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धरती उगल रही सिक्के! क्या यहां छिपा है 'खजाना', रातों—रात खोद दिया सारा खेत

दमोह जिले के मड़ियादो गांव में इन दिनों एक खेत में खजाने तलाशने के लिए बड़ी संख्या में लोग खुदाई करते नजर आ रहे हैं। यहां सड़क बनाने के लिए जेसीबी चल रही थी, इसी दौरान धातु के कुछ प्राचीन सिक्के मिले थे।

जमीन ने उगले सिक्के, खजाने की आस में खोद डाला पूरा खेत

Madhya Pradesh के दमोह जिले में हटा ब्लॉक का मादो गांव इन​ दिनों खासी चर्चा में हैं। यहां एक खेत में जेसीबी से खुदाई के दौरान कुछ प्राचीन सिक्के मिले थे। लोगों को तांबे, पीतल और काली रंग की धातु के कुछ सिक्के मिले हैं, जिन पर ऊर्दू में भाषा अंकित है। कुछ हिस्सों पर हिंदी में अक्षर अंकित है। लोगों को लगा कि खेत में खजाना दबा है सो लोग खेत में हाथों से खुदाई करने टूट पड़े। बताया जा रहा है कि यहां दफीना तो नहीं मिला, लेकिन कुछ और सिक्के लोगों के हाथ लगे हैं।

जमीन ने उगले सिक्के, खजाने की आस में खोद डाला पूरा खेत

दमोह जिले में हटा ब्लाॅक की उपतहसील मड़ियादो के गांव मादो के एक खेत से सिक्के मिलने की खबर आई है। सिक्के मिलने की खबर गांव में जैसे ही पहुंची तो गांव वालों को लगा कि यहां खजाना दबा हो सकता है। खजाने के लालच में लोग यहां खुदाई करने जुट पड़े। समूह में बुजुर्ग, बच्चे, युवा यहां मिट्टी खोदकर खजाना तलाश कर रहे हैं। इतना सब होने के बावजूद पुरातत्व विभाग, पुलिस और जिला प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी है। गांव के लोग हाथों में ऐतिहासिक सिक्के लेकर बता रहे हैं कि हमें यह मिले हैं।

जमीन ने उगले सिक्के, खजाने की आस में खोद डाला पूरा खेत

मुगलकाल के सिक्के बताए जा रहे हैं
स्थानीय लोगों क अनुसार मादो गांव में एक खेत में मुगल सम्राज्य के सिक्के मिले हैं। इन्हें मुगलकाल का इसलिए बताया जा रहा है क्योंकि इन पर उर्दू भाषा में लिखी है। सिक्के मिलने के खबर लगते है बड़ी सख्या में गांव के लोग एकत्रित हो गए और सिक्के खोजने में जुट गए। स्थानीय निवासी चरन सिंह का कहना है कि सिक्के पीतल जैसी धातु के प्रतीत हो रहे हैं। जिनमें उर्दू जैसी भाषा अंकित है। जिससे ऐसा प्रतीत होता है उक्त सिक्के मुगल सम्राज्य के होगें।

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    सकौर में स्कंदगुप्तकाल के चांदी के सिक्के मिल चुके
    दमोह जिले के सकौर में स्कंदगुप्त काल के चांदी के सिक्के मिले थे। दमोह का इतिहास बहुत प्राचीन है। सिंग्रामपुर में मिले पौराणिक काल के पाषाण हथियार इस बात का साक्ष्य है कि यह स्थान हजारों साल पहले से मानव सभ्यता का निवास रहा है। 5वीं शताब्दी मे यह पाटिलीपुत्र के शक्तिशाली गुप्त साम्राज्य का हिस्सा था। इसके सबूत जिले के विभिन्न स्थानों पर पाए जाने वाले शिलालेख, सिक्के, व अन्य वस्तुए हैं। जिनका संबंध समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त, और स्कंन्दगुप्त के शासन काल से था। 8वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के मध्य दमोह जिले का कुछ भाग चेदी साम्राज्य के अंतर्गत रहा था। जिसमें कलचुरी राजाओं का शासन था और उनकी राजधानी त्रिपुरी थी।

    बोरिया और समनापुर में काले-पीले मोती, पुरातन जेवर मिल चुके हैं
    दमोह जिले में प्राचीन अवशेष जो उस समय के जीवन काल की अर्थव्यवस्था के अंग थे वह मिलते रहते हैं। तेन्दूखेड़ा ब्लाॅक के बोरिया गांव और समनापुर में बड़ी संख्या में काले, पीले मोती के साथ ही महिलाओं के पहने जाने वाले गहने मिले थे, ग्रामीणों द्वारा यहां बड़ी संख्या में खुदाई की गई, इतना ही नहीं इस खुदाई की जानकारी लगने पर जयपुर, अहमदबाद व मुंबई के जौहरी बाजार के जौहरी यहां सीधे लोगों से मनके खरीदने पहुंचने लगे थे। दमोह जिले में इस तरह पुरासंपदा बिखरी पड़ी है।

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