Maharashtra: राज ठाकरे की अभी खत्म नहीं हुई राजनीतिक अहमियत? BMC की लड़ाई बाकी है!
Maharashtra Politics: महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) का इतना बुरा प्रदर्शन हुआ है कि उसके अस्तित्व पर सवाल खड़े होने लगे हैं। पार्टी के दर्जे पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। लेकिन, यह कह देना की प्रदेश की राजनीति से राज ठाकरे की अहमियत बिल्कुल खत्म हो चुकी है तो यह बहुत ही जल्दबाजी होगी।
राज ठाकरे ने लोकसभा चुनावों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूरा भरोसा जताया था। पार्टी ने उस चुनाव में भाजपा को पूरा समर्थन देने की घोषणा की थी। लेकिन, विधानसभा चुनावों से ठीक पहले उन्होंने अचानक महायुति से अपनी राह अलग कर ली।

विधानसभा चुनाव में एमएनएस का प्रदर्शन बेहद खराब
एमएनएस ने मुंबई की करीब 30 सीटों के साथ ही राज्यभर में 125 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए। उनके बेटे अमित ठाकरे पहली बार मुंबई की माहिम सीट से चुनाव मैदान में उतरे। लेकिन, न तो अमित जीते और न ही उनकी पार्टी का एक भी उम्मीदवार। पार्टी का वोट शेयर भी गिरकर 1.55% रह गया, जो अबतक का उसका सबसे खराब प्रदर्शन है।
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एमएनएस का पिछले चुनावों में प्रदर्शन
अपने चाचा और शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की ओर से पार्टी की कमान उद्धव ठाकरे को सौंपे जाने के बाद जब राज ठाकरे ने अपनी अलग राजनीतिक राह पकड़ी तो उनकी एमएनएस ने 2009 में पहला विधानसभा चुनाव लड़ा। उसमें पार्टी को 13 सीटें मिलीं। लेकिन, 2014 और 2019 में वह सिर्फ 1-1 सीट ही जीत सकी थी।
बीएमसी चुनावों में राज ठाकरे की पार्टी की अहम हो सकती है भूमिका
इस बार पार्टी के प्रदर्शन की खराब वजह से उसपर चुनाव आयोग से मान्यता रद्द होने की तलवार लटकी हुई है। लेकिन, अगर महाराष्ट्र और उसमें भी देश के कई राज्यों से ज्यादा बजट वाली बीएमसी को देखें तो राज ठाकरे के राजनीतिक भविष्य को इतनी जल्दी नकार देना बहुत जल्दबाजी होगी।
एमएनएस की वजह से शिवसेना (यूबीटी) को मिली 10 सीट!
तथ्य यह है कि एमएनएस चुनाव जरूर हारी है, लेकिन उनके चचेरे भाई और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूटीबी) ने जो 20 सीटें जीती हैं, उनमें से 10 सीटें जितवाने में एमएनएस का ही योगदान है। इनमें उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे की मुंबई की वर्ली समेत सारी सीटों पर शिवसेना(यूबीटी) प्रत्याशियों की जीत का मार्जिन एमएनएस को उस सीट पर मिले वोट से कम है।
एमएनएस की वजह से मुंबई में नहीं हुआ उद्धव की पार्टी का सफाया
इनमें 8 सीटें अकेले मुंबई की उन 36 सीटों में शामिल हैं, जहां उद्धव की पार्टी जीती है। मुंबई में सबसे ज्यादा 15 सीटें बीजेपी जीती है, उसके बाद सबसे अधिक 10 सीटें उद्धव के दल को ही मिली हैं।
मतलब, अगर एमएनएस महायुति के साथ होती तो अपने गढ़ में ही शिवसेना (यूबीटी) का सफाया होना तय था और मायानगरी मुंबई में महायुति को 22 के बदले 30 सीटें मिल सकती थीं। अगर एमएनएस अकेले नहीं लड़ी होती तो आदित्य ठाकरे का वर्ली से जीतना भी मुश्किल था।
बीएमसी चुनाव में बीजेपी के काम आ सकते हैं राज ठाकरे
मतलब, राज ठाकरे की पार्टी आज भी मुंबई में अपनी एक अहमियत रखती है। यहां संभवत: अगले साल की शुरुआत में बीएमसी के चुनाव होने की संभावना है,जिसमें पहले ही तीन वर्षों की देरी हो चुकी है। महाराष्ट्र में ऐतिहासिक जीत के बाद बीजेपी और उसकी अगुवाई वाले महायुति का अगला निशाना बीएमसी ही है, जिसपर उद्धव ठाकरे की पार्टी का लगभग 27 वर्षों से कब्जा है।
बीजेपी के साथ खुद को कंफर्टेबल बताते हैं राज ठाकरे
विधानसभा चुनावों के नतीजों से लगता है कि बीएमसी चुनाव में राज ठाकरे और बीजेपी की अगुवाई वाले महायुति दोनों एक-दूसरे की जरूरत बन सकते हैं। जब ठाकरे ने विधानसभा चुनाव अलग से लड़ने का एलान किया तब भी उन्होंने कई इंटरव्यू में यह बात दोहराई कि वो बीजेपी के साथ कंफर्टेबल हैं।
मुंबई में बीजेपी जो 15 सीटें जीती है, उनमें से 13 पर उसे 50% से अधिक वोट मिले हैं। मालाबार हिल में तो उसे सबसे अधिक 74% मत मिले हैं। जिस भी सीट पर यहां भाजपा का एमवीए से सीधा मुकाबला हुआ है, तो वहां बीजेपी सब पर भारी पड़ी है।
बीएमसी में मिल सकता है 'राजयोग' का मौका!
वहीं मराठी-भाषी वोटरों में अपना प्रभाव रखने वाली एमएनएस ने उपनगरीय इलाकों में 6% वोट जुटाए हैं तो आइलैंड सिटी में उसका वोट प्रतिशत 10 रहा है। ऐसे में अगर राज ने फिर से बीजेपी के साथ चलने का मन बना लिया तो उन्हें कम से कम बीएमसी में उद्धव को गद्दी से बेदखल करने का मौका मिल सकता है।
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बीजेपी के लिए ग्रीन सिंग्नल दे चुके हैं राज ठाकरे!
विधानसभा चुनावों से पहले वह कहते रहे हैं,'मेरी किसी पार्टी से बेहतर ताल्लुकात हैं तो बीजेपी से ही हैं। मुझे लगता है कि मैं भाजपा के साथ कंफर्टेबल हूं।' जबकि, चुनावों के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से जल्द से जल्द 'यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC)' लाने की मांग करके अपनी ओर से ग्रीन सिंग्नल भी दे दिया है।
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