों का वोट मायने रखता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में दलितों की 39 उपजातियां हैं। आकंड़ों की बात की जाए तो दलितों में मजहबी सिख 30 फ़ीसद, रविदासिया 24 फ़ीसद, अधधर्मी 11 फ़ीसद और वाल्मिकी 10 फ़ीसद है।

23 विधानसभा सीटों सचखंड बलान की पकड़
जालंधर के डेरा सचखंड बलान (बल्लन गांव) का दोआबा में काफ़ी अच्छी पकड़ है। पंजाब के 23 विधानसभा सीटों पर सचखंड बलान विनिंग फ़ैक्टर माना जाता है। वहीं रविदासिया समुदाय का वोट हर निर्वाचन क्षेत्र में 20 से 50 फ़ीसद तक है। ग़ौरतलब है कि दोआबा में 37 फीसदी, मालवा में 31 फीसदी और माझा में 29 फीसदी दलित आबादी है। पंजाब कांग्रेस ने इसलिए ही मास्टरस्ट्रोक खेलते हुए चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया ताकि चुनाव के समय कांग्रेस को दलित समुदाय का समर्थन मिल सके। आपको बता दें कि सीएम चरणजीत चन्नी मालवा के रहने वाले हैं और रविदासिया उपजाति से ताल्लुक रखते हैं। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी भी ऐलान कर चुकी है कि वह पंजाब में सत्ता में आई तो दलित को मुख्यमंत्री बनाएगी। पंजाब के नेता विपक्ष हरपाल सिंह चीमा भी एक दलित नेता हैं।

दलित समुदाय का अहम योगदान
पंजाब की सियासत में सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए दलित समुदाय का अहम योगदान रहता है। पंजाब में 34 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए रिजर्व हैं, इन सीटों में जालंधर वेस्ट, अमृतसर वेस्ट, भठिंडा ग्रामीण, अटारी और करतारपुर शामिल हैं। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जाति की सबसे ज्यादा 21 सीटें जीती थीं। आम आदमी पार्टी ने 9, शिरोमणि अकाली दल ने 3 और भारतीय जनता पार्टी ने 1 सीट जीती थी। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक पार्टिया दलित समुदाय को साधने की कोशिश में लगी हुई है। कृषि कानूनों की वापसी के बाद अब भारतीय जनता पार्टी इसका सियासी माईलेज लेने की कोशिश कर रही है। साथ ही पंजाब में खुद को दलित हितैषी साबित करने में जुटी हुई है।

अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व सीटें
पंजाब में अनुसूचित जाति की सीटें में पठानकोट की भोआ, गुरदासपुर की दीनानगर और हरगोबिंदपुर, अमृतसर की जंडियाला गुरु, अमृतसर वेस्ट, अटारी, बाबा बकाला, कपूरथला की फगवाड़ा, जालंधर की फिल्लौर, करतारपुर, जालंधर वेस्ट, आदमपुर, होशियारपुर की शाम चौरासी और छब्बेवाल, शहीद भगत सिंह नगर की बंगा, फतेहगढ़ साहिब की बस्सी पठान, रूप नगर की चमकौर साहिब, मोगा की निहाल सिंह वाला, लुधियाना की गिल, पायल, जगरांव और रायकोट, फजिल्का की बल्लुआना, श्री मुख्तसर साहिब की मलौत, भठिंडा की भुचो मंडी और भठिंडा ग्रामीण, मनसा की बुधलाडा, संगरूर की दिरबा, बरनाला की भादौर और मेहल कलान, पटियाला की नाभा और सुतराना इसके साथ ही फिरोजपुर सीट शामिल है।
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