MP News: पोहरी में वन विभाग की कार्रवाई को लेकर विधायक कैलाश कुशवाहा ने दी आंदोलन की चेतावनी
MP News: मध्य प्रदेश के पोहरी विधानसभा क्षेत्र में वन विभाग द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में आदिवासियों और किसानों को वितरित किए गए वन भूमि के पट्टों को निरस्त करने की योजना ने सियासी तूल पकड़ लिया है।
पोहरी से कांग्रेस विधायक कैलाश कुशवाहा ने अपने क्षेत्र के आदिवासी और किसान समुदायों से मुलाकात कर उन्हें हर संभव मदद का भरोसा दिलाया है। यह मुद्दा मध्य प्रदेश में आदिवासियों के जल, जंगल, और जमीन के अधिकारों को लेकर चल रही बहस को और गर्म कर रहा है।

वन अधिकार अधिनियम और पट्टों का विवाद
मध्य प्रदेश में वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, FRA) के तहत आदिवासियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को वन भूमि पर मालिकाना हक देने का प्रावधान है। दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार (1993-2003) के दौरान हजारों आदिवासियों और किसानों को वन भूमि के पट्टे वितरित किए गए थे। इनमें से कई पट्टे शिवपुरी जिले के पोहरी क्षेत्र में भी दिए गए, जो आदिवासी बहुल क्षेत्र है।
हालांकि, वन विभाग ने अब इन पट्टों को निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू की है, जिसका मुख्य आधार यह बताया जा रहा है कि कई पट्टे गलत दस्तावेजों या अपात्र व्यक्तियों को दिए गए थे। वन विभाग के अनुसार, कुछ मामलों में गैर-आदिवासियों ने आदिवासियों के नाम पर पट्टे हासिल किए, और कुछ भूमि पर 31 दिसंबर 2005 से पहले कब्जे का साक्ष्य नहीं मिला, जो FRA के तहत पात्रता का आधार है।
वन विभाग की कार्रवाई: निरस्तीकरण का आधार
वन विभाग ने अपनी कार्रवाई को वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुरूप बताया है। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "पोहरी क्षेत्र में कई पट्टे नियमों का उल्लंघन करके दिए गए थे। कुछ मामलों में गैर-आदिवासी दबंगों ने आदिवासियों को मोहरा बनाकर वन भूमि हथिया ली। हम केवल अपात्र पट्टों को निरस्त कर रहे हैं।"
विभाग ने यह भी दावा किया कि 2024 तक मध्य प्रदेश में 6.5 लाख वन अधिकार दावों में से 3 लाख से अधिक दावे खारिज किए गए, क्योंकि वे निम्नलिखित कारणों से अपात्र थे:
- दावा की गई भूमि वन भूमि नहीं थी। (लगभग 50,000 मामले)
- 31 दिसंबर 2005 से पहले कब्जे का साक्ष्य नहीं। (लगभग 5,40,000 मामले)
- दावेदार वास्तव में कब्जे में नहीं थे। (लगभग 1,78,000 मामले)
- गैर-आदिवासियों द्वारा 75 वर्ष के निवास का साक्ष्य न होना। (लगभग 50,000 मामले)
- पोहरी में भी इसी आधार पर सैकड़ों पट्टों की जांच चल रही है, और कई को निरस्त करने की नोटिस जारी की गई है।
कैलाश कुशवाहा का रुख: आदिवासियों के साथ खड़े
पोहरी विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक कैलाश कुशवाहा ने इस कार्रवाई को आदिवासी विरोधी और भाजपा सरकार की साजिश करार दिया। उन्होंने 24 जून 2025 को पोहरी के कई गांवों (जैसे बमरा, खरई, और छर्च) में आदिवासियों और किसानों से मुलाकात की और उनकी समस्याएं सुनीं। कुशवाहा ने कहा, "दिग्विजय सिंह जी ने आदिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए वन भूमि के पट्टे दिए थे। अब भाजपा सरकार इन पट्टों को छीनकर आदिवासियों को बेघर करना चाहती है। हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।"
कुशवाहा ने आश्वासन दिया कि वे निम्नलिखित कदम उठाएंगे
- कानूनी सहायता: प्रभावित आदिवासियों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान की जाएगी।
- आंदोलन: अगर सरकार ने कार्रवाई वापस नहीं ली, तो पोहरी में बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया जाएगा।
- विधानसभा में मुद्दा: आगामी विधानसभा सत्र में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया जाएगा।
- उन्होंने यह भी कहा कि दिग्विजय सिंह और कांग्रेस पार्टी इस मामले में उनके साथ हैं। "दिग्विजय जी ने हमेशा आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ी है। हम उनके दिखाए रास्ते पर चलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी पात्र आदिवासी अपने पट्टे से वंचित न रहे," कुशवाहा ने एक सभा में कहा।
दिग्विजय सिंह का योगदान और विवाद
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने कार्यकाल में वन अधिकारों को लागू करने के लिए कई कदम उठाए थे। 2002 में उनके नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार ने "पट्टा वितरण अभियान" चलाया, जिसमें हजारों आदिवासियों को वन भूमि के मालिकाना हक दिए गए। हालांकि, भाजपा ने इन पट्टों को "वोट बैंक की राजनीति" का हिस्सा बताया और दावा किया कि कई अपात्र लोगों को लाभ पहुंचाया गया।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 19 जून 2025 को भोपाल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "दिग्विजय सिंह जी ने आदिवासियों को उनका संवैधानिक हक दिलाया था। अब भाजपा सरकार वन अधिकार अधिनियम को कमजोर कर रही है। मध्य प्रदेश में 3 लाख से अधिक दावे बिना ठोस कारण के खारिज किए गए हैं।"
आदिवासियों और किसानों की पीड़ा
पोहरी के आदिवासी गांवों में निरस्तीकरण की नोटिस ने भय और आक्रोश पैदा कर दिया है। स्थानीय आदिवासी सहरिया और भील समुदाय के लोग, जो पीढ़ियों से वन भूमि पर खेती और आजीविका के लिए निर्भर हैं, अब अपनी जमीन खोने के डर में हैं।
रामू सहरिया (बमरा गांव): "हमारे दादा-परदादा से यह जमीन खेती कर रहे थे। 2002 में दिग्विजय जी ने हमें पट्टा दिया। अब वन विभाग कहता है कि यह जमीन उनकी है। हम कहां जाएंगे?"
