MP News: मध्य प्रदेश में ओबीसी को 27% आरक्षण का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की चुनौती
MP News: मध्य प्रदेश में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) को 27% आरक्षण देने की राह अब पूरी तरह से साफ हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 7 अप्रैल 2025 को इस आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
अब ओबीसी महासभा ने दावा किया है कि इस फैसले के बाद राज्य में बढ़े हुए आरक्षण को लागू करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं बची है। यह निर्णय ओबीसी समुदाय के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है, क्योंकि इससे उनके लिए आरक्षण का दायरा बढ़ने से सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त होने का अवसर मिलेगा।

कहां से शुरू हुई कहानी?
यह मामला 2019 से शुरू हुआ था, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का फैसला लिया था। सरकार ने विधानसभा में एक विधेयक पारित किया और 2 सितंबर 2021 को सामान्य प्रशासन विभाग ने भर्ती में 27% ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए एक सर्कुलर जारी किया।
हालांकि, इसके बाद यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी और 4 अगस्त 2023 को हाईकोर्ट ने इस सर्कुलर पर रोक लगा दी। इसके बाद राज्य सरकार के महाधिवक्ता ने सुझाव दिया कि सरकार भर्ती प्रक्रिया में 87:13 के फॉर्मूले का पालन करें, जहां 87% सीटों पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को मौका मिलेगा और 13% सीटों पर ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों को आरक्षण मिलेगा।
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
28 जनवरी 2025 को हाईकोर्ट ने यूथ फॉर इक्वेलिटी की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद यह संगठन सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (विशेष अनुमति याचिका) लेकर गया, जिसमें उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी। इसी दौरान ओबीसी महासभा ने कैविएट दायर कर कहा कि उनकी भी सुनवाई होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की बेंच ने सोमवार को यूथ फॉर इक्वेलिटी की एसएलपी खारिज कर दी। संगठन के वकील राहुल प्रताप ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी एसएलपी को डिसपोज कर दिया और इस एक्ट को चुनौती देने वाली उनकी मूल रिट को हाईकोर्ट से अपने पास ट्रांसफर कर लिया।
कमलनाथ का बयान
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "2019 में मेरे कार्यकाल में ओबीसी को 27% आरक्षण का कानून बनाया गया था। लेकिन भा.ज.पा. सरकार ने षड्यंत्र रचकर इसे लागू नहीं होने दिया। अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि इस कानून पर कोई रोक नहीं है।"
कमलनाथ के इस बयान से यह साफ हो गया है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में इस कानून को लागू करने की कोशिश की थी, लेकिन राजनीतिक कारणों से यह लागू नहीं हो पाया था। अब कोर्ट के फैसले के बाद यह कानून पूरी तरह से लागू होने के करीब है।
हाईकोर्ट का 26 फरवरी का आदेश
इससे पहले, 26 फरवरी 2025 को जबलपुर हाईकोर्ट की बेंच (मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैथ और न्यायाधीश विवेक जैन) ने 27% ओबीसी आरक्षण लागू करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इस कानून पर कोई रोक नहीं है और इसे लागू किया जाना चाहिए। इसी आदेश को यूथ फॉर इक्वेलिटी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया है।
ओबीसी महासभा की खुशी
ओबीसी महासभा की ओर से एडवोकेट वरुण ठाकुर और एडवोकेट रामकरण ने सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखा। महासभा का कहना है कि यह फैसला ओबीसी समुदाय के हक में मील का पत्थर साबित होगा। महासभा के सदस्य रामकरण ने कहा, "यह निर्णय हमारे समुदाय के लिए ऐतिहासिक है, और अब राज्य सरकार पर इस फैसले को जल्द लागू करने का दबाव बढ़ेगा।"
उन्होंने आगे कहा, "अब इस फैसले से ओबीसी वर्ग को जो अधिकार मिला है, उससे वे सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत होंगे। यह लंबे समय से चली आ रही हमारी लड़ाई की जीत है।"
क्या होगा आगे?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, मध्य प्रदेश में ओबीसी को भर्ती और अन्य क्षेत्रों में 27% आरक्षण मिलने का रास्ता पूरी तरह से साफ हो गया है। हालांकि, यूथ फॉर इक्वेलिटी की मूल याचिका अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए ट्रांसफर हो गई है, लेकिन फिलहाल आरक्षण लागू करने में कोई न्यायिक बाधा नहीं है।
अब यह देखना बाकी है कि राज्य सरकार इस फैसले को कब और कैसे लागू करती है। कई ओबीसी संगठनों और समुदायों ने इस फैसले का स्वागत किया है और वे अब इसके तत्काल प्रभाव से लागू होने की उम्मीद कर रहे हैं। आरक्षण लागू करने के साथ-साथ राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंचे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
यह फैसला मध्य प्रदेश के ओबीसी वर्ग के लिए एक बड़ी जीत है, क्योंकि अब उन्हें 27% आरक्षण का पूरा लाभ मिलेगा। यह निर्णय उन हजारों लोगों के लिए उम्मीद की किरण है, जो समाज में अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। अब यह राज्य सरकार पर निर्भर करेगा कि वह इस फैसले को समय पर और प्रभावी तरीके से लागू करे, ताकि इसका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचे।












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