26/11 Attack: वो रात जब तड़तड़ाहट में दबीं गर्भवतियों की चीखें, मौत के 'जबड़े' से ये नर्स खींच लाईं 20 बच्चे
26/11 Mumbai Attack: मुंबई शहर और 26 नवंबर 2008 की काली भयानक रात। बाहर AK-47 की तड़तड़ा रही थीं, ग्रेनेड फट रहे थे, ताज की लॉबी में आग की लपटें उठ रही थीं। और कामा एंड अल्बलेस अस्पताल की पहली मंजिल पर... एक साधारण-सी सफेद वर्दी वाली नर्स अंजलि कुलथे (Anjali Kulthe) खामोशी से 20 गर्भवती औरतों की सांसें संभाल रही थीं। बाहर आतंक था। अंदर... उम्मीद। 'दीवार फांदकर दो लड़के आए... एक ने गोली चलाई, नर्स की सहकर्मी की साड़ी रक्त से लाल हो गई', वक्त था रात करीब 10:30 बजे।
खून से तर साड़ी में सहकर्मी जाधव को अंजलि ने खींचकर अंदर लिटाया, लेकिन कुछ ही मिनटों में सहकर्मी जाधव चली गईं। उसके बाद अंजलि को समझ आ गया- ये कोई छोटी-मोटी गोलीबारी नहीं, ये मौत का तांडव था। और ठीक उसी वक्त उनकी नजर पड़ी प्रसूति वार्ड पर। 20 गर्भवती महिलाएं। कुछ की डिलीवरी बस होने वाली थी। कुछ नवजात शिशु साथ लेटे थे। अंजलि ने एक पल भी नहीं गंवाया। उन्होंने लोहे का भारी-भरकम दरवाजा बंद किया। फिर धीरे से सबको पेंट्री के सबसे अंदर वाले छोटे-से कमरे में ले जाकर छिपाया।

'कोई आवाज मत करना... मैं हूं ना।'
जब पेंट्री में एक मां को प्रसव-पीड़ा हुई हथगोले फट रहे थे। इमारत हिल रही थी। महिलाएं डर से कांप रही थीं। अचानक एक गर्भवती महिला का चेहरा पीला पड़ गया- उसका ब्लड प्रेशर आसमान छूने लगा। प्रसव शुरू हो गया। अंजलि ने उसका हाथ थामा और फुसफुसाईं, 'डर मत... मैं ले जा रही हूं। बस मेरे साथ चल।' बाहर गोलियां। सीढ़ियों पर खून के छींटे। अंजलि ने उस महिला को कंधे पर हाथ रखकर लेबर रूम तक पहुंचाया। डॉक्टर नहीं आ पा रही थीं- नीचे गोलीबारी जोरों पर थी। तो अंजलि ने खुद डिलीवरी कराई। बिना एक चीख के। बिना एक रोने की आवाज के।

जैसे पूरी इमारत में सिर्फ वो मां और उसका आने वाला बच्चा ही बाकी हों। और जब बच्चे की पहली किलकारी गूंजी...अंजलि की आंखों में आंसू आ गए। बाहर मौत नाच रही थी, अंदर एक नई जिंदगी ने सांस ली।

सुबह 6 बजे - जब दरवाजा खटखटाया पुलिस ने
अंजलि बताती हैं कि 'मैं मां को अपने बच्चे की बलि नहीं देने देना चाहती थी' बाद में जब उनसे पूछा गया कि डर नहीं लगा? तो अंजलि दीदी ने सिर्फ इतना कहा- 'मैं नर्स हूं। मेरी वर्दी में बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। और उस रात मेरे वार्ड में 20 मांएं थीं। मैं किसी मां को आतंकवादियों के हाथों अपने बच्चे की बलि नहीं चढ़ने देना चाहती थी।'
पूरी रात अंजलि महिलाओं के बीच बैठी रहीं। सबको हिम्मत बंधाती रहीं। सुबह जब पुलिस ने दरवाजा खटखटाया और बोला - 'सब सुरक्षित हैं, दरवाजा खोलिए', तब पहली बार किसी ने राहत की सांस ली। 20 गर्भवती महिलाएं। 20 नवजात शिशु (जिनमें से एक उस रात पैदा हुआ)। सब जिंदा।

जब कसाब अदालत में मुस्कुराया
साल 2010। अदालत में अजमल कसाब को पेश किया गया। अंजलि को गवाही के लिए बुलाया गया। परिवार डर गया- बोला, 'मत जाओ, जान को खतरा है।' लेकिन अंजलि वर्दी पहनकर पहुंचीं। कसाब ने उन्हें देखकर मुस्कुराया और कहा, 'मैडम, आपने मुझे पहचान लिया ना? मैं अजमल कसाब हूं।' अंजलि ने शांत स्वर में जवाब दिया- 'हां, मैंने पहचान लिया। और उस रात तुमने जो किया, वो भी मैं कभी नहीं भूलूंगी।'

आज भी रीढ़ में सिहरन दौड़ जाती है
17 साल बीत गए। लेकिन जब भी अंजलि उस रात को याद करती हैं, उनकी आवाज भर्रा जाती है। 'नींद नहीं आती थी, कई दिनों तक...रात को अचानक जाग जाती हूं। उस खून, उन चीखों को आज भी सुनती हूं। लेकिन साथ ही उस बच्चे की पहली किलकारी भी याद आती है...जो मैंने उस रात बचाई थी।'





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