दिल्ली विधानसभा में घट गई मुसलामन विधायकों की संख्या
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। हालांकि दिल्ली विधान सभा चुनावों में मुसलमानों ने जमकर वोट दिया आम आदमी पार्टी के हक में, पर विधानसभा में घट गए मुसलमान एमएलए। पिछली विधानसभा में पांच मुसलमान विधायक थे। कांग्रेस से विधायक थे मतीन हमद, मोहम्मद आसिफ, हारून युनूस और हसन अहमद। ये सभी उन क्षेत्रों से जहां पर मुसलमानों की आबादी खास है।
जदयू वाले शोएब इकबाल भी कांग्रेस में शामिल हो गए थे। ये सभी चुनाव हारे गए। वनइंडिया ने कुछ दिन पहले संकेत दे दिए थे कि मुसलमान एमएलए की तादाद विधानसभा में घटेगी।
तीन ही जीते
कल आए नतीजों में सिर्फ तीन मुसलमान चुनाव जीते। सभी आप से संबंध रखते हैं। ये इमरान हुसैन(बल्लीमरान) से,अहमद खान (मटिया महल) से और अमानतउल्ला खान (ओखला) से।
झाडू चला दी
कैंपेन के समय ही समझ आ रहा था कि मुसलमान आप के हक में झाड़ू चलाएँगे। इस मसले पर राजधानी के प्रेस क्लब में पत्रकारों के बीच लगातार अखंड बहस जारी रही। बहस कभी-कभी तेज गर्म हो जाती है।
कांग्रेस के थे मुसलमान
जानकार कहने लगे थे कि इस बार कांग्रेस के पिछले चुनाव में जीते सारे उम्मीदवार नहीं जीत पाएंगे।सबसे ज्यादा खतरा शोएब इकबाल को है। उन्हें मटिया महल सीट पर भाजपा के अंजुमन देहलवी कड़ा मुकाबला दे रहे थे। इधर इस बार कोई चौकाने वाला फैसला आ सकता है।
मोदी के साथ नहीं
अब साफ हो गया है किदिल्ली के मुस्लिम मतदाता हिंदूवादी छवि वाले भाजपा के साथ नहीं हैं। वरिष्ठ पत्रकार अजीत गांधी कहते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुसलमानों ने भाजपा को कतई वोट नहीं दिया। उन्हें मोदी का विकास मॉडल और एजेंडा मुसलमानों को पसंद नहीं आया। भाजपा के प्रति मुसलमानों की धारणा नहीं बदली। वे कुल मिलाकर आप के साथ रहे हैं।
साक्षी-साध्वी की करतूतें
राजधानी के तारीखी एंग्लो अराबिक स्कूल में पढ़ा रहे मकसूद अहमद को भी इस बात की हैरानी है कि प्रगतिशील मुस्लिमों ने भी दिल्ली में नरेंद्र मोदी को समर्थन नहीं दिया। ये भी सच है कि मुस्लिम समुदाय बीजेपी सांसद साक्षी महाराज और साध्वी निरंजन ज्योति के दिए बयानों के कारण भाजपा से दूर हुए। जानकारों का कहना है कि अटल बिहारी वाजपेयी कुछ हद तक मुसलमानों का दिल जीतने में कामयाब रहे थे।













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