Maharashtra Elections: चुनाव प्रचार में AI का कैसे हो रहा इस्तेमाल, कौन हैं खरीदार?

Maharashtra Chunav 2024: आम जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह ही अब चुनाव भी मशीनों के माध्यम से लड़ी जाने लगी हैं। महाराष्ट्र में वोटरों को लुभाने और उन तक अपनी बातें पहुंचाने के लिए राजनीतिक दलों ने तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से इस टेक्नोलॉजी से समाधान निकालने में जुटे हुए हैं।

टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक टेक्नोलॉजी कंपनियों ने बताया है कि वोटरों के विश्लेषण से लेकर उम्मीदवारों की जीत की संभावनाएं तलाशने वाले एआई-पावर्ड सॉल्यूशंस की मांग तेजी से बढ़ने लगी हैं। इससे राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों का काम बहुत आसान हो जाता है और उन्हें बहुत ही जल्दी यह पता चल जाता है कि चुनाव किस दिशा में जा रहा है और उसे कैसे बेहतर किया जा सकता है।

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मतदाताओं की नब्ज को पढ़ रहीं एआई!
पुणे की एक एआई कंपनी को एक प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी ने चुनावों में कारगर कैंपेन टूल के इस्तेमाल के लिए संपर्क किया। एक ऐसी ही कंपनी के संस्थापक और सीईओ नीरज लुनावत ने कहा, 'हमारी कंपनी ने एआई-ड्रिवेन सॉल्यूशन विकसित की है, जो कि चुनाव परिणामों और जनता की भावनाओं की भविष्यवाणी करने में मदद करती है।'

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मशीनों के माध्यम से आंकड़ों का विश्लेषण
यह कंपनी अपने एआई टूल्स के माध्यम से किसी भी उम्मीदवार की जीत की भविष्यवाणी के लिए उस विधानसभा क्षेत्र के आंकड़ों का विश्लेषण करती है। इसमें उस क्षेत्र में वोटिंग पैटर्न का इतिहास, वहां की जनसांख्यिकी आदि के बारे में समझ विकसित करने के लिए मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का इस्तेमाल करती हैं। लुनावत ने कहा, 'यह सिस्टम वार्ड-स्तरीय सटीक भविष्यवाणियां करने के लिए कई डेटा बिंदुओं को प्रोसेस करती हैं।'

एआई से मिलती है चुनाव प्रचारण की रणनीति बनाने में मदद
इतना ही नहीं, ये कंपनियां वोटरों की भावनाओं का रियल-टाइम विश्लेषण करने वाले टूल्स भी विकसित कर चुकी हैं। इसके लिए यह सोशल मीडिया की निगरानी करती हैं और उसी के आधार पर चुनाव क्षेत्र-विशेष में वोटरों की प्रतिक्रिया को देखते हुए चुनाव-प्रचार को जरूरत के हिसाब से दुरुस्त करने का काम करती हैं।

राजनेताओं के सिंथेटिक वर्जन से स्थानीय स्तर पर प्रचार!
राजस्थान आधारित एक आई कंसल्टेंट दिवयेंद्र सिंह ने कहा, 'हमें एक पॉलिटिकल कंसल्टेंट से महाराष्ट्र-आधारित एक राजनीतिक पार्टी के लिए मराठी में विशेष एआई-जनरेटेड वीडियो बनाने का अनुरोध प्राप्त हुआ।' उनके मुताबिक, 'कॉन्सेप्ट ये था कि स्थानीय भाषा में मतदाताओं को सीधे प्रचार का संदेश पहुंचाया जाए। हालांकि, हमने भाषागत दिक्कतों और पूर्व प्रतिबद्धताओं की वजह से इस अनुरोध को स्वीकार करने से मना कर दिया।'

दरअसल, ऐसे वीडियो में आमतौर पर एआई का इस्तेमाल करके राजनेताओं के सिंथेटिक वर्जन तैयार किए जाते हैं, जो विभिन्न मतदाता वर्गों को सीधे संदेश देते हैं। ज्यादा से ज्यादा वोटरों तक सीधे पहुंचने के लिए एआई के इस्तेमाल को राजनीतिक पार्टियां भी बढ़ावा दे रही हैं।

चुनाव प्रचार के लिए अनेकों टूल्स का हो रहा इस्तेमाल
एनसीपी के प्रवक्ता प्रदीप देशमुख ने कहा,'जमीन पर और दूर से काम करने वाले और साइबरस्पेस में काम करने वाले कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल स्थापित करने के लिए विशेष टीमें बनाई गई हैं। कंटेंट तैयार करने और प्रचार सामग्रियों की डिजाइनिंग के लिए एआई टूल्स का इस्तेमाल किया गया है। यहां तक कि रील्स और शॉर्ट वीडियोज जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया टूल्स बनाने के लिए भी एआई का उपयोग किया जा रहा है।'

राजनीतिक दलों की ओर से चुनाव प्रचार के कंटेंट और वोटरों से जुड़ी सूचनाएं इकट्ठा करने के लिए सोशल मीडिया और एआई टीमें तैनात की गई हैं। यहां तक कि प्रत्याशियों ने अपने स्तर पर भी 50 से लेकर 250 लोगों की ऐसी टीमें बना रखी हैं, जो वॉर रूम से लगातार काम कर रही हैं।

बीजेपी सोशल मीडिया सेल के एक पदाधिकारी निखिल पंचभाई ने कहा, 'हमारी पार्टी ने सोशल मीडिया पर नजर रखने के लिए टीमें बना रखी हैं। प्रचार से संबंधित कंटेंट की निगरानी के लिए एआई टूल्स का इस्तेमाल किया जा रहा है। एआई टूल्स के इस्लेमाल से डीप डेटा स्कैनिंग और डेटा माइनिंग की जा रही है, जिससे जमीनी-स्तर की रणनीति बनाने में काम में लाया जा रहा है।'

ऐसे मिलती है पार्टियों और प्रत्याशियों को मदद
एआई के इस्तेमाल से प्रत्याशियों और राजनीतिक पार्टियों को चुनावी डेटा, आर्थिक आंकड़े और सोशल मीडिया के माध्यम से वोटरों की भावनाओं को अपने लिए विश्लेषण करवा पाना आसान हो जाता है। इसकी मदद से उन्हें यह मालूम चल जाता है कि उन्हें किन बातों पर और किन इलाकों में फोकस करना है और उसी हिसाब से वह अपने संसाधनों का इस्तेमाल कर सकते हैं, ताकि उन्हें बेहतर से बेहतर परिणाम मिल सके।

इनके माध्यम से मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने और मतदान का प्रतिशत बढ़ाने में भी सहायता मिल सकती है। साथ ही साथ प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों या पार्टियों की ओर से अगर कोई गलत प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है तो इनके माध्यम से समय रहते उसका जवाब देना भी आसान हो सकता है।

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