बातें तो बहुत हैं पर जमीन पर यूपी में जनस्वास्थ्य की हलत चिंताजनक

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 30 नवंबर। भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल ही में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस- 5) की दूसरी कड़ी जारी की. इसके बाद उत्तर प्रदेश में जन स्वास्थ्य की प्रगति को सराहा गया लेकिन जानकार कई अन्य मापदंडों पर यूपी के खराब प्रदर्शन को लेकर चिंतित हैं. मसलन उत्तर प्रदेश में आज भी 50 से कम उम्र की आधी से ज्यादा महिलाओं में खून की कमी है. राज्य में महिलाओं के प्रति हिंसा में कोई खास कमी नहीं हुई है और यहां के लोगों में एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूकता में भी काफी कमी आई है.

इतना ही नहीं राज्य में हर पांच में से चार महिलाओं को मां बनने से पहले फॉलिक एसिड जैसी जरूरी दवाएं नहीं मिल पातीं. अभी भी यूपी के सरकारी अस्पतालों में सीजेरियन की सुविधाएं नहीं हैं. इतना ही नहीं तीन-चौथाई बच्चों को जन्म के एक घंटे के अंदर मां का दूध नहीं मिल पा रहा है. जानकार मानते हैं, इन समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

सरकारी अस्पतालों में सीजेरियन नहीं

जानकार कहते हैं कि यूपी में अस्पतालों में डिलीवरी बढ़ी है लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि सीजेरियन के जरिए ज्यादातर बच्चे प्राइवेट अस्पतालों में ही पैदा हो रहे हैं. सरकारी अस्पतालों में 100 में से सिर्फ 6 बच्चे सीजेरियन से पैदा हो रहे हैं. पब्लिक हेल्थ पर काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था वात्सल्य की डॉ नीलम सिंह भी इस बात पर मुहर लगाती हैं. वह बताती हैं, "यूपी के सरकारी अस्पतालों में सीजेरियन की सुविधाएं ही नहीं हैं. इससे भी खतरनाक हैं प्राइवेट हॉस्पिटल, जहां अब ज्यादातर सीजेरियन हो रहे हैं. क्योंकि कई बार इनमें गायनेकोलॉजिस्ट ही नहीं होते, पैसों के लालच में सामान्य डॉक्टर ही डिलीवरी करा देते हैं. यह खतरनाक हो सकता है."

नेशनल न्यूट्रिशन मिशन के तहत महिला और बाल स्वास्थ्य पर उत्तर प्रदेश के कई जिलों में काम कर चुके विनय कुमार कहते हैं, "यूपी में अधिकतर मांएं पैदा होने के तुरंत बाद बच्चों को दूध नहीं पिला रही हैं. इसकी वजह उन्हें ब्रेस्टफीडिंग के लिए स्पेशल काउंसलिंग न मिल पाना है जबकि इसके लिए जानकार स्वास्थ्य कर्मियों की नियुक्ति की जाती है लेकिन ऐसी कोई सुविधा जमीन पर न मौजूद होने के चलते, बच्चे ऐसे जरूरी पोषण से छूट जा रहे हैं. इसका असर उनके बाद से जीवन में दिखेगा."

कुपोषण से बच नहीं सकते बच्चे

डिलीवरी के बाद भी विशेषज्ञ डॉक्टरों के न होने के चलते गड़बड़ियां जारी रहती हैं. विनय कुमार कहते हैं, "मां के पहले गाढ़े दूध का महत्व जानने के बाद भी डॉक्टर बाहर से पाउडर्ड मिल्क लाकर बच्चे को पिलाने की सलाह देते हैं. इस तरह के दूध की बिल्कुल मनाही है, फिर भी. ऐसा दूध कंपनियों और डॉक्टरों की साठ-गांठ से बेचा जाता है. फिर अगले छह महीने भी इसी तरह बाहर का दूध पिलाने का क्रम जारी रहता है, जबकि सामान्यत: बच्चे को मां का दूध पिलाया जाना चाहिए. यह बाद में बच्चे के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है."

