Maharashtra Elections: बारामती में कैसे अपने करियर का सबसे मुश्किल चुनाव लड़ रहे हैं अजित पवार?
Maharashtra Chunav: एनसीपी प्रमुख और उपमुख्यमंत्री अजित पवार इस बार अपने गढ़ बारामती में अपने सियासी करियर का सबसे मुश्किल चुनाव लड़ रहे हैं। वह यहां से 1991 से ही लगातार सात बार चुनाव जीत चुके हैं। लेकिन, अबकी बार उनके खिलाफ उनके भतीजे यूगेंद्र पवार खड़े हैं, जिन्हें एनसीपी-एससी से उनके चाचा शरद पवार ने उतारा है। वैसे तो अजित पवार आठवीं बार भी अपनी आसान जीत के दावे कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हालात बहुत ही चुनौतीपूर्ण दिख रहे हैं।
हाल ही में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने दावा किया है कि 'इस बार (बारामती) में मेरी जीत का मार्जिन एक लाख से ज्यादा वोटों का रहेगा।' इससे लग रहा है कि वह खुद भी मान रहे हैं कि उनके लिए 2019 के मुकाबले चुनाव इस बार काफी कठिन है। क्योंकि,तब उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी को करीब 1.69 वोटों से हराया था।

बारामती के परिणाम से तय होगा अजित पवार का सियासी भविष्य
लोकसभा चुनावों में बारामती से अजित पवार की पत्नी सुनेत्र पवार अपनी ननद सुप्रिया सुले से चुनाव हार चुकी हैं। लेकिन, अगर अजित पवार बारामती से खुद भी हार गए तो यहां से उनके करियर के आगे के भविष्य पर बट्टा लगना लगभग तय है। बारामती को अजित पवार अपना गढ़ बना चुके हैं तो उसमें उनके चाचा शरद पवार की ओर से तैयार किए गए राजनीतिक आधार की बहुत बड़ी भूमिका है।
लोकसभा चुनाव में बारामती में हार चुकी हैं अजित पवार की पत्नी
इस बार अजित पवार के लिए चुनावी राह आसान नहीं दिख रही है, क्योंकि लोकसभा चुनाव में उनकी बहन सुप्रिया सुले ने अन्य विधानसभा क्षेत्रों के अलावा अजित पवार की विधानसभा सीट में भी सुनेत्र पवार पर बढ़त हासिल की थी। यही वजह है कि शुरू में अजित पवार के खुद यहां से चुनाव लड़ने को लेकर हिचकिचाहट भी दिखी।
यूगेंद्र पवार के पीछे है शरद पवार का चेहरा
वहीं बुजुर्ग शरद पवार बारामती सीट को कितनी अहमियत दे रहे हैं, इसका अंदाजा इसी से लगता है कि यूगेंद्र पवार के नामांकन में वे खुद भी शामिल हुए। जबकि, अपनी बेटी सुप्रिया सुले के लिए भी उन्होंने ऐसा नहीं किया था। अजित पवार भले ही एक लाख से ज्यादा वोटों से जीत के दावे कर रहे हैं, लेकिन उन्हें भी अंदाजा लग गया है कि भतीजे के खिलाफ चुनावी लड़ाई इतनी आसान नहीं होने वाली।
बारामती में अजित पवार ने अपना भी तैयार किया है जनाधार
इसलिए उन्होंने एक चुनावी रणनीतिकार की मदद ली है और अपने प्रचार के तरीके में काफी बदलाव किया है। वह लोगों के बीच काफी मुस्कुराते हुए दिखाई दे रहे हैं और उनके पहनावे में भी बदलाव महसूस किया जा रहा है। वैसे इस बात में दो राय नहीं कि यह विधानसभा चुनाव है और बारामती में अजित पवार ने अपने खुद का भी बहुत बड़ा जनाधार तैयार किया है।
बारामती शहर में अजित का दबदबा, ग्रामीण क्षेत्र में 'साहेब' का जलवा
लेकिन, बारामती में अजित पवार की लोकप्रियता शहरी इलाकों में ही ज्यादा नजर आती है, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी उनके चाचा शरद पवार या समर्थकों के लिए 'साहेब' की ही ज्यादा नजर आती है। मसलन, टीओआई से बारामती शहर में रेस्टोरेंट चलाने वाले अभिषेक साटव ने कहा, 'मेरा वोट दादा (अजित पवार) को जाएगा। उन्होंने बारामती के लिए बहुत किया है। यहां जो भी विकास आप देख सकते हैं, वह उन्हीं का किया हुआ है।'
यूं समझ सकते हैं बारामती शहर में यह एक तरह से आम भावना दिखाई दे रही है। जैसे मजदूरी का काम करने वाली गिरिजा जाधव कहती हैं, 'बारामती के लिए उन्होंने (अजित) बहुत किया है। उनकी ओर से दी गई लाडकी बहिन योजना से भी हमें मदद मिली है।' छोटे पवार का किया काम बारामती सिटी में हर जगह देखा जा सकता है। लेकिन, ग्रामीण इलाके उस तरह के शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर से आज भी पूरी तरह अछूते हैं।
ग्रामीण बारामती में शरद पवार की लोकप्रियता अब भी कायम
यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों के मतदाताओं के दिलों में आज भी शरद पवार का जलवा है। वह खेतों में पानी पहुंचाने, कृषि-आधारित कंपनियां लाने, डेयरी उद्योग आदि के लिए आज भी 'साहेब' के योगदान को सराहते हैं। यूगेंद्र पवार की मां शर्मिला पवार से लेकर पवार खानदान का अनेको क्षेत्रों में कारोबार फैला है। चीनी उद्योग में तो इस परिवार का पूरी तरह से बोलबाला रहा है।
शहरी क्षेत्र से ग्रामीण इलाकों में करीब तीन गुना ज्यादा वोट
अब अजित पवार की दिक्कत ये है कि जिन शहरी वोटरों के बीच वह ज्यादा लोकप्रिय दिख रहे हैं, उनका वोट सिर्फ 90,000 से एक लाख के बीच है। जबकि, बाकी 2.8 लाख मतदाता ग्रामीण इलाकों से ही हैं। सुप्रिया सुले को इन्होंने दिल खोलकर समर्थन किया था और बेटी के मुकाबले बहू से पूरी तरह से मुंह फेर लिया था।
59 गांवों का दौरा कर रहे हैं अजित पवार
सामने से अजित पवार के खिलाफ भले ही उनके भतीजे यूगेंद्र चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उनके पीछे 'साहेब' या शरद पवार की ही बैकिंग है। ऐसी स्थिति में अजित पवार के लिए बारामती पर कब्जा बरकरार रखना बहुत ही बड़ा संघर्ष है। यही वजह है ग्रामीण क्षेत्र के वोटरों को समझाने-बुझाने के लिए अजित पवार ने 59 गांवों की यात्रा भी शुरू की है।
वह मतदाताओं से यह भी कहते सुने जा रहे हैं, 'लोकसभा चुनावों के दौरान कुछ लोगों ने तय किया था कि वह ताई (सुप्रिया सुले) के लिए वोट करेंगे और विधानसभा में दादा (अजित पवार) को वोट देंगे। अब फैसला आपको करना है।'
लाडकी बहिन योजना से बच सकती है अजित पवार की लाज!
अजित पवार की आखिरी उम्मीद अपनी सीट की उन करीब 1.87 महिला लाभार्थियों पर टिकी है, जिन्हें लाडकी बहिन योजना का लाभ मिला है और इनमें से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों से हैं।












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