अपाहिज विकास के सामने ‘खाट पर सांसें’, आखिर हम कितने आजाद हैं?
सिवनी, 04 सितंबर: दशकों बीत जाने के बाद यदि पहले जैसा ही आज भी हाल रहे तो आप आजादी के 75 साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव के क्या मायने निकलेगें? इलाज के लिए खाट पर महिला को ले जाते एमपी के सिवनी जिले का वीडियो हैरान करने वाला हैं। सोचने पर मजबूर करता है, कि आखिर हम कितने आजाद हैं..वन क्षेत्र के गांव को शहर से जोड़ने पक्की सड़क तक नहीं बनवा सकें? ज़रा सोचिए कि इस हाल में अस्पताल पहुँचने बिजली के करंट में 80 फीसदी झुलसी आदिवासी महिला की क्या स्थिति रही होगी?

बिजली के करंट में झुलस गई थी यमुना
मप्र के सिवनी जिले में घंसौर आता हैं। इसके बखारी माल गांव की रहने वाली यमुनाबाई सैयाम नाम की महिला खेत में निंदाई कर रही थी। इसी दौरान पानी से भरे खेत में बिजली का तार टूटकर गिर गया। जिसके करंट की चपेट में आने से यमुना बुरी तरह झुलस गई। स्थानीय लोगों ने जब उसकी हालत देखी तो उसे फ़ौरन अस्पताल पहुंचाना जरुरी था। 4 किमी दूर तक गांव की सड़क की ऐसी स्थिति ही नहीं है, कि कोई एंबुलेंस यहां पहुंच जाए। ग्रामीणों ने खाट को ही पालकी बनाया फिर उस पर पीड़ित महिला को ले जाने का इंतजाम किया गया।

एंबुलेंस तक पहुंचने 4 किमी खाट से सफ़र
बखारी माल गांव की कच्ची सड़क हैं। यहां से 4 किमी दूर ही ऐसा रास्ता मिलता हैं, जहां तक एंबुलेंस आ पाती हैं। बखारी के आगे भी कई और गांव एक दूसरे से जुड़े हैं। लेकिन बारिश के दिनों में यदि किसी को अस्पताल ले जाना पड़ जाए तो उसे इसी तरह खाट या फिर अन्य तरीके से ले जाना पड़ता हैं। गंभीर हालत में यमुना को भी ग्रामीण इसी ढंग से एंबुलेंस तक ले जाने मजबूर हुए। खाट से चार किमी का सफ़र तय करने के बाद वाहन नसीब हुआ।

खाट पर महिला की हालत और बिगड़ी
महिला को खाट के सहारे ले जाते वक्त उसकी हालत और बिगड़ गई। किसी तरह उसे पहले घंसौर अस्पताल ले जाया गया, लेकिन स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने उसे जबलपुर मेडिकल अस्पताल रेफर कर दिया। जहां उसका इलाज जारी है। करंट से झुलसने के कारण उसको तकलीफ इतनी थी कि वह खाट पर कराहते हुए जा रही थी। साथ में चल रहे लोग उसे पंखे से हवा कर रहे थे। कई घंटों बाद यमुना का इलाज शुरू हो पाया, जिसकी सबसे बड़ी वजह कच्ची सड़क रही और उसे एंबुलेंस तक पहुंचने काफी देर हुई।

इस अपाहिज विकास का कौन जिम्मेदार?
आदिवासी महिला यमुना को खाट पर ले जाते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा हैं। तरह-तरह के दावें भी किए जा रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि आजादी के पहले इस गांव की जो स्थिति थी उसमें 75 साल बाद भी कोई बदलाव नहीं आया। घंसौर के सीईओ मनीष बागरी ने खुद इस बात की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि घंसौर से लगे दर्जनों छोटे बड़े गांव है। यहां बरगी बांध के विस्थापितों को भी बसाया गया था। यह इलाका वन परिक्षेत्र में आता है, इस वजह से पक्की सड़क का निर्माण नहीं हो सका। कई बार प्रयास हुए, लेकिन वन विभाग से अनुमति न मिलने की वजह से ग्रामीणों को हमेशा ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

दिल में दफ़न हो जाता है ग्रामीणों का दर्द
इस इलाके के करीब आधा सैकड़ा गांव के लोगों ने पहली बार इस स्थिति का सामना नहीं किया, बल्कि वक्त पर अस्पताल न पहुंचने से कई लोगों की तो बीच रास्ते में साँसें तक थम चुकी हैं। दशकों से इस व्यवस्था को देख अब ग्रामीण पक्की सड़क जैसा नाम भी नहीं लेते। इस घटना में भी उन्होंने सड़क का जिक्र करने की बजाय बिजली के तार टूटने का ही जिक्र किया। बोले कि बिजली के नंगे और कमजोर तार बदलने कई बार गुहार लगाई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। ऐसे हालातों के बीच आजादी के 75 साल का अमृत महोत्सव मनाकर फुर्सत हुए हम लोगों के सामने यही सवाल गूंजता है कि आखिर हम कितने आजाद हैं?












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