कमला बाई (खरई): "हमारे पास कोई और जमीन नहीं है। अगर पट्टा छीन लिया गया, तो हमारे बच्चे भूखे मर जाएंगे।"
किसानों का कहना है कि वन विभाग और राजस्व विभाग के बीच समन्वय की कमी के कारण उनकी जमीन पर विवाद पैदा हो रहा है। कई मामलों में, राजस्व रिकॉर्ड में जमीन किसानों के नाम है, लेकिन वन विभाग इसे अपनी संपत्ति मानता है।
भाजपा का जवाब: कानूनी प्रक्रिया का दावा
भाजपा सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वे केवल गैरकानूनी पट्टों को निरस्त कर रहे हैं। वन मंत्री कुंवर विजय शाह ने विधानसभा में कहा, "हम पात्र आदिवासियों को उनके हक से वंचित नहीं करेंगे। जून-जुलाई 2025 तक सभी पात्र परिवारों को वन अधिकार पत्र देने की मुहिम चल रही है। लेकिन जो पट्टे गलत तरीके से दिए गए, उनकी जांच जरूरी है।"
भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने कहा, "कांग्रेस झूठ बोलकर आदिवासियों को भड़का रही है। हमारी सरकार ने वन अधिकार अधिनियम के तहत 4 लाख से अधिक पट्टे दिए हैं। दिग्विजय सिंह के समय दिए गए कई पट्टे नियमविरुद्ध थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांचा जा रहा है।
कानूनी और सामाजिक पहलू
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत आदिवासियों को 31 दिसंबर 2005 से पहले कब्जे वाली वन भूमि (अधिकतम 4 हेक्टेयर) का मालिकाना हक मिल सकता है, बशर्ते उनके पास कब्जे का साक्ष्य हो। गैर-आदिवासियों को 75 वर्ष के निवास का प्रमाण देना होता है। हालांकि, मध्य प्रदेश में इस कानून का कार्यान्वयन विवादास्पद रहा है।
- कांग्रेस का आरोप: भाजपा सरकार ने 40% वनों को निजी कंपनियों को सौंपने की योजना बनाई है, जिसके लिए आदिवासियों को बेदखल किया जा रहा है।
- सुप्रीम कोर्ट का रुख: 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज दावों की समीक्षा का आदेश दिया था, जिसके बाद कई राज्यों में पट्टों की जांच शुरू हुई।
- कमलेश्वर पटेल ने कहा, "आदिवासियों के पट्टों का मालिकाना हक उनके बच्चों को भी मिलना चाहिए। लेकिन सरकार कॉरपोरेट्स के दबाव में आदिवासियों को उजाड़ रही है।"
पोहरी का सियासी समीकरण
पोहरी विधानसभा क्षेत्र में आदिवासी (सहरिया, भील) और कुशवाहा समुदाय की आबादी निर्णायक है। 2023 के विधानसभा चुनाव में कैलाश कुशवाहा ने भाजपा के सुरेश राठखेड़ा को 8,000 वोटों से हराया था। यह मुद्दा 2026 के स्थानीय निकाय चुनावों और 2028 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए सियासी हथियार बन सकता है।
आगे की राह
कैलाश कुशवाहा ने घोषणा की है कि वे 30 जून 2025 को पोहरी में एक "आदिवासी अधिकार सम्मेलन" आयोजित करेंगे, जिसमें दिग्विजय सिंह, उमंग सिंघार, और अन्य कांग्रेस नेता शामिल होंगे। इसके अलावा, कांग्रेस ने इस मुद्दे पर हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की योजना बनाई है।
दूसरी ओर, वन विभाग ने कहा कि वे ग्राम सभा और जिला स्तरीय समितियों के साथ मिलकर केवल पात्र दावों को मान्यता देंगे। विभाग ने यह भी दावा किया कि 2025 के अंत तक 1 लाख नए पट्टे वितरित किए जाएंगे।
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