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चुनावी सौगात की चक्कर में क़र्ज़दार हो रही पंजाब सरकार, कार्यकाल खत्म होने तक लाखों करोड़ का हो सकता है क़र्ज़

पंजाब सरकार अगले साल मार्च में अपने कार्यकाल ख़त्म होने तक 2.82 लाख रुपये तक के क़र्ज़ में मुबतला हो सकती है।

चंडीगढ़, 22 नवम्बर 2021। पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सीएम चन्नी ने कई घोषणाएं की हैं औऱ उस अमलीजामा पहनाने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पंजाब सरकार अगले साल मार्च में अपने कार्यकाल ख़त्म होने तक 2.82 लाख रुपये तक के क़र्ज़ में मुबतला हो सकती है। कांग्रेस ने जब मार्च 2017 में पंजाब की सत्ता संभाली तो पिछली शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार से विरासत में 1.82 लाख करोड़ रुपये बकाया क़र्ज़ मिला था। पंजाब सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़ के बोझ का अनुमान लगाया है साथ ही पिछले 1.82 लाख रुपये का क़र्ज़ मिला कर 2.82 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा।

बढ़ रहा क़र्ज़ का बोझ

बढ़ रहा क़र्ज़ का बोझ

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक साल 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए लोकलुभावन घोषणाएं और नकद वितरण से ज़ाहिर तौर पर पंजाब के क़र्ज का बोझ 2.82 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बढ़ सकता है। आपको बता दें कि पंजाब सरकार की कमाई और उधारी का बड़ा हिस्सा अपने कर्ज की अदायगी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सीएम चन्नी ने हाल ही में कहा था कि घोषणाओं को पूरा करने के लिए पंजाब सरकार के पास पूरे रुपये नहीं हैं। वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल के मुताबिक इस वित्तीय वर्ष के बजट में कुल राजस्व प्राप्ति 95,257 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। लेकिन कांग्रेस सरकार के पिछले चार साल के रिकॉर्ड से पता चलता है कि उसने अपने राजस्व लक्ष्य का 81 फ़ीसद से ज्यादा कभी हासिल नहीं किया है।

र्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का दावा

र्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का दावा

वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने पंजाब की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का दावा किया है, लेकिन सरकार के वित्तीय विवरण कुछ और ही बोलते हैं क्योंकि चालू वित्त वर्ष के लिए राज्य की कुल अनुमानित राजस्व प्राप्तियों का लगभग 40 फीसदी यानी 95,257 करोड़ रुपये कुल ऋण सेवा में जाएगा। लोक लुभावन वादों की राजनीति ने राज्य को इस तरह के मंच पर ला दिया है कि उसकी कमाई और बाजार उधार का एक बड़ा हिस्सा पूंजीगत व्यय की तुलना में कर्ज चुकाने में चला जाता है। शेष राजस्व अनुत्पादक व्यय में चला जाता है जैसे वेतन, पेंशन, बिजली सब्सिडी और ऋण माफी का वितरण आदि।

राजस्व बढ़ाने में सरकार नाकाम

राजस्व बढ़ाने में सरकार नाकाम

पिछली शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार ने 2016-17 में अपने 10 साल के शासन के आखिरी साल में हकीकत में पूंजीगत व्यय पर 54 हजार 280 करोड़ रुपये खर्च किए थे, लेकिन इसके उलट मौजूदा कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी साल 2021-2022 में सिर्फ़ बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बजट में 34,135 करोड़ रुपये रखे है। वहीं, कोविड महामारी ने भी अन्य राज्यों की तरह पंजाब सरकार के खजाने में बड़ी सेंध लगाई है। पंजाब सरकार अपने ख़ुद के राजस्व बढ़ाने के लिए नए रास्ते तलाशने में नाकाम रही है। इसके साथ ही राज्य सरकार ख़ास तौर से अवैध खनन, अवैध शराब व्यापार, और प्रभावशाली राजनेताओं के ऑनरशिप वाली निजी परिवहन कंपनियों को दिए गए समर्थन की वजह से भी सरकारी खज़ाने पर असर पड़ रहा है।

सरकार के लिए चुनौती

सरकार के लिए चुनौती

जीएसटी व्यवस्था 1 जुलाई, 2017 से लागू की गई थी, जिसके तहत केंद्र सरकार ने किसी भी कमी के लिए मुआवजे का वादा करके राज्यों को 2015-16 के वित्तीय आधार पर सालाना 14% की वृद्धि की गारंटी दी थी। चूंकि जीएसटी मुआवजा संवितरण अगर आगे नहीं बढ़ाया गया, तो अगले साल जून में समाप्त हो जाएगा और पंजाब सरकार को निश्चित रूप से इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। इस तरह से लग रहा है कि अपनी घोषणाओं को पूरा करने के लिए पंजाब सरकार के पास आय का स्रोत कम है और किए गए वादे को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। इसलिए जनता से किए गए वादे को पूरा करने में पंजाब सरकार पर आर्थीक बोझ बढ़ेगा।


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