Holi Special: बिहार से जुड़ा है होलिका दहन की परम्परा का इतिहास, जानिए इसके पीछे की कहानी
पूरे हिंदुस्तान मे होली में होलिका दहन की परम्परा रही है। होली से पहले पूर्व संध्या पर होलिका दहन की परम्परा पूर्वजों से चली आ रही है।
पटना, 17 मार्च 2022। पूरे हिंदुस्तान मे होली में होलिका दहन की परम्परा रही है। होली से पहले पूर्व संध्या पर होलिका दहन की परम्परा पूर्वजों से चली आ रही है। क्या आप जानते हैं कि बिहार के पूर्णिया ज़िला के बनमनखी से होलिका दहन की परम्परा का इतिहास जुड़ा हुआ है। आइए जानता हैं कि इसके पीछे की कहानी क्या है ? स्थानीय बुज़ुर्ग बताता हैं कि आज भी बनमनखी के सिकलीगढ़ धरहरा में होलिका दहन से जुड़े अवशेष बचे हुए हैं। उसी जगह पर भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए खम्भे से नरसिंह अवतार हुआ था और प्रहलाद को बचा लिया गया था।

सिकलीगढ़ धरहरा से हुई होलिका दहन की शुरूआत
आपको जान कर हैरानी होगी की पूरे भारत वर्ष में होली की पूर्व संध्या पर जिस होलिका को जलाते हैं। असत्य पर सत्य की जीत की ख़ुशी मनाते हैं, उसकी शुरुआत पूर्णिया के सिकलीगढ़ धरहरा में हुई थी। लक्षमण ऋषि (पुजारी) ने बताया कि मान्यताओं के अनुसार असुर हिरण्यकश्यप ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने की तपस्या की थी और देवताओं को पराजित कर दिया था। लिहाजा तीनों लोकों पर हिरण्यकश्यप का अत्याचार शुरू हो गया था। तब भगवान विष्णु ने भक्तों के कल्याण के लिए अपने अंश प्रहलाद को असुरराज की पत्नी कयाधु के गर्भ में भेज दिया। जन्म से ही भक्त प्रहलाद विष्णु भक्त था। जिससे हिरण्यकश्यप उसे अपना शत्रु समझने लगा था।
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होलिका के साथ प्रहलाद को अग्नि में जलाने की योजना
अपने पुत्र को खत्म करने के लिए हिरण्यकश्यप ने होलिका के साथ प्रहलाद को अग्नि में जलाने की योजना बनाई। होलिका के पास एक ऐसी चादर थी जिसपर आग का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। योजना के अनुसार हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को वही चादर लपेटकर प्रहलाद को गोद में बैठाकर आग जला दी। तभी इसी खम्भे से नरसिंह अवतार हुआ भक्त प्रहलाद बच गए और तेज़ हवा ने होलिका के चादर उड़ा दिए जिससे वो अग्नि में जल गई। ये वही स्थल है जहां होलिका दहन हुआ था और भक्त प्रहलाद बाल बाल बच गए थे | तभी से इस तिथि पर होली मनाई जाती है।

मंदिर का दर्शन करने दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु
मनोज कुमार (श्रद्धालु) ने बताया कि नरसिंह अवतार के इस मंदिर का दर्शन करने दूर दूर से श्रद्धालु आते है और उनकी सभी मुरादें पूरी भी होती हैं। यहां हर वर्ष धूमधाम से होलिका दहन होता है। यहां होलिका जलने के बाद ही दूसरी जगह होलिका जलाई जाती है। आपको बता दें कि बिहार सरकार के पूर्व पर्यटन मंत्री कृष्ण कुमार ऋषि ने इस स्थल को पर्यटन स्थल का दर्जा दिलाया और होली के मौके पर राजकीय समारोह घोषित किया था। लेकिन पिछले दो वर्ष से कोरोना काल को लेकर राजकीय महोत्सव नही मनाया गया था । वहीं इस बाबत बिहार के कला संस्कृति मंत्री आलोक रंजन ने कहा कि इस बार होलिका दहन राजकीय समारोह के साथ मनाया जाएगा। होलिका दहन की परम्परा से जुडी पूर्णिया के इस ऐतिहासिक स्थल पर हर वर्ष विदेशी सैलानी आते हैं। कई फिल्मो की सूटिंग भी यहाँ हो चुकि है बावजूद इस स्थल का जितना विकास होना चाहिए उतना नही हुआ है।
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