Mohammad Ali Shihab : अनाथालय में रहकर बने IAS, 4 भाई-बहन व पत्नी भी सरकारी नौकरी में
नई दिल्ली, 28 जून। यह सक्सेस स्टोरी अद्भुत व अकल्पनीय सी है। एक ऐसा लड़का जो कभी दाने-दाने को मोहताज हुआ। उसके सिर पर खुद की छत तक नहीं थी। छोटी सी उम्र में पिता खो दिया। फिर दो छोटी बहनों के साथ-साथ खुद को भी अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। आज वो शख्स आईएएस अफसर है। नाम है मोहम्मद अली शिहाब।

आईएएस मो.अली शिहाब का साक्षात्कार
वन इंडिया हिंदी से बातचीत में आईएएस अधिकारी मोहम्मद अली शिहाब कहते हैं कि 'मैं अनाथालय वाले दिन कभी नहीं भूल सकता। मेरी मुश्किलों ने ही मुझे संवारा और मुझ में आगे बढ़ने की हिम्मत आई। नतीजा आज सबके सामने है।

कौन हैं आईएएस मोहम्मद अली शिहाब?
बेइंतहा गरीबी, हौसला और कामयाबी का दूसरा नाम है मो. अली शिहाब। ये मूलरूप से केरल के मल्लपुरम जिले के गांव एडवान्नाप्पारा के रहने वाले हैं। वर्तमान में नागालैंड के आईएएस अधिकारी हैं। पावर डिपार्टमेंट में एडिशनल सेक्रेटरी पद पर कार्यरत हैं।

मोहम्मद अली शिहाब आईएएस का परिवार
आईएएस मोहम्मद अली शिहाब का जन्म 15 मार्च 1980 को केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम से 353 किलोमीटर मल्लपुरम जिले के एडवान्नाप्पारा में कोरोत अली और फातिमा के घर हुआ। इनसे एक बड़ा भाई व एक बहन और छोटी दो बहन हैं। शिहाब की शादी आयशा फेमिना से हुई है। इनके बेटा लेसीन व बेटी लीया है।

बहन व पत्नी शिक्षिका, भाई डॉक्टर
मोहम्मद अली शिहाब के परिवार में छह सदस्य सरकारी नौकरी में हैं। पत्नी आयशा फेमिना, बड़ी बहन मैमुना, छोटी बहन सौहराबी व नसीबा सरकारी स्कूल में शिक्षिका हैं। वहीं, शिहाब के बड़े भाई गफूर अब्दुल आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं।

पिता के साथ बेचते थे टोकरी व पान
मोहम्मद अली शिहाब बताते हैं कि बचपन गरीबी में बीता। पिता कोरोत अली बांस की टोकरियां बेचकर पांच बच्चों का परिवार चला रहे थे। शिहाब भी अपने पिता के साथ टोकरी बेचते थे। पान भी बेचे। 31 मार्च 1991 में पिता की बीमारी के चलते मौत हो गई। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी अब मां के कंधों पर आ गई थी।

दो बहनों के साथ अनाथालय में रहे
शिहाब की मां ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी। वह पांच बच्चों को पाल नहीं पा रही थीं। इसलिए पति की मौत के 2 माह बाद 11 वर्षीय शिहाब, आठ साल की बहन सौहराबी और पांच वर्षीय नसीबा कोझिकोड स्थित कुट्टीकट्टूर मुस्लिम अनाथालय में भेज दिया। तीनों भाई बहन घर से दूर हो गए।

शिहाब 10 साल रहे अनाथालय में
मो. अली शिहाब कहते हैं कि मैंने अनाथालय की जिंदगी एक दशक तक जी है। यहीं पर रहकर 12वीं व प्री की डिग्री हासिल की। दस साल बाद अनाथालय से घर लौटा और दूरस्थ शिक्षा से स्नातक की। बड़ा भाई गफूर व बहन मैमुना अनाथालय नहीं गए थे। ये मां के साथ घर पर ही रहे। पिता की मौत के बाद इन्होंने ने भी मां के साथ मेहनत मजदूरी करके अपनी कॉलेज की पढ़ाई की।

21 परीक्षाएं पास की, चपरासी से शुरुआत
मोहम्मद अली शिहाब पढ़ाई में काफी होशियार थे। इस बात का इंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि शिहाब 21 परीक्षाएं पास चुके थे। सबसे पहले साल 2004 में चपरासी और फिर रेलवे टिकट परीक्षक, जेल वार्डन के पद भी काम किया।

अनाथालय से निकला पहला आईएएस
शिहाब दावा तो नहीं करते, मगर कहते हैं कि संभवतया वे देश के पहले आईएएस हैं, जो अनाथालय से निकले हैं। साल 2011 में 226 रैंक पाकर नागालैंड कैडर के आईएएस अधिकारी बन गए। खास बात है कि यूपीएससी के साक्षात्कार के दौरान अंग्रेजी अच्छी नहीं होने के कारण ट्रांसलेटर की जरूरत पड़ी थी। 300 में से 201 अंक हासिल किए।

तीन जिलों में रहे कलेक्टर
पूर्वोत्तर के राज्य नागालैंड में मोहम्मद अली शिहाब काबिल आईएएस अधिकारी हैं। ये नागालैंड की राजधानी कोहिमा, तुएनसांग और किफिरे में जिला कलेक्टर के पद पर भी सेवाएं दे चुके हैं।

पिता की उम्मीदों पर उतरा खरा
मो. शिहाब कहते हैं कि उनके पिता अनपढ़ थे, मगर वे महत्वकांक्षी थे। माता-पिता खुद पढ़-लिख नहीं पाए। इसके बावजूद उन्होंने अपने पांचों को पढ़ने लिखने का भरपूर अवसर दिया। पिता की मौत के वक्त बड़ा भाई गफूर व बहन मैमुना इंटरमीडियट पास कर चुके थे। हम तीन भाई-बहन अनाथालय में रहकर पढ़ लिए। नतीजा आज सारे सरकारी नौकरी में हैं।

कुछ खोने को ना हो तो पाने को बहुत कुछ-आईएएस शिहाब
आईएएस मो. अली शिहाब कहते हैं सफलता के लिए आपकी गरीबी कोई मायने रखती। जब हमारे पास खोने को कुछ भी नहीं होता है तो पाने के सारे रास्ते खुले रहते हैं। मुश्किलें हर किसी की जिंदगी में आती हैं, मगर कामयाबी सिर्फ वो ही शख्स हो पाता है, जो अपनी मुश्किलों को ही ताकत बना लें।












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