'वन नेशन वन इलेक्शन' पर उद्धव की शिवसेना ने जताई आपत्तियां, बताई क्या हैं कमियां?
One Nation, One Election: 'वन नेशन वन इलेक्शन' को लेकर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की हालिया बैठक के बाद एक बार फिर ये मुद्दा चर्चा में आ गया है। शिवसेना (यूबीटी) के अंबादास दानवे ने 'वन नेशन वन इलेक्शन' विधेयक पर जेपीसी को अपनी पार्टी की ओर से जताई गई आपत्तियों के बारे में खुलासा किया। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी की ओर से विधेयक में कई संशोधन की सिफारिश की गई है।
अंबादास दानवे ने अपनी पार्टी की ओर से सुझाव दिया कि, "इस विधेयक को लागू करने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 174, 356, 75 (3) तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में बडे़ संशोधन की आवश्यकता है। हालांकि ये संवैधानिक परिवर्तन देश के संघीय ढांचे, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व तथा लोकतांत्रिक सिद्धांतों को गंभीर रूप से खतरे में डाल सकते हैं।"

लोकतंत्र को कैसे कमजोर कर सकता है 'वन नेशन वन इलेक्शन'
एबीपी न्यूज की रिपोर्ट और मीडिया को दिए इंटरव्यू के अनुसार अंबादास दानवे ने बताया कि 'वन नेशन वन इलेक्शन' स्थानीय स्वायत्त निकायों, जैसे ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं की स्वायत्तता को कमजोर कर सकता है, जिन्हें वर्तमान में अलग-अलग चुनावों के माध्यम से नागरिकों की मांगों और उम्मीदों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है।
क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा
इसके अलावा उन्होंने कहा, "DMK, TMC, BJD जैसी क्षेत्रीय पार्टियां जो स्थानीय मुद्दों को रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उनका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।" 'वन नेशन वन इलेक्शन' में राष्ट्रीय दलों का प्रभुत्व होने से क्षेत्रीय दलों का प्रभाव को कम कर सकता है।
वोटिंग प्रतिशत में कमी आ सकती है
शिवसेना यूबीटी नेता ने कहा, "बार-बार चुनाव होने पर वोटर्स को वोट के जरिए अपनी राय रखने का मौका मिलता है लेकिन एक बार चुनाव होने से पांच वर्षो तक सरकार की जवाबदेही ना रहे। इससे संभावित रूप से वोटिंग प्रतिशत में कमी आ सकती है क्योंकि पांच साल की अवधि में सरकार को जवाबदेह ठहराने की जनता की क्षमता कम हो जाती है। बार-बार चुनाव होने से सरकारें लोगों के प्रति ज्यादा जवाबदेह रहती हैं।"
चुनाव कराने के लेकर नीतिगत अस्पष्टता
शिवसेना यूबीटी नेता दानवे ने कहा, "विधानसभा में स्पष्ट बहुमत न होने या राष्ट्रपति शासन लागू होने की स्थिति में चुनाव कराने को लेकर अस्पष्टता है कि कैसे और कब चुनाव करवाए जाए। ऐसी स्थितियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देशों की कमी संवैधानिक संघर्षों को जन्म दे सकती है।
वन नेशन वन इलेक्शन पारदर्शिता को प्रभावित कर सकती है
शिवसेना यूबीटी के नेता ने कहा, "वन नेशन वन इलेक्शन में ईवीएम खरीदने, प्रशिक्षण और सुरक्षा के लिए प्रारंभिक वित्तीय खर्च काफी अधिक होने का अनुमान है, भले ही दीर्घकालिक बचत के दावे किए गए हो लेकिन चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा और सभी राज्य विधानसभा में एक साथ चुनाव कराने की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं, क्योंकि इसमें तकनीकी, मानव संसाधन और तार्किक बाधाएं हैं, जो पारदर्शिता को प्रभावित कर सकती हैं।" कौन हैं डॉक्टर यात्री? ज्योति मल्होत्रा की गिरफ्तारी के बाद क्यों दे रहे सफाई, जारी किया VIDEO
17 मई को हुई थी ये अहम बैठक
बता दें 17 मई 2025 को जेसीपी के सदस्यों ने राजनीतिक दलों के नेताओं, किसान संगठनों के प्रतिनिधियों और बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के नेताओं सहित कई हितधारकों के साथ चर्चा की थी। इसी बैठक में भाजपा सांसद और वन नेशन वन इलेक्शन की संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा था कि, समिति प्रस्ताव पर चर्चा करने और संदेह को दूर करने के लिए बैठकें की जाएंगी। जिसके तहत 19 मई 2025 को मुंबई में बैठक होनी थी। Sindhu Jal Sandhi पर बोले केंद्रीय मंत्री शिवराज, 'नेहरू की गलती को PM Modi ने सुधारा'
"वन नेशन वन इलेक्शन" से बचाया जा सकता है देश का 4.50 लाख करोड़ रुपया
भाजपा सांसद और जेपीसी के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने पिछली बैठक में कहा था, 'वन नेशन वन इलेक्शन' की अवधारणा से होने वाले लाभ पर बात करते हुए कहा, कई चुनावों को एक साथ कराने से होने वाली बचत से जीडीपी में 1.6% की अतिरिक्त वृद्धि का अनुमान है। वर्तमान लागत लगभग ₹4.50 लाख करोड़ है जो एक साथ इलेक्शन करवाकर बचाया जा सकता है। इसके अलावा, उन्होंने कहा अगर संसदीय, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव एक साथ कराए जाएं तो वोटर्स की संख्या संभवतः 90% तक पहुंच सकती है।












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