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पंजाब: चुनावी सर्वे के बाद भारतीय जनता पार्टी ने बदली अपनी रणनीति, अब ये है चुनावी प्लान

पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सभी सियासी पार्टियां चुनावी रणनीतियां तैयार करने में जुटी हुईं हैं। वहीं चुनावी तारीख़ों के एलान के बाद चुनावी राज्यों में ओपिनियन पोल का दौर जारी है।

चंडीगढ़, 15 जनवरी 2022। पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सभी सियासी पार्टियां चुनावी रणनीतियां तैयार करने में जुटी हुईं हैं। वहीं चुनावी तारीख़ों के एलान के बाद चुनावी राज्यों में ओपिनियन पोल का दौर जारी है। पंजाब विधानसभा चुनाव में पहली बार शिरोमणि अकाली दल से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी चुनावी रण में उतरी है। पंजाब के चुनावी सर्वेक्षण में भारतीय जनता पार्टी पिछड़ती हुई नज़र आ रही है। सर्वे रिपोर्ट देखने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी रणनीति बदल दी है। पंजाब में भाजपा सिर्फ़ शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहना चाहती है। इसके साथ वह अपनी हिंदुत्व वाली छवि को भी बदलने की कोशिश कर रही है। हिंदु वोटरों के साथ-साथ सिख वोटरों को लुभाने के लिए भारतीय जनता पार्टी अब पंजाब के सिख नेताओं का सहारा ले रही है।

सिख मतदाताओं को लुभाने की कोशिश

सिख मतदाताओं को लुभाने की कोशिश

पंजाब में सिख मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा ने सिख नेतओं को आगे करना शुरू कर दिया है। ग़ौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी को कैप्टन अमरिंदर सिंह का साथ मिल ही रहा है। इसके साथ ही भाजपा को शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता और दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमिटी के पूर्व अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा, पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के पोते इंद्रजीत सिंह के साथ-साथ कंवर सिंह टेहरा जैसे सिख नेताओं का साथ भी मिल गया है। भारतीय जनता पार्टी इन सिख नेताओं के ज़रिए पंजाब के सिख मतदाताओं को लुभाने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है। अपने चुनावी अभियान में इन सिख चेहरों के ज़रिए सियासी माइलेज लेने की तैयारी भी कर रही है। सियासी जानकारों की मानें तो भाजपा पंजाब में पिछले विधानसभा चुनाव में शहरी मतदाताओं और हिंदुत्व छवि पर ही चुनावी रण में उतरी थी।

पंजाब में बदल रहे हैं चुनावी समीकरण

पंजाब में बदल रहे हैं चुनावी समीकरण

किसान आंदोलन के बाद पंजाब में सियासी समीकरण काफ़ी बदल चुके हैं, कृषि कानूनो की वजह से ही शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन भी टूटा। शिअद-भाजपा गठबंधन के वक्त समीकरण कुछ ऐसे थे कि शिरोमणि अकाली दल बड़े भाई की भूमिका निभाएगी। वहीं भारतीय जनता पार्टी चुनावी रण में छोटे भाई की भूमिका में निभाएगी। अब हालात पहले जैसे नहीं रहे शिअद-भाजपा के रास्ते अलग-अलग हो चुके हैं। चूंकि भारतीय जनता पार्टी अब शिरोमणि अकाली दल से अलग हो चुकी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुखदेव ढींढसा की पार्टी के साथ गठबंधन कर बड़े भाई की भूमिका में चुनावी रण में उतरी है। इसलिए भाजपा के लिए चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करना चुनौती साबित हो रही है। यही वजह है कि सर्वे रिपोर्ट देखने के बाद भाजपा ने अपनी छवि में बदलाव करने की रणनीति तैयार की है।

कैप्टन कर रहे चुनावी रणनीति तैयार

कैप्टन कर रहे चुनावी रणनीति तैयार

पंजाब में भारतीय जनता पार्टी अब अपना दायरा बढ़ाते हुए अपने साथ मनजिंदर सिंह सिरसा, कंवर सिंह टेहरा, इंद्रजीत सिंह, इकबाल सिंह तुंग और सरचांद सिंह जैसे सिख नेताओं को साथ जोड़ रही है। कई बड़े सिख नेताओं को शामिल करने की कोशिशें जारी हैं। पंजाब में ज्यादातर जाट सिख (जट सिख) की आबादी 30 से 40 फीसदी है। इसलिए पंजाब के चुनावी रण में हिंदू और सिख नेताओं को जोड़कर भारतीय जनता पार्टी पहली बार बड़ा सियासी उलट फेर करने की तैयारी कर रही है। आपको बता दें कि 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में 117 सीटों में से भाजपा ने सिर्फ़ 23 सीटों पर ही चुनाव लड़ा था जिसमें तीन सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई थी। ग़ौरतलब है कि पंजाब में संगठनात्मक मज़बूती के लिए भाजपा और कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत है। इसलिए पंजाब की ज़्यादातर चुनावी रणनीति कैप्टन अमरिंदर सिंह के कहने पर ही तैयार की जा रही है।


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