जानकार बताते हैं कि एनएफएचएस के आंकड़ों के मुताबिक यूपी में 6 महीने से 2 साल के बीच 94 फीसदी बच्चों को पर्याप्त खाना नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में कुपोषण को खत्म करने का सपना भी बेईमानी है. बिना पूरे पोषण के बच्चों का विकास कैसे होगा. यही वजह है कि अब भी 100 में से 40 बच्चों की उम्र के हिसाब से लंबाई कम है. और बहुत से बच्चों का उम्र के हिसाब से वजन नहीं बढ़ रहा. इसके अलावा अति कुपोषित बच्चों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है. ओवरवेट बच्चों की संख्या भी बढ़कर दोगुनी हो गई है. 5 साल से कम उम्र के 66 फीसदी बच्चे एनिमिक हैं, जबकि 2015 में यह आंकड़ा 63 फीसदी था.

सरकार का ढीला रवैया

विनय कुमार बताते हैं कि इन बीमारियों की रोकथाम के लिए बच्चों को आंगनवाड़ी और स्कूल में दवाएं दिए जाने की व्यवस्था की जाती है लेकिन अधिकांशत: ये दवाएं यहां तक पहुंचती ही नहीं. उनका मानना है, कोरोना के बाद ये हालात और खराब हुए हैं क्योंकि अब ज्यादातर बच्चे स्कूल और आंगनवाड़ी जा ही नहीं रहे. जिससे यह प्रक्रिया पूरी तरह से रुक गई है और सरकार इसके लिए अतिरिक्त प्रयास भी नहीं कर रही.

जानकार मानते हैं कि मिड डे मील या आंगनवाड़ी के खाने की गुणवत्ता के प्रति समाज का संदेह, भ्रष्टाचार, भोजन बनाने की ठीक व्यवस्था का न होना भी बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली वजहें हैं. वे यह भी कहते हैं कि कुपोषण की शुरुआत तो मां से ही हो जाती है. एनिमिक महिला जब प्रेग्नेंट होती है तो बच्चे के कुपोषित पैदा होने का डर रहता है. यूपी में आधी से ज्यादा महिलाओं को एनिमिया है. ऐसे में बच्चों को कुपोषण से कैसे बचा सकते हैं, वह भी बिना आयरन, फॉलिक एसिड जैसे तत्वों की कमी पूरी किए बिना?

डॉ नीलम सिंह कहती हैं, "कुपोषण कई वजहों से बना हुआ है. यह एक लंबी और कई चरण की प्रक्रिया है. शादी की उम्र, फैमिली प्लानिंग, अवेयरनेस इन सबका बहुत रोल होता है. ऐसे में किशोरावस्था से ही लड़कियों के स्वास्थ्य पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है."

स्वास्थ्यकर्मियों की खराब छवि

जानकार सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों, जैसे एएनएc, आशा और आंगनवाड़ी कर्मियों की खराब छवि को भी सरकारी प्रयासों के ढंग से लागू न हो पाने की एक वजह मानते हैं. उनके मुताबिक न ही इन स्वास्थ्यकर्मियों का ईमानदारी से, योग्यता के आधार पर चयन होता है और न ही उन्हें पर्याप्त ट्रेनिंग मिल पाती है. साथ ही उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उन्हें सम्मानजनक मेहनताना भी नहीं मिलता. इन वजहों से उनकी सोशल इमेज बहुत कमजोर होती है और कई बार महिलाएं और उनके परिवार इन स्वास्थ्यकर्मियों की बातों पर ध्यान नहीं देते.

विनय कहते हैं कि दक्षिण भारतीय राज्यों के मुकाबले आधी या उससे भी कम सैलरी पाने वाली ये स्वास्थ्यकर्मी सर्वे भरने और चुनाव की ड्यूटी करने जैसे काम भी करती हैं. ऐसे में जनस्वास्थ्य का काम कई बार प्राथमिकता नहीं रह जाता. डॉ नीलम सिंह उत्तर भारत में ऐसी कई स्वास्थ्यकर्मियों के कुशल न होने पर भी चिंता जताती हैं.

जानकार मानते हैं यूपी में सरकार की ओर से स्वास्थ्य कार्यक्रमों और बीमारियों के प्रति जागरूकता के कार्यक्रमों में भी कमी आई है, जिससे एड्स जैसी बीमारियों के बारे में लोगों की जानकारी कम हो रही है.

Source: DW

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