Raghuvir Khedkar कौन हैं? तमाशा कला के लिए मिल रहा पद्मश्री पुरस्कार, बोले-मेरी सात पीढ़ियों का उद्धार हो गया
Who is Raghuvir Khedkar: 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस वर्ष के 'पद्म पुरस्कारों' की घोषणा की। ये देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान हैं, जिन्हें 'पद्म विभूषण', 'पद्म भूषण' और 'पद्म श्री' इन तीन प्रतिष्ठित श्रेणियों में प्रदान किया जाता है। महाराष्ट्र के लिए यह अत्यंत गर्व का विषय है कि लोकनाट्य तमाशा के वरिष्ठ कलाकार और महाराष्ट्र में 'सोंगाड्या' के नाम से मशहूर रघुवीर खेडकर को 'पद्म श्री' पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। यह घोषणा तमाशा कला जगत के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है।
Raghuvir Khedkar बोले- "मानो मेरी सात पीढ़ियों का उद्धार हो गया है
इस सम्मान पर खुशी जाहिर करते हुए खेडकर ने कहा मुझे बहुत खुशी हुई है, आत्मीय आनंद हुआ है।" उन्होंने अपनी खुशी करते हुए कहा, "मानो मेरी सात पीढ़ियों का उद्धार हो गया है।" उन्होंने आगे बताया कि लावणी कला को पहले भी यह सम्मान मिल चुका है, लेकिन तमाशा कला को यह पहली बार प्राप्त हो रहा है, इसलिए यह आनंद उनके लिए 'बहुत बड़ा' है! उन्होंने कहा, "यह पुरस्कार मुझे अकेले नहीं, बल्कि मेरी संपूर्ण तमाशा कला जगत को मिला है, और इसकी खुशी बहुत विशाल है।"

Raghuvir Khedkar बचपन से कर रहे इस कला का प्रदर्शन
अपनी कला यात्रा को याद करते हुए खेडकर ने साझा किया, "मैं 1970 में एक बाल कलाकार के रूप में मंच पर आया था और तब से लगातार काम कर रहा हूं।" उनका पैतृक गांव रत्नागिरी जिले का खेड है।
खेडकर ने अपनी मां से सीखी ये कला
कला के प्रति अपनी प्रारंभिक प्रेरणा का स्रोत बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें यह 'बाळकडू' (शुरुआती सीख) अपनी माँ से मिला। खेडकर ने दुख व्यक्त करते हुए बताया कि उनके पिताजी का निधन 1964 में हो गया था, जबकि उनका जन्म 1961 में हुआ था, इसलिए उन्हें पिता की कोई स्मृति नहीं है।
Raghuvir Khedkar की टीम में कितने हैं सदस्य?
उन्होंने अपनी तमाशा मंडली के बारे में भी जानकारी दी। खेडकर के अनुसार, उनकी टीम में मंच पर 45 कलाकार सक्रिय हैं, वहीं 60 से अधिक लोग पर्दे के पीछे रहकर सहयोग करते हैं, जिससे कुल लगभग 110 व्यक्ति इस कला से जुड़े हुए हैं।
खेडकर बोले- तमाशा के प्रति लोगों का प्रेम अथाह लेकिन...
इस अवसर पर उन्होंने तमाशा के सामने आ रही आधुनिक चुनौतियों के बारे में बात करते हुए खेडकर ने कहा आज भी तमाशा का मंचन होता है, लेकिन अब लोग टिकट लेकर मिट्टी में बैठकर 5 घंटे तक नाटक देखने की मानसिकता नहीं रखते, उन्हें कुर्सियाँ चाहिए।
उनकी राय में, यदि तमाशा आयोजक कुर्सियों की व्यवस्था करें, तो दर्शकों की संख्या में निश्चित रूप से वृद्धि हो सकती है, क्योंकि लोगों के पास अब उतना समय नहीं है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी संतोष जताया कि तमाशा के प्रति लोगों का प्रेम अथाह है, और "हम जिस भी गांव में जाते हैं, वहां शाम तक तुरंत पता चल जाता है।"
खेडकर ने युवा तमाशा कलाकारों को एक प्रेरणादायक संदेश देते हुए कहा, "जो कष्ट मैंने सहे, जो कड़वाहट मैंने पी, लोगों की अजीबोगरीब धारणाओं का सामना किया और उन्हें समझाया कि हम अलग नहीं, बल्कि समाज के ही कलाकार घटक हैं, मंच पर विभिन्न कलाएं प्रस्तुत करते रहे... इसी तरह, अगर युवा पीढ़ी इसमें भाग ले, तो वे भी ऐसे पुरस्कार जीत सकते हैं।"
तमाशे से एक दिन में कितना कमाते हैं खेडकर?
खेडकर ने बताया कि तमाशा को एक संभावित रोजगार अवसर के रूप में भी देखा। खेडकर ने बताया कि अब युवा भी इस क्षेत्र की ओर आकर्षित हो रहे हैं, क्योंकि तमाशे में रोजगार के अवसर काफी अच्छे हैं। एक दिन का मानदेय ₹1500 से अधिक मिल सकता है।
उन्होंने शिक्षित बेरोजगार युवाओं को इस पेशे को अपनाने की भी इच्छा व्यक्त की। खेडकर ने कहा कि लगभग 20 साल पहले तमाशा के प्रति लोगों का नज़रिया अच्छा नहीं था, लेकिन टेलीविजन के आगमन के साथ, तमाशा पर बनी फिल्मों, धारावाहिकों और कलाकारों के साक्षात्कारों के प्रसारण से लोगों की सोच में सुधार आया है।
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