'पंजाब दी गल' : सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए भाजपा तैयार कर रही नई रणनीति, क्या मिलेगी कामयाबी ?
पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए हुये मतदान के बाद अब लोगों को चुनाव परिणाम का इंतज़ार है।
चंडीगढ़, 25 फ़रवरी 2022: पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए हुये मतदान के बाद अब लोगों को चुनाव परिणाम का इंतज़ार है। इसके साथ ही चुनाव के नतीजे से पहले अटकलों का बाज़ार भी गर्म है कई तरह के क़यास लगाए जा रहे हैं। कांग्रेस में गुटबाज़ी को फिर से हावी, चुनाव परिणाम के बाद इसका खामियाज़ा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है। वहीं शिअद-भाजपा गठबंधन होने की चर्चा ज़ोरों पर है। इसके साथ ही भाजपा ने चुनाव से पहले ही निर्दलीय और कांग्रेस के विधायकों को अपने पाले में करने की क़वायद तेज़ कर दी है। पंजाब दी गल में आज हम आपको सियासी गलियारों की इसी तरह की चटपटी ख़बरों से रूबरू करवाने जा रहे हैं।

गुटबाज़ी से हो सकता है कांग्रेस को नुकसान
पंजाब विधानसभा के लिए हुए मतदान का रिज़ल्ट 10 मार्च को घोषित होने वाला है। इससे पहले ही कांग्रेस नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरु हो गया है। इस मामले में सियासी जानकारों का कहना है कि जिस तरह से चुनाव परिणाम के पहले ही कांग्रेस में गुटबाज़ी शुरू हो गई है। चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस को इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है। क्योंकि इस बार हुए मतदान के आधार पर यही क़यास लगाए जा रहे हैं कि किसी भी सियासी दल को बहुमत मिलना मुश्किल है। पंजाब में सत्ता पाने के लिए 59 का साथ चाहिए जिस पार्टी के समर्थन में कम से कम 59 विधायक होंगे सत्ता की चाभी उसके हाथ में होगी। इसलिए सभी सियासी दल जोड़-तोड़ की राजनीति करेंगे। ऐसे में अगर कांग्रेस में गुटबाज़ी हावी रही तो उसके विधायक पाला बदलने से गुरेज़ नहीं करेंगे। गुटबाज़ी की वजह से अगर कांग्रेस के विधायकों ने अपना पाला बदल लिया तो कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। अभी सभी सियासी पार्टियां एक ही बात पर ज़ोर दे रही हैं कि किसी भी तरह से पार्टी के नेता और कार्यकर्ता एकजुट रहें लेकिन कांग्रेस में सियासी घमासन खत्म होता नहीं दिख रहा है।

भाजपा तैयार कर रही है रणनीति
पंजाब चुनाव के मतदान के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी हर मुमकिन कोशिश कर रही है कि वह किसी तरह से पंजाब की सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाए। सूत्रों की मानें तो भाजपा के दिग्गज नेताओं ने और उसके गठबंधन के साथियों ने निर्दलीय प्रत्याशियों और कांग्रेस के उम्मीदवारों से अभी से ही संपर्क साधना शुरू कर दिया है। ताकि वह जीत दर्ज करते ही भाजपा गठबंधन को समर्थन दे दें। चुनावी रणनीतिकार की मानें तो भारतीय जनता पार्टी के लिए दूसरे दलों के प्रत्याशियों को अपने पाले में करना बहुत ही आसान काम है। क्योंकि भाजपा जोड़-तोड़ की राजनीति करते हुए बनी बनाई सियासी समीकरणों को बिगाड़ने में माहिर है। उसके पास कई ऐसे मास्टर माइंड हैं जो कि बहुत ही आसानी से सियासी हवा का रुख मोड़ने की ताक़त रखते हैं।

शिअद-भाजपा महागठबंधन की अटकलें तेज़
पंजाब में हुए मतदान के समीकरणों को देखने के बाद शिअद-भाजपा महागठबंधन की खबरें चर्चा का विषय बनी हुई है। शिअद-भाजपा के गठबंधन की ख़बरों पर शिअद के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया के बयानों के बाद से ही अटकलों का बाज़ार गर्म है। सूत्रों की मानें तो भाजपा के साथ आने के लिए शिरोमणि अकाली दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती कम से कम 40 सीटें लाना है। शिअद गठबंधन अगर 40 सीटों पर क़ब्ज़ा जमाती है तो भाजपा के साथ महागठबंधन का रास्ता खुल सकता है। वहीं भाजपा के साथ पंजाब लोक कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) पहले ही गठबंधन में चुनाव लड़ चुकी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह भाजपा गठबंधन की तरफ़ से सीएम पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। इसके साथ ही शिअद गठबंधन की तरफ़ से सुखबीर सिंह बादल मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। ऐसे में गठबंधन का पेंच मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर फंस सकता है। इस स्थिति में जिस पार्टी के पास ज़्यादा विधायकों का समर्थन होगा वही मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो सकता है।